बिजनेस स्टैंडर्ड - नाभिकीय ऊर्जा से चालित मिसाइल से गंभीर खतरा
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नाभिकीय ऊर्जा से चालित मिसाइल से गंभीर खतरा

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  August 29, 2019

रूस के नाइनोक्सा मिसाइल परीक्षण रेंज में 8 अगस्त को हुई दुर्घटना ने आधुनिक हथियारों के विकास से जुड़े भयावह पहलुओं की तरफ ध्यान आकृष्ट किया है। रूसी परमाणु ऊर्जा आयोग 'रोसेटम' का कहना है कि नाभिकीय ऊर्जा-चालित तरल ईंधन वाले जेट प्रोपल्शन सिस्टम के परीक्षण में कुछ गड़बड़ी हो गई थी। इस हादसे में पांच तकनीकी कर्मचारियों की मौत हो गई और स्थानीय इलाके में रेडियोधर्मिता का स्तर 16 गुना तक बढ़ जाने के बाद स्थानीय निवासियों को सुरक्षित जगह पर ले जाना पड़ा। वैसे चेर्नोबिल हादसे की तुलना में यह दुर्घटना उतनी खतरनाक नहीं है। चेर्नोबिल हादसे के बाद रेडियोधर्मिता सामान्य स्तर से 7,000 गुना हो गई थी। 

 
नाभिकीय ऊर्जा-चालित उड़ान के बारे में शोध 1950 के दशक में शुरू हो गया था। शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ दोनों को लगता था कि हथियारों के विकास में नाभिकीय ऊर्जा पर निर्भर उड़ान अहम हो सकती है। लेकिन 1960 का दशक शुरू होने तक दोनों देशों ने ही इस शोध को रोक दिया। दरअसल परमाणु ऊर्जा पर आश्रित मिसाइल के विकास में जुड़ी इंजीनियरिंग समस्याएं काफी गंभीर किस्म की थीं।  चेर्नोबिल, थ्री माइल आइलैंड, फुकूशिमा के परमाणु संयंत्रों में हुए हादसों और कुस्र्क परमाणु पनडुब्बी के डूबने से रिएक्टरों के शुरुआती डिजाइनों की खामी सामने आ चुकी थी। इसके बावजूद नाभिकीय ऊर्जा वाले जहाजों एवं बिजली संयंत्रों के लिए रिएक्टर डिजाइन करना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन उड़ान से संबंधित प्रोपल्शन सिस्टम को ताकत एवं वजन के बीच बढिय़ा अनुपात चाहिए होता है ताकि उसे अधिक ताकत मिले और वजन कम रहे।
 
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के साथ समस्या यह है कि वे वजन में भारी होते हैं। इंसानों को ले जाते समय जानलेवा विकिरण से बचाव के लिए सघन सुरक्षा कवच की जरूरत होती है। इसके अलावा उष्मा के ऊंचे स्तर पर काबू पाने की भी समस्या होती है। साठ के दशक तक अमेरिका एवं सोवियत संघ दोनों ने ही ऐसे जेट इंजन बनाने की इंजीनियरिंग क्षमता हासिल कर ली थी जिनकी ताकत एवं वजन अनुपात परमाणु संयंत्रों से अधिक था। परंपरागत रॉकेट भी भार के अनुपात में अधिक ताकत निकाल लेते हैं।
 
मार्च 2018 में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने कई नए हथियारों के विकास की घोषणा की थी। फरवरी 2019 में बुरेवेस्तनिक मिसाइल के मद्देनजर विकसित छोटे परमाणु संयंत्र का परीक्षण सफल रहने की घोषणा की गई। क्रूज मिसाइलें धरती की सतह के बेहद करीब से उड़ान भरती हैं जिससे वे रडार की पकड़ में भी आने से बच जाती हैं। कम रफ्तार से उड़ान भरने से इन्हें अधिक ताकत की जरूरत नहीं होती है, लिहाजा नाभिकीय इंजन काफी छोटा भी हो सकता है। एक नाभिकीय संयंत्र का फायदा यह है कि बहुत लंबे वक्त तक दोबारा ईंधन डालने की जरूरत नहीं पड़ती है। परमाणु ऊर्जा से लैस मिसाइल में अगर कुछ किलोग्राम नाभिकीय ईंधन भी हो तो वह वर्षों तक तैनात रह सकती है जिससे उसकी मारक क्षमता असीमित हो जाती है। मिसाइल में एक स्मार्ट कंप्यूटर लगाकर उसका उड़ान पथ बदलने की प्रोग्रामिंग की जा सकती है जिससे उसे पकड़ पाना और मार गिराना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। हालांकि इस उड़ान प्रणाली का असली डिजाइन गोपनीय है। लेकिन पुराने प्रयोगों से यही लगता है कि किसी भी इंजन को परंपरागत तरीके से शुरू करने के बाद नाभिकीय ईंधन पर स्थानांतरित किया जा सकता है। मिसाइल इस नाभिकीय ऊर्जा का इस्तेमाल कई तरह से कर सकती है। रेडियोधर्मी ह्रïास से पैदा होने वाली ऊष्मा को सीधे बिजली में तब्दील किया जा सकता है। नासा ने अपने क्यूरिऑसिटी रोवर में यही तरीका अपनाया है। दूसरा तरीका रेडियोधर्मी ताप का इस्तेमाल परंपरागत तरल ईंधन वाले रॉकेट को प्रज्वलित करने का है।
 
हालांकि सबसे अधिक मुमकिन डिजाइन काफी हद तक परमाणु चालित रैमजेट जैसा होगा। एक रैमजेट टर्बोचार्जर की तरह होता है जो तेज रफ्तार पर चल रहे वाहन में ही काम कर सकता है। तेज गति से चलने के दौरान ही इंजन के चैंबर में हवा जमा होती है और फिर वह गर्म हो जाती है। इस गर्म हवा को बाहर निकाल दिया जाता है  जिससे एक धक्का पैदा होता है। लेकिन हवा को गर्म करने के लिए रेडियोधर्मी ऊष्मा का इस्तेमाल करें तो एक नाभिकीय रैमजेट सिद्धांत रूप में वर्षों तक उड़ता रह सकता है। सिद्धांत रूप में इसके मैक-10 की अविश्वसनीय रफ्तार हासिल कर लेने की भी संभावना है।
 
इससे जुड़ी इंजीनियरिंग समस्याएं भी हैं। नाभिकीय प्रक्रिया के दौरान पैदा होने वाली ऊष्मा बहुत अधिक होती है और उतने ऊंचे तापमान पर टिक पाने वाली हल्के वजन की सामग्री लगा पाना मुश्किल है। वजन संबंधी सीमाओं के चलते रेडियोधर्मी आवरण भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में उड़ान पथ के दौरान बाहर निकलने वाली उष्मा भी रेडियोधर्मिता फैलाती जाएगी। इसका मतलब है कि एक बार छोड़ दिए जाने के बाद परमाणु ऊर्जा-चालित मिसाइल में परमाणु बम नहीं लगा होने पर भी कुछ मात्रा में रेडियोधर्मी अवशेष निकलता रहेगा। 
 
इस दिशा में शोध कार्य रोके जाने के पीछे यही कारण रहे हैं। शीतयुद्ध के झंडाबरदारों ने भी रेडियोधर्मी अवशिष्ट निकालने वाली मिसाइलों के विचार को त्याग दिया था। लेकिन इस दिशा में शोध कार्य एक बार फिर से शुरू हो गए हैं। पुतिन ने साफ कहा है कि रूस को मिसाइल-रोधी आवरण से बच सकने वाले हथियारों की जरूरत है। नई सामग्री एवं कृत्रिम मेधा से इस दिशा में कुछ इंजीनियरिंग सीमाओं को तो दूर किया जा सकता है लेकिन उनसे भी रेडियोधर्मी अवशिष्ट का खतरा कम नहीं हो सकता है। इक्कीसवीं सदी में मिसाइल डिजाइन का नया दौर शीतयुद्ध की तुलना में कहीं अधिक डरावने हालात पैदा कर सकता है। 
Keyword: atomic, energy, power,,
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