बिजनेस स्टैंडर्ड - कम हो आरबीआई पर निर्भरता
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कम हो आरबीआई पर निर्भरता

संपादकीय /  August 29, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वर्ष 2018-19 की वार्षिक रिपोर्ट जारी कर दी है। यह रिपोर्ट बीते वर्ष के दौरान उसके कदमों को स्पष्ट तो करती ही है, वह व्यापक अर्थव्यवस्था की आगे की दिशा के अनुमानों को भी रेखांकित करती है। यह सालाना रिपोर्ट उस वक्त आई है जब चंद रोज पहले ही यह खबर सामने आई कि आरबीआई 1.7 लाख करोड़ रुपये की राशि सरकार को हस्तांतरित करेगा। इसमें से 1.23 लाख करोड़ रुपये की राशि अधिशेष से आई है जबकि शेष राशि अतिरिक्त प्रावधान से प्राप्त की गई है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर विमल जालान के नेतृत्व वाली एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति ने इसकी अनुशंसा की थी। अधिशेष की राशि की अधिकता के लिए आरबीआई द्वारा खुले बाजार में परिचालन में इजाफा भी एक वजह है। यह तेजी वर्ष की दूसरी छमाही में खास तौर पर देखी गई। इस अवधि में खुले बाजार में परिचालन से 2.5 लाख करोड़ रुपये की राशि हासिल हुई। बहरहाल, वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि नकदी की कमी बनी हुई है और 3 लाख करोड़ रुपये मूल्य की भारी भरकम नकदी बाजार में डाले जाने के बावजूद इसकी कमी बरकरार है। कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि बैंकिंग तंत्र में नकदी की स्थिति सहज है। हालांकि इंडिया रेटिंग्स के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वित्त वर्ष 2019 में नकदी समायोजन व्यवस्था के तहत नकदी डालने का सिलसिला जारी रहा और ऋण की स्थिति कमजोर बनी रही।

 
व्यवस्था में नकदी को लेकर भविष्य का परिदृश्य अहम है। देखना होगा कि आरबीआई से नकदी का हस्तांतरण एक बार के लिए हुआ है या ऐसा बार-बार होता रहेगा। आरबीआई को इतने बड़े पैमाने पर नकदी का हस्तांतरण क्यों करना पड़ा, इसे लेकर रिपोर्ट एकदम स्पष्ट है। ऐसा मोटे तौर पर विदेशी मुद्रा से जुड़ी गतिविधियों और व्यापक मुद्रा विस्तार को ध्यान में रखकर किया गया। आरबीआई को यह भी लगता है कि व्यवस्था में नकदी डालने का प्रभाव 2018-19 में निपट चुका है जब मुद्रा और जीडीपी अनुपात 10.7 से 11.2 हो गया। इसका अर्थ यह हुआ कि वर्ष के दौरान तंत्र में नकदी की स्थिति अधिशेष से घाटे की हो गई। इसके अतिरिक्त आरबीआई ने पूंजी के बहिर्गमन और प्रचलित मुद्रा में विस्तार को भी नकदी की स्थिति के लिए वजह बताया। जाहिर है सरकार आरबीआई से इतने अधिक हस्तांतरण पर स्थायी रूप से निर्भर नहीं रह सकती है और उसे अपनी निर्भरता कम करनी होगी।
 
यह बात ध्यान देने लायक है कि आरबीआई ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट से यह संकेत दिया है कि बाहरी संकट से बचाव के लिए सतर्कता की आवश्यकता है और वह लगातार इस पर निगाह रख रहा है। यह वर्ष 2013 में अमेरिकी बाजारों में हुई प्रतिक्रिया से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि तब से अब तक पोर्टफोलियो प्रवाह की संवेदनशीलता में काफी इजाफा हुआ है। वार्षिक रिपोर्ट को भले ही आश्चर्यजनक रूप से आशावादी माना जा रहा हो, मिसाल के तौर पर सरकारी घाटे की वृद्धि के विषय पर, लेकिन एक ओर जहां यह घरेलू वृद्धि को रेखांकित करती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था के नुकसान से जुड़े जोखिमों की भी बात करती है। वहीं दूसरी ओर इसमें यह भी कहा गया है कि भारत ढांचागत समस्याओं के बजाय चक्रीय मंदी की ओर बढ़ रहा है। हालांकि इसमें श्रम, कृषि विपणन, भूमि जैसे ढांचागत मुद्दों का भी उल्लेख है जिन्हें हल करने की आवश्यकता है। आरबीआई ने दोहराया है कि वह खपत की मांग बढ़ाने को प्रतिबद्ध है और निजी निवेश चालू वर्ष में उसकी शीर्ष प्राथमिकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि चूंकि मुद्रास्फीति निकट भविष्य में नियंत्रण में रहेगी इसलिए आरबीआई भविष्य में नीतिगत दरों में और कटौती करने की स्थिति में रहेगा। 
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