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वित्तीय प्रणाली को पटरी पर लाने के उपाय
वित्तीय समावेश को व्यापक बनाने और प्राथमिक शिक्षा तथा बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने पर सरकार को ध्यान केंद्रित करना चाहिए। बता रहे हैं
जैमिनी भगवती /  March 21, 2009

जी-7 देशों में वित्तीय और अर्थिक मंदी का भारत और दूसरे विकासशील देशों की विकास दर पर नकारात्मक असर पड़ा है।

क्या कोई इस बात पर गंभीरता के साथ विश्वास कर सकता है कि अभी भी कुछ ऐसी वित्तीय तरकीबें मौजूद हैं जो दशकों से लगातार राष्ट्रीय जीडीपी विकास दर और प्रमुख इक्विटी तथा बॉन्ड सूचकांकों के मुकाबले बेहतर रिटर्न दे रही हैं?

वित्तीय सेवा क्षेत्र में इक्विटी पर मिलने वाले प्रतिफल की दर को पूंजी आवंटन की कार्यकुशलता में सुधार किए बिना ही बढ़ाया जा सकता है। ऐसा लीवरेज को बढ़ा कर किया जा सकता है, उदाहरण के तौर पर एक फर्म के ऋण-इक्विटी अनुपात को बढ़ाकर।

अगर कुल परिसंपत्तियों पर प्रतिफल की दर ऋण की लागत से अधिक है तो लीवरेज के बढ़ने से इक्विटी पर मिलने वाला प्रतिफल भी बढ़ जाता है। लीवरेज का अर्थ है कि निवेश के लिए मौजूदा कोषों के अतिरिक्त उधारी लेना।

यह इस बात पर आधारित है कि अधिक लीवरेज वाली कंपनी की परिसंपत्तियों की कीमतों में थोड़ी सी कमी होती है तो फर्म की इक्विटी पूंजी को नुकसान पहुंचता है। नियमित समयांतराल पर परिसंपत्तियों की कीमतों में आया उबाल फटता रहा है।

उदाहरण के लिए आईटी क्षेत्र में आई तेजी 2001-02 में हवा हो गई थी। यह भी विश्वसनीय नहीं है कि नियामक दायरे में शामिल कोई व्यक्ति यह मान रहा था था कि मॉर्गेज आधारित प्रतिभूतियों की कीमतों में कभी भी संशोधन नहीं होगा।

मैनकर ओल्सन ने 1965 में लिखी अपनी किताब 'द लॉजिक ऑफ कलेक्टिव ऐक्शन' में सुझाव दिया था कि: सार्वजनिक वस्तुएं और समूह का सिद्धांत, जो बताता है कि सीमित संख्या में ऐसे लोग जिन्हें किसी खास नीति से फायदा मिलने वाला है, वे उस नीति को लागू करने की पुरजोर कोशिश करते हैं, फिर भले ही ये नीतियां समाज के लिए व्यापक तौर पर निरर्थक ही क्यों न हों।

उन्होंने आगे बताया कि ऐसी नीतियों को अपनाया जाता है कि इससे कुछ लोगों को काफी फायदा मिल रहा है जबकि समाज के एक बड़े हिस्से को हो रहा नुकसान अधिक होने के बावजूद कम लगता है क्योंकि यह नुकसान बड़ी संख्या में लोगों के बीच बंट जाता है।

अमेरिका को यह फैसला करने में काफी विलंब हुआ कि क्या बड़े बैंकों और बीमा कंपनियों का खुले तौर पर राष्ट्रीयकरण किया जाए। इन वर्गों में यह सुझाव दिया गया कि मार्क-टू-मार्केट अकाउंटिंग नियमों को अस्थायी तौर से स्थगित कर दिया जाए। ब्रिटेन में बैंक ऑफ इंगलैंड उस सीमा पर विचार कर रहा है जहां पर वह मात्रात्मक राहत को बहाल कर सके। इनमें से किसी भी बात में भारत की रुचि क्यों होगी?

निश्चित तौर से दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी से भारतीय इक्विटी बाजार, निर्यातक और कुल आर्थिक विकास दर प्रभावित हुई है। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों के दौरान कुछ टिप्पणीकारों ने भारत में नीतिनिर्माताओं और नियामकों से इन बातों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया है:

(क) केन्द्रीय बैंक को अपने प्रधान उद्देश्य के तौर पर मुद्रास्फीति के लक्ष्य को शामिल करना चाहिए। (ख) पूंजी खाता परिवर्तनीयता की ओर अधिक तेजी से बढ़ा जाए। (ग) भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाया जाए। (घ) निश्चित लाभ पेंशन योजना से निश्चित भागीदारी पेंशन योजना की ओर बढ़ा जाए और इस कोष के बड़े हिस्से का निवेश इक्विटी बाजार में किया जाए। और (ड.) मुंबई को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र (एमआईएफसी) के तौर पर स्थापित किया जाए।

अब हमें रुककर इस सिफारिशों पर एक बार फिर से विचार करने की जरूरत है। जैसा कि हम जानते हैं कि किसी भी फर्म में मुख्य वित्तीय अधिकारी का प्रदर्शन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। हालांकि रियल सेक्टर या वित्तीय संस्थान की कोई भी कंपनी अपने आप को कारोबारी (चालान) गतिविधियों से होने वाली आय पर बहुत अधिक निर्भर करना चाहेगी।

इस कारण मेरा सुझाव है कि सरकारी समर्थन को वित्तीय समावेश को व्यापक बनाने और प्राथमिक शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सेवा जैसी समस्याओं को दूर करने पर फोकस करना चाहिए। किसी भी अवशिष्ट संसाधनों पर खर्च कर रियल सेक्टर में नई पहल को बढ़ावा दिया जा सकता है। विद्धानों की एक बड़ी संस्था और वित्तीय क्षेत्र से संबंधित साहित्य, जिसका कि पश्चिम में विकास  हुआ है, वित्तीय सेवा क्षेत्र में नई पहल के कारण कार्यकुशल में हुई वृद्धि को रेखांकित करते हैं और यह निजी क्षेत्र द्वारा हासिल की गई सबसे बड़ी उपलब्धि है।

भारत ने विकसित पश्चिमी देशों के वित्तीय क्षेत्र की कई नियामक संरचनाओं, नीतियों और कार्यकलापों की नकल की है। हालांकि भारतीय बैंकिंग, बीमा और पेंशन क्षेत्र में आज भी सार्वजनिक क्षेत्र का दबदबा है और भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों की अक्षमता और गलत तौर-तरीके जगजाहिर हैं। और इस संस्थानों ने अभी तक ऋण बाजार में वैसी कोई भी बड़ी कामयाबी नहीं हासिल की है जैसी कि विकसित देशों में देखने को मिली है।

ऐसा नहीं लगता है कि भारत में या दूसरी जगह प्रमुख बैंकर, ब्रोकर और परिसंपत्ति प्रबंधक अपने आप से यह सवाल पूछते हैं कि रियल क्षेत्र के मुकाबले उन्होंने वास्तव में अपनी सेवाओं में ऐसा क्या मूल्यवर्धन किया है, कि उनका क्षतिपूर्ति पैकेज काफी अधिक होना चाहिए?

एक सहयोगी दलील यह है कि वित्तीय क्षेत्र से जुड़े लोगों में ऐसी क्षमताएं बहुत कम हैं कि वे कोई विवेकपूर्ण जोखिम ले सकें और उनकी नई पहल जटिल होती है। जोखिम के लिहाज से ये करदाता हैं जो व्यवस्थागत असफलता की आशंका की दशा में निजी इक्विटी संस्थानों को समर्थन देते हैं। बड़े वित्तीय संस्थानों के निदेशक मंडल और प्रबंधक को असफल होने नहीं दिया जाता है।

अनिवार्य रूप से ऐसे समय में जब देश के वित्तीय-आर्थिक संस्थाएं मुश्किल दौर से गुजर रही हैं, दलील यह है कि यह नैतिक पतन को लेकर चिंता करने का वक्त नहीं है और अब हमें सोचना होगा कि कैसे भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला किया जाए और सरकारी कोष का इस्तेमाल इस आग को बुझाने के लिए किया जाए। इसके अलावा मोर्टगेज प्रतिभूति, के्रडिट डिफाल्ट स्वैप और डेरिवेटिव की गणना के लिए क्वांटम यांत्रिकी और राकेट प्रणोदन प्रौद्योगिकी के मुकाबले अधिक तकनीकी दक्षता की जरूरत है।

जार्ज एकरलॉफ और पॉल रोमर द्वारा 1994 में पेश किए गए शोधपत्र 'लूटिंग: द इकॉनामिक्स अंडरवर्ल्ड ऑफ बैंकरप्टसी फॉर प्रॉफिट' में 1980 के विभिन्न वित्तीय संकटों की समीक्षा की गई है। इनमें बचत और ऋण, बचत और जंक बॉन्ड संबंधी दिवालियापन शामिल है।

इस शोधपत्र के निष्कर्ष में कहा गया है कि 'अगर अकाउंटिंग और कर नियमन का स्तर घटिया है या दंड के प्रावधान काफी कम हैं तो मुनाफा कमाने के लिए दिवालिया बना जा सकता है।' इस संदर्भ में संभवत: यह सिर्फ सरकारी क्षेत्र के स्वामित्व और पूंजी खाता परिवर्तनीयता में कमी का मामला नहीं है, जिससे हमारे वित्तीय क्षेत्र को लीमन ब्रदर्स और एआईजी जैसे जोखिम लेने से बचा रखा है।

हमारे बड़े वित्तीय संस्थानों के सीईओ को अभी इतना व्यक्तिगत फायदा नहीं मिलता है कि वे फर्म को दिवालिया घोषित करने का जोखिम ले सकें। निश्चित तौर से यह पौंजी योजनाएं (धोखाधड़ीपूर्ण निवेश योजनाएं) उन समस्याओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं जो जटिल डेरिवेटिव के इस्तेमाल के कारण पैदा हुई हैं।

भारी मात्रा में भुगतान वहां शामिल होता है जहां संभवत: विचलित नियामक एक प्रमुख कारण होते हैं। मेरी राय है कि नियामक और के्रडिट रेटिंग प्रक्रिया में सुधार की कोई भी कोशिश वित्तीय क्षेत्र में संस्थागत जोखिमों को तब तक कम नहीं कर सकती है जबकि यह मुआवजा पैकेज के साथ इस तरह से जुड़ा हो ताकि दूसरे क्षेत्रों के साथ इसकी तुलना की जा सके।

(लेखक यूरोपीय संघ, बेल्जियम और लक्जमबर्ग में भारत के राजदूत हैं। व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।)

Keyword: fudas those which bring financial system on track,
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