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धन निकासी में सरकार बरते सावधानी : समिति

सोमेश झा / नई दिल्ली August 28, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक पूंजी ढांचे की समीक्षा करने वाली विमल जालान समिति ने केंद्रीय बैंक के पुनर्मूल्यांकन खातों से धन निकासी करने के मामले में सरकार को सावधानी बरतने की सलाह दी है।  रिजर्व बैंक की आर्थिक पूंजी में पुनर्मूल्यांकन बैलेंस की हिस्सेदारी 73 प्रतिशत होती है। इसे लेकर केंद्र सरका और रिजर्व बैंक में पिछले साल टकराव बना रहा, जब पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इसमें से धन निकालने की सलाह दी थी।  मंगलवार को सार्वजनिक की गई समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, 'वाणिज्यिक इकाइयों द्वारा रखे गए पुनर्मूल्यांकन बैलेंस का मुद्रीकरण जरूरत पडऩे पर संपत्तियां बेचकर किया जा सकता है। बहरहाल यह विकल्प संभवत केंद्रीय बैंकों के लिए खुला नहीं होता है। रिजर्व बैंक द्वारा उस राशि का हस्तांतरण, जो उसे प्राप्त नहीं हुआ है, राजकोषीय घाटे के मुद्रीकरण के रूप में देखा जा सकता है।'  
 
इस कदम को 'नैतिक जोखिम' करार देते हुए समिति ने कहा है कि यह कदम राजकोषीय व्यय का वित्तपोषण करने के लिए रुपये के अवमूल्यन का नजीर बन सकता है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि मूल्यांकन बैलेंस हस्तांतरित करने की अनुमति रिजर्व बैंक के सामान्य नियमन के तहत नहीं है और अंतत: अगर पुनर्मूल्यांकन लाभ को जारी किया जाता है तो इसमें बिक्री शामिल होगी, जिसमें रिजर्व बैंक की डॉलर संपत्ति का अहम हिस्सा होगा। इसके परिणामस्वरूप घरेलू व वैश्विक मसले उठ सकते हैं। 
 
सूत्रों के मुताबिक अपने उत्तराधिकारी राजीव कुमार के समिति में शामिल होने के पहले जालान समिति में रहे गर्ग ने रिजर्व बैंक के बैलेंस सीट से सरकार को 1 लाख करोड़ रुपये स्थांतरित किए जाने का तर्क रखा था, जो 'अतिरिक्त' पुनर्मूल्यांकन बैलेंस था। रिजर्व बैंक की आर्थिक पूंजी में पिछले 2 दशक में भारी बदलाव हुआ है। रिजर्व बैंक की आर्थिक पूंजी में अनरियलाइज्ड पुनर्मूल्यांकन बैलेंस की हिस्सेदारी 2017-18 में बढ़कर करीब 73 प्रतिशत हो गई है, जो 1997 में महज 37.9 प्रतिशत थी। मुख्य रूप से डॉलर की तुलना में रुपये में गिरावट की वजह से ऐसा हुआ है। सरकार इसका पूंजीकरण करना चाहती थी और उसने सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए पुनर्मूल्यांकन बैलेंस के मुद्रीकरण की मांग की। 
 
समिति ने सिफारिश की है, 'अतिरिक्त पुनर्मूल्यांकन बैलेंस, अगर कोई हो, बाजार के जोखिम के जोखिम बफर के रूप में रिजर्व बैंक के बैलेंस सीट में तब तक बना रहना चाहिए, जबत तक कि बिक्री या पड़ी हुई संपत्ति की परिवक्वता के माध्यम से इसका मुद्रीकरण न हो।' समिति का मानना है कि अगर ऐसा किया जाता है तो विदेशी मुद्रा में उतार चढ़ाव बढ़ेगा और इससे रिजर्व बैंक की भविष्य की आमदनी कम होगी क्योंकि आमदनी पैदा करने वाली संपत्ति की बिक्री मूल्यांकन लाभों के मुद्रीकरण के लिए कर दी जाएगी। 
 
समिति ने कहा है, 'वसूल अधिशेष का इस्तेमाल जीओआई सिक्योरिटीज को रिटायर करने के लिए होगा, जिससे रिजर्व बैंक का घरेलू पोर्टफोलियो कम करेगा और मौद्रिक नीति परिचालन की प्रभावशीलता पर इसका असर पड़ेगा।' समिति ने पाया कि अन्य केंद्रीय बैंकों के लिए पुनर्मूल्यांकन बैलेंस का मुद्रीकरण एक मसला रहा होगा, खासकर अगर इसका असर उनकी मुद्रा पर पड़ता रहा हो। समिति ने कहा कि पुनर्मूल्यांकन बैलेंस बहुत ज्यादा उतार चढ़ाव वाली प्रवृत्ति का होता है। उदाहरण के लिए 2006-07 में रिजर्व बैंक का 75 प्रतिशत पुनर्मूल्यांकन बैलेंस खत्म हो गया, जो जीडीपी का 1.5 प्रतिशत था। 2016-17 में रिजर्व बैंक का पुनर्मूल्यांकन बैलेंस रुपये के मजबूत होने से 1 लाख करोड़ रुपये कम हो गया। 
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