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वैश्विक और घरेलू माहौल तथा विकास संबंधी दुविधा

अरुणाभ घोष /  August 28, 2019

देश में एक असंभव त्रयी का मेल और वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक, आर्थिक, तकनीकी और भू-राजनैतिक उथलपुथल के कारण तमाम बड़ी चिंताएं उठ खड़ी हुई हैं। जानकारी प्रदान कर रहे हैं अरुणाभ घोष

 
देश के समक्ष विकास के जो भी विकल्प मौजूद हैं, उन पर घरेलू दुविधाओं और वैश्विक स्तर पर हो रहे तमाम बड़े बदलावों का बहुत अधिक प्रभाव है। घरेलू स्तर पर रोजगार, वृद्घि और स्थायित्व की एक असंभव त्रयी हमारे सामने है जहां तीन लक्ष्यों में से ज्यादा से ज्यादा दो पूरे हो सकते हैं। उदाहरण के लिए सौर पार्क स्थायी बुनियादी ढांचे में अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित करते हैं लेकिन वे उतने रोजगार नहीं पैदा कर सकते जितने कि वितरण वाली ऊर्जा अधोसंरचना। प्राकृतिक ढंग से कृषि कार्य को बढ़ावा देना मिट्टी की सेहत के लिए अच्छा है। यह कार्बन उत्सर्जन कम करने और जल संरक्षण तथा श्रम को भी प्रोत्साहन देने वाला है लेकिन इससे कृषि उत्पादन में जो मूल्य वर्धन होगा वह उर्वरक उद्योग को होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। देश के औद्योगिक उत्पादन में अहम हिस्सेदारी और वाहन तथा वाहन कलपुर्जा उद्योग को देखते हुए इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल की ओर आक्रामक पहलकदमी नए उभरते औद्योगिक क्षेत्र पर खेला गया दांव है लेकिन यहां भी दो विपरीत परिस्थितियों के बीच संतुलन कायम करने की स्थिति बनेगी। 
 
बाहरी माहौल हमारे चयन को और बाधित करता है। जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक वातावरण को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। हमारी जैव विविधता को नुकसान पहुंचा है और जैव रासायनिक प्रक्रिया में गड़बड़ी पैदा हुई है। औद्योगीकरण में गिरावट उत्पादक वृद्घि का धीमा होना और असमानता में इजाफा होने के कारण पश्चिमी देशों ने वैश्विक एकजुटता से मुंह मोड़ा है। यह भरोसा कमजोर हुआ है कि बाजार आधारित वृद्घि से सामाजिक न्याय मिल सकता है। कृत्रिम मेधा, बड़े डेटा, स्वचालन, क्वांटम गणना आदि विसंगतिकारक तकनीक ने विभिन्न देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता पैदा की है और इससे तकनीक हासिल करने या उसका संरक्षण करने की प्रवृत्ति में भी इजाफा हुआ है। लोकलुभावनवाद और राष्ट्रवाद ने कई देशों में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देना शुरू कर दिया है। ऐसे में विभिन्न गठजोड़ों की स्थिरता, कूटनयिक नियमों और सैन्य संबद्घता को प्रभावित किया है। इसके साथ ही मध्यस्थता के लिए जरूरी रहे संगठन भी तनाव महसूस कर रहे हैं। देश में इस असंभव त्रयी को हासिल करना और वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक, आर्थिक, तकनीकी और भूराजनैतिक विसंगतियों के कारण सात बड़ी चिंताएं पैदा हो गई हैं। 
 
1. ऊर्जा और संसाधन सुरक्षा: ये दोनों संसाधन सुरक्षित करने, सुरक्षित मार्ग, सुरक्षित भंडारण और सक्रिय अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर निर्भर करते हैं। केवल हाइड्रोकार्बन का आयात कम करने से बात नहीं बनेगी। नई तरह की निर्भरता पैदा होगी। मिसाल के तौर पर स्वच्छ ऊर्जा उत्पादों का कारोबार और सेवाओं या बैटरी आदि के लिए अहम खनिजों की आपूर्ति। इसके लिए मजबूत कारोबारी रिश्ते कायम करने होंगे, आपूर्ति शृंखला बनानी होगी और प्रभावी बहुपक्षीय संस्थानों की जरूरत होगी। 
 
2. आर्थिक और पर्यावरण संबंधी कूटनीति: भारत ने पेरिस समझौते के जरिये जलवायु परिवर्तन के मामले में नेतृत्व क्षमता दिखाई। उसने सहयोग आधारित ऊर्जा सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सौर गठजोड़ की पहल की। अगले महीने भारत मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन की मेजबानी करेगा। परंतु ये तो समय-समय पर होने वाले हस्तक्षेप हैं। सन 2022 तक जब भारत जी 20 देशों की बैठक की मेजबानी करेगा, तब तक उसे अपने व्यापारिक, वित्तीय और आर्थिक हितों को ऊर्जा, जलवायु और स्थायित्व के साथ जोडऩा होगा। विश्व स्तर पर एक अधिक स्थायी एजेंडे की आवश्यकता होगी। 
 
3. रोजगार और व्यापार का माहौल: अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्घ वैश्विक व्यापार वृद्घि को प्रभावित करता रहेगा। जाहिर है अंतरराष्ट्रीय व्यापार कुछ समय तक रोजगार वृद्घि में सहायक नहीं होगा। भारत को घरेलू स्तर पर रोजगार पैदा करने होंगे। ऊर्जा परिवर्तन का दौर धीमी होती अर्थव्यवस्था में रोजगार का माध्यम बन सकता है। 
 
4. जलवायु जोखिम और बुनियादी निवेश: देश की वृद्घि अब जलवायु के जोखिम से जुड़ी हुई है। आवास, परिवहन और उद्योग खासकर तटीय इलाकों में उद्योग जैसी बुनियादी सुविधाओं में निवेश को जोखिम उत्पन्न होगा। जलवायु परिवर्तन के कारण वित्तीय संकट उत्पन्न होने के संकेत नजर आने लगे हैं। केंद्रीय बैंकों को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। 
 
5. कार्बन सीमा समायोजन और व्यापारिक गतिरोध: कारोबारी विवाद स्वच्छ ऊर्जा की राह रोक रहे हैं। विभिन्न देश इसके बढ़ते बाजार में अपने हिस्से के लिए जूझ रहे हैं। भविष्य में जलवायु और ऊर्जा संबंधी विवाद बढ़ेंगे। सन 2019 के अंत तक यूरोपीय संघ 2050 तक कार्बन निरपेक्षता का समझौता कर सकता है। इसके तय होने के बाद देखना होगा कि जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीरता नहीं दिखा रहे देशों को दंडित करने के लिए कार्बन सीमा समायोजन कर कब लगाया जाता है। अमेरिका का रुख इस दिशा में काफी ढीला है। चीन कह सकता है कि उसके उत्सर्जन 2030 के पहले उच्चतम स्तर पर होंगे। वैश्विक व्यापार तंत्र में मची अफरातफरी देश के ऊर्जा चयन और विकास विकल्पों पर दबाव डालेगी। 
 
6. घरेलू लोकलुभावनवाद और भू-राजनैतिक जोखिम: विकसित देशों में बढ़ती असमानता के कारण विरोध बढ़ रहा है। इससे निपटने के लिए लोकलुभावनवाद का अदूरदर्शी निर्णय लिया जा रहा है। कहीं और लिए जा रहे ऐसे निर्णय पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत के लिए भू-राजनैतिक जोखिम पैदा कर सकते हैं। ईरान-अमेरिका विवाद इसका उदाहरण है। उसने देश की ऊर्जा सुरक्षा पर असर डाला है। चीन और अमेरिका के तनाव के कारण चीन ने अहम खनिज आपूर्ति रोकने की धमकी दी है। ऐसे में भारत के लिए अन्य देशों के साथ तकनीकी सहयोग करना और निवेश जुटाना मुश्किल हो रहा है। 
 
7. झटकों पर झटके: सन 2008 में केवल वैश्विक वित्तीय संकट नहीं आया था बल्कि उसके साथ वैश्विक खाद्य संकट भी उत्पन्न हुआ था। ऊर्जा की बढ़ी कीमतें, उर्वरक की बढ़ी लागत, खाद्य भंडार की कमी, अनाज से जैव ईंधन बनाना, मुद्रा का अवमूल्यन और विपरीत मौसम आदि के कारण खाद्य कीमतें तेजी से बढ़ीं। भारत को भविष्य में ऐसे झटकों से बचने की तैयारी रखनी होगी। इनमें जल संकट, कृषि नुकसान, ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा तनाव, बढ़ते व्यापारिक विवाद, विपरीत मौसम की घटनाओं के चलते बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थानों का दिवालिया होना और पर्यावरण के चलते विस्थापित लोगों के आंदोलन आदि इसमें शामिल हैं। जलवायु को लेकर किए जाने वाले प्रयोग भविष्य में कृषि जैव विविधता आदि को लेकर अप्रत्याशित परिणाम ला सकते हैं। उदाहरण के लिए समताप मंडल में सल्फेट के कण डालना। इसके कारण पूर्ण अशासित क्षेत्रों में राजनीतिक संघर्ष भी उत्पन्न हो सकते हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि हमारी विकास संबंधी दुविधा आसानी से दूर हो जाएगी। परंतु इसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्थायी शहरीकरण और हरित औद्योगीकरण के लिए अवसर भी हैं। इससे भारत को नई प्रतिस्पर्धी बढ़त मिल सकती है। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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