बिजनेस स्टैंडर्ड - अधिकरणों में सदस्यों के पद खाली रहने से क्षमता पर असर
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, October 15, 2019 07:22 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

अधिकरणों में सदस्यों के पद खाली रहने से क्षमता पर असर

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  August 27, 2019

पिछले दशक में नियामकीय संस्थाओं एवं न्यायाधिकरणों का प्रसार  देखने को मिला। जब भी कोई घोटाला हुआ तो उस क्षेत्र से संबंधित नियामक या अधिकरण बनाया गया। बाद में, नीति-निर्माताओं को यह लगा कि अधिकरण बनाने की प्रवृत्ति बहुत आगे जा चुकी है और उनमें कटौती की जानी चाहिए। सच तो यह है कि इतने अधिकरण बनने के बाद भी नियमित अदालतों का बोझ कम नहीं हो पाया है जबकि इनके गठन का असली मकसद ही यह रहा है। इससे भी अहम बात यह है कि समुचित ढांचे के अभाव, फंड की भारी कमी और न्यायिक एवं तकनीकी सदस्यों के पद रिक्त होने से इनमें से अधिकांश अधिकरण निष्क्रिय हो चुके हैं। 

 
न्यायाधीश इस संकट के बारे में कई मंचों से अपनी बात रख चुके हैं। तीन बड़े फैसलों में इस बात का लिखित तौर पर भी जिक्र किया गया है। इस महीने की शुरुआत में उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों के पीठ ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में किए गए संशोधन को सही ठहराते हुए इस मसले का भी उल्लेख किया था। पॉयनियर अर्बन लैंड बनाम भारत संघ मामले में पीठ ने कहा कि कुछ जिद्दी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों ने न तो रियल एस्टेट नियामकीय प्राधिकरण (रेरा) का गठन किया है और न ही उसमें अधिकारियों की नियुक्ति की है। न्यायालय ने इन राज्यों एवं केंद्रशासित क्षेत्रों को तीन महीनों में इस काम को पूरा कर अनुपालना रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा है। केंद्र सरकार को भी इस बारे में अपनी रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया। पीठ ने कहा, 'बेहद जरूरी है कि राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपील पंचाट (एनसीएलएटी) में पर्याप्त लोग मौजूद हों जो आईबीसी के चलते आने वाले मामलों का निपटारा कर सकें।'
 
जहां ये अधिकरण अपेक्षाकृत नए हैं वहीं पुराने अधिकरणों की हालत तो और भी खस्ता है। दिल्ली उच्च न्यायालय के दो हालिया फैसलों से यह साबित भी होता है। एक फैसला बौद्धिक संपदा अधिकार और दूसरा फैसला प्रतिस्पद्र्धा कानून से संबंधित है। मिलेन लैब बनाम भारत संघ वाद में यह शिकायत थी कि एक डिजाइन को लेकर दायर कंपनी के स्थगन आवेदन की मंजूरी नहीं दी जा सकती है क्योंकि बौद्धिक संपदा अपील पंचाट (आईपीएबी) में तकनीकी सदस्य ही मौजूद नहीं है। न्यायालय ने बौद्धिक संपदा अधिकार कानून के तहत गठित विभिन्न अधिकरणों की स्थिति के बारे में भी जानकारी मांगी थी। 
 
इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2003 में गठित आईपीएबी पेटेंट अधिनियम, कॉपीराइट अधिनियम और पादप किस्म संरक्षण अधिनियम के तहत दायर अपीलों की सुनवाई करता है। लेकिन इस निकाय में अभी तक किसी भी तकनीकी सदस्य (कॉपीराइट) की नियुक्ति नहीं की गई है। पेटेंट संबंधी मामलों में भी तकनीकी सदस्य का पद मई 2016 से खाली पड़ा हुआ है। ट्रेडमार्क के मामले में तकनीकी सदस्य की दिसंबर 2018 से नियुक्ति नहीं की गई है। वहीं पादप किस्म संरक्षण से संबंधित तकनीकी सदस्य भी एक ही है।
 
आईपीएबी ने भौगोलिक संकेतक (जीआई) संबंधी अपीलें भी 2009 से सुननी शुरू कर दी थीं लेकिन आज तक केवल 12 अपीलों का ही निस्तारण हो पाया है। इसका कारण यह है कि ट्रेडमार्क का तकनीकी सदस्य ही जीआई मामलों में तकनीकी सदस्य के तौर पर काम करता है। यह प्रणाली भी अधिकांश बौद्धिक संपदा मामलों में ठीक से काम नहीं करती है क्योंकि या तो चेयरमैन का पद खाली होता है या तकनीकी सदस्य की नियुक्ति ही नहीं हुई रहती है। लिहाजा बौद्धिक संपदा अधिकार संबंधी सभी अपीलों में अड़चन बनी रहती है।
 
दिल्ली उच्च न्यायालय का एक और फैसला भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग (सीसीआई) के हालात को उजागर करता है। कैड सिस्टम्स बनाम सीसीआई मामले में कंपनी पर जीपीएस का इस्तेमाल करते हुए पुणे में पेड़ों की गिनती करने के एक ठेके में गिरोहबाजी का आरोप लगा था। जब सीसीआई ने इसके खिलाफ आदेश पारित कर दिया तो कंपनी इस आधार पर उच्च न्यायालय चली गई कि सीसीआई में कोई न्यायिक सदस्य नहीं होने से यह इस मामले का निपटारा करने के लायक ही नहीं है। हालांकि न्यायालय ने इस अपील को खारिज करते हुए कहा कि सीसीआई न्यायिक सदस्य की गैरमौजूदगी (धारा 15) में भी काम कर सकता है। यह रुख निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों के उलट है जो न्यायिक सदस्य की मौजूदगी को अनिवार्य बताता है। हालांकि अदालत ने इस चुनौती को निरस्त करते हुए कहा सीसीआई को निर्णय देने से रोकने का असर यही होगा कि यह निकाय ठप हो जाएगा। यह तदर्थवाद कारोबारी सुगमता के लिए प्रयासरत किसी भी कंपनी को पीछे कर देगा।
 
देश के हरेक जिले में गठित उपभोक्ता फोरम जैसे अन्य अद्र्ध-न्यायिक निकाय भी हैं लेकिन उनका कोरम कभी भी पूरा नहीं हो पाता है। मसलन, दक्षिण दिल्ली के उपभोक्ता फोरम में करीब दो साल से कोई अध्यक्ष नहीं होने से अंतिम सुनवाई नहीं हो पा रही है। एक महिला सदस्य अगली सुनवाई की तारीख दे देती है जो अमूमन चार महीने बाद की होती है। ऐसे हालात न केवल बड़ी कंपनियों के कामकाज बल्कि निजी उपभोक्ताओं को भी प्रभावित करते हैं।
Keyword: supreme court, high court,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या ग्रामीण क्षेत्र में बिक्री घटने से एफ एमसीजी फर्मों को होगी मुश्किल?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.