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शहरों में गैस का वितरण अब पकड़ेगा रफ्तार?

विनायक चटर्जी /  August 27, 2019

शहरी गैस वितरण अभियान के अब जोर पकडऩे की संभावना है। इसका अर्थव्यवस्था के साथ ही लोगों के जीवन पर भी दूरगामी असर पड़ेगा। बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
वर्ष 2011 में शुरू हुई भारतनेट परियोजना का मकसद देश की सभी 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को इंटरनेट से जोडऩे के लिए नैशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क बिछाने का था। इसी तरह सौभाग्य परियोजना सभी घरों तक बिजली कनेक्शन पहुंचाने के लिए शुरू की गई। वर्ष 2019 के मध्य में घोषित 'नल से जल' अभियान का मकसद वर्ष 2024 तक देश के सभी घरों तक पानी पहुंचाने का है। इसी तरह का असर रखने वाला शहरी गैस वितरण (सीजीडी) अभियान ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में तेजी से विकसित हो रहे सुविधा आपूर्ति नेटवर्किंग ढांचे का अंग बनने जा रहा है। नेटवर्किंग के ये ढांचे करोड़ों भारतीयों की जिंदगी बदलने में मददगार साबित हुए हैं। 
 
सीजीडी बीते दशक में ढांचागत क्षेत्र की वह शानदार परियोजना है जो अपेक्षित ढंग से आगे नहीं बढ़ पाई। चाहे मकानों तक पाइप से गैस पहुंचाने या संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) भरने के स्टेशन खोलने का मामला हो, ये सुविधाएं कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित रह गईं। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी यह पहल कोई निर्णायक असर नहीं छोड़ पाई। सीजीडी को हमेशा ही तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) वितरण की तुलना में कमतर भूमिका निभानी पड़ी है। राजनीतिक लाभ को देखते हुए सरकार ने सब्सिडी वाले एलपीजी सिलिंडरों को आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तक पहुंचाने के लिए 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' शुरू की थी। 
 
लेकिन सीएनजी के इस्तेमाल को देखते हुए सीजीडी अभियान के अब रफ्तार पकडऩे की संभावना है। कई वर्षों तकलचर रफ्तार से आगे बढऩे के बाद गैस वितरण के भौगोलिक क्षेत्रों में बोली लगाने के आखिरी दो चरणों में बाजार से बेहतर प्रतिक्रिया देखने को मिली है। यह सीएनजी की नीलामी के तरीके के हिसाब से गैस वितरण की नीलामी में बदलाव किए जाने का असर है। इस साल फरवरी तक पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) ने देश भर के 228 भौगोलिक क्षेत्रों के लिए निविदा जारी की थी जो करीब 70 फीसदी आबादी को लाभान्वित करेगा।
 
विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में निविदा हासिल करने वालों की समग्र प्रतिबद्धता बहुत कुछ कहती है। ठेकेदारों ने अप्रैल 2020 से शुरू होकर 2029 तक हर साल 20 लाख से अधिक पाइप गैस कनेक्शन देने का वादा किया है। इस अवधि में देश भर में 3,500 सीएनजी स्टेशन खोलने और 58,000 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाने की भी बात कही गई है। इसका मकसद यह है कि कुल ऊर्जा उपभोग में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को छह फीसदी से बढ़ाकर वर्ष 2030 तक 15 फीसदी पर लाना है। वैश्विक स्तर पर यह अनुपात 24 फीसदी है। भारत अपनी गैस जरूरतों का करीब 45 फीसदी आयात करता है और सीडीजी परियोजना को इस आपूर्ति पर पहला दावा दिया गया है। 
 
हालांकि इसके लिए लंबा सफर तय करना पड़ा है। वर्ष 2007 में गठन के बाद से ही पीएनजीआरबी को गैस क्षेत्र के कई हितधारकों से कानूनी लड़ाई में उलझना पड़ा था। फिर गैस वितरण के भौगोलिक क्षेत्रों में बोली से जुड़ी समस्याएं उठ खड़ी हुईं। बोली प्रक्रिया के पहले दो चरणों में निजी क्षेत्र की प्रतिक्रिया काफी ठंडी रही। फिर चौथे से छठे दौर की बोलियों में काफी आक्रामक बोलियां देखी गईं। बोलीकर्ताओं ने असंगत रूप से कम शुल्क वाली बोलियां लगानी शुरू कर दी थीं। इसका नतीजा आखिर में अनुबंध शर्तों में सुधार की मांग और फिर कानूनी पचड़ों में उलझने के ही रूप में सामने आता है जिससे एनपीए का भी जन्म होता है। ऐसा दौर भी आया जब पीएनजीआरबी के बोर्ड में कई स्थान लंबे समय तक खाली पड़े रहे जिसने गैस वितरण में विस्तार को रोके रखा।
 
इस बोर्ड का पुनर्गठन होने के बाद पीएनजीआरबी ने सही ढंग से काम करना शुरू किया। नए मानदंडों के तहत अव्यवहार्य बोलियों को हतोत्साहित करने के लिए एक न्यूनतम शुल्क तय किया गया और बोलियों का आकलन बड़े पैमाने पर ढांचा खड़ा कर पाने के वादे के आधार पर करने का फैसला किया गया। इन बंदिशों ने बैंक गारंटी दी जाने वाली राशि पर भी सीमा लगाई। पहले कंपनियां ठेका पाने के लिए ऊंची बैंक गारंटी वाली बोलियां पेश करती थीं और उनका बोली की वास्तविक गुणवत्ता से कोई तारतम्य नहीं होता था। इस सौदे को आकर्षक बनाने के लिए पीएनजीआरबी ने भी संबंधित भौगोलिक क्षेत्रों में ठेका पाने वाली कंपनियों की विशिष्ट वितरण अवधि को पांच वर्ष से बढ़ाकर आठ वर्ष कर दिया। 
 
इस लिहाज से वर्ष 2018 का साल कई मायनों में एक उल्लेखनीय साल रहा। मई 2018 में सीजीडी अभियान के तहत लाइसेंस वितरण का सबसे बड़ा दौर संचालित हुआ था जिसमें 86 भौगोलिक क्षेत्रों में आने वाले 174 जिलों के लिए लाइसेंस जारी किए गए। नौवें चरण की इस निविदा में घरेलू कंपनियों के साथ-साथ विदेशी कंपनियों ने भी रुचि दिखाई। इस चरण में 86 क्षेत्रों के लिए 400 से अधिक बोलियां लगाई गई थीं। इसके बाद 22 नवंबर, 2018 को 65 भौगोलिक क्षेत्रों के 129 जिलों में शहरी गैस वितरण परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई। फरवरी 2019 में दसवें चरण में 50 दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों के 124 जिलों में गैस वितरण के लिए बोलियां आमंत्रित की गई थीं जिसमें काफी रुचि देखी गई। अकेले इसी चरण की बोली से करीब 50,000 करोड़ रुपये का निवेश आने की संभावना है। 
 
कुल मिलाकर 1.5-2 लाख करोड़ रुपये का निवेश अगले दशक में शहरी गैस वितरण में होने की संभावना है। इसमें बड़ा हिस्सा पाने के लिए 40 से अधिक निजी एवं सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के बीच होड़ लगी रहेगी। शहरी गैस वितरण की गतिविधियां दमन एवं दीव, भुवनेश्वर, दादरा एवं नागर हवेली, कच्छ, अमरोली, दाहोद, दहेज-वागरा और जालंधर शहरों में शुरू हो चुकी हैं। नए भौगोलिक क्षेत्रों में भी नई परियोजनाओं को अनुमति दी जा चुकी है। सीजीडी संबंधी जिन वादों को पूरा करना है उनमें क्रियान्वयन सबसे अहम है। केंद्र एवं राज्य सरकारों, शहरी निकायों, नियामक और निजी क्षेत्र के हितधारकों के बीच समन्वय होना निहायत ही जरूरी है। नया जोश भरने के बाद भी चिंताएं बदस्तूर कायम हैं। 
 
इनका ताल्लुक मदर पाइपलाइन नेटवर्क बिछाने से जुड़ी चुनौतियों, भारी पूंजी की जरूरत, दूरदराज तक गैस पहुंचाने में आने वाली ऊंची लागत और ग्राहक के स्तर पर लागत-प्रभावी एवं टिकाऊ प्रबंधन ढांचों का विकास करने से है। पहाड़ी इलाकों और पूर्वोत्तर राज्यों में बसी शहरी आबादी तक गैस वितरण पर खास ध्यान देने की जरूरत होगी। देश में एक विशालकाय शहरी गैस वितरण नेटवर्क स्थापित करने का अर्थव्यवस्था पर कुछ उसी तरह का असर होगा जैसा स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का हुआ था। इससे भारत में जीवन जीने का तरीका भी पूरी तरह बदल जाएगा, जैसे बिजली एवं पानी आपूर्ति ने किया है।
 
(लेखक ढांचागत सेवा फर्म फीडबैक इन्फ्रा के प्रमुख हैं) 
Keyword: gas, pipeline, CDG,,
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