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पहला कदम

संपादकीय /  August 26, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कई ऐसे प्रशासनिक और कर संबंधी बदलावों की घोषणा की जिनका लक्ष्य देश की ठिठकी हुई अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकना है। मंदी को देखते हुए सरकार की ओर से ऐसे कुछ कदमों की अत्यंत आवश्यकता थी। बहरहाल, फिलहाल ऐसी राजकोषीय गुंजाइश नहीं है जिसके तहत किसी तरह का आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान किया जा सके। यह राहत की बात है कि सरकार अतिरिक्त व्यय को लेकर सचेत है और सीमित राजकोषीय प्रभाव वाले उपायों पर ही ध्यान केंद्रित कर रही है। यह बात भी काबिले तारीफ है कि सरकार सुनने को तैयार है और वह मान रही है कि देश की अर्थव्यवस्था में दिक्कतें हैं।

 
सरकार ने जिन उपायों की घोषणा की है उनमें क्षेत्र आधारित घोषणाएं भी हैं और सामान्य उपाय भी। इन घोषणाओं में शायद सबसे अहम घोषणा वह थी जिसमें कहा गया कि पंजीकृत सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) का लंबित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) बकाया 30 दिन की तय अवधि में निपटाया जाएगा। इतना ही नहीं भविष्य में तमाम नए बकाये को 60 दिन के भीतर निपटाया जाएगा। आशा है कि ऐसा करने से रोजगार उत्पन्न करने वाले क्षेत्रों में कार्यशील पूंजी की कमी कुछ हद तक दूर होगी। सरकार को वित्तीय तंत्र को और सुगम बनाना होगा। फिलहाल यह तंत्र सरकारी बैंकों के तनाव और आईएलऐंडएफएस संकट के परेशानी में नजर आ रहा है। बैंकरों को अतिउत्साही जांच आदि से कुछ बचाव उपलब्ध कराया गया है और सरकारी बैंकों में नई पूंजी डाली जा रही है। इसकी व्यवस्था बजट में ही की जा चुकी थी और सरकार का मानना है कि इससे बैंकों को वृद्धि के लिए कुछ पूंजी मिलेगी। बीते कई दशकों के सबसे बुरे वर्ष का सामना कर रहे वाहन क्षेत्र को भी कुछ राहत दी जा रही है, हालांकि यह राहत उद्योग की इच्छा के मुताबिक कर कटौती के रूप में नहीं दी जा रही है। इसकी जगह सरकार ने उच्च पंजीयन शुल्क को फिलहाल टाल दिया है और इस क्षेत्र को प्रभावित कर रही कुछ नियामकीय अनिश्चितता को दूर किया है।
 
कुछ हालिया निर्णयों को पूरी तरह या आंशिक तौर पर वापस लिया गया है। उदाहरण के लिए मंत्री ने दोहराया कि वित्त मंत्रालय कानून की उस धारा को अधिसूचित नहीं करने जा रहा है जिसके तहत कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व के नियमों के उल्लंघन को आपराधिक करार दिया जाता। पहली बात तो यह कि इसे कभी पारित ही नहीं होना चाहिए था। आयकर अधिभार में किए गए जिस इजाफे ने  विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के एक धड़े को प्रभावित किया था और बाजार में एक किस्म की अफरातफरी पैदा की थी उसे भी आंशिक तौर पर बदला गया है। सरकार को इसे पूरी तरह वापस ले लेना था क्योंकि यह कर ढांचे में जटिलताएं पैदा करेगा। कुल मिलाकर इनमें से कई प्रावधान सुखद हैं। खासतौर पर वित्त मंत्री द्वारा संपत्ति निर्माण करने वालों के संरक्षण और कर मांग में पारदर्शिता बढ़ाने जैसी बातें।
 
ये उपाय दर्शाते हैं कि सरकार अब संकट को नकारने के दौर से बाहर आ चुकी है और यह मान रही है कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर समस्याओं से दो चार है। इतना ही नहीं वह बिना राजकोषीय संतुलन को छेड़े  चक्रीय समस्याओं को हल भी करना चाहती है। जहां तक बात है गहन ढांचागत दिक्कतों की तो उन्हें हल करना शेष है और निवेश भी बढ़ाना है। इसके लिए केंद्र सरकार को काफी काम करना होगा। उसे राज्यों के साथ मिलकर उत्पादन कारक बाजार के लंबित सुधारों को अंजाम देना होगा। सरकार ने आर्थिक मंदी दूर करने की प्रतिबद्धता दिखाई है अब उसे ढांचागत सुधारों की ओर बढऩा चाहिए। 
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