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जेटली छोड़ गए आर्थिक फलक पर अपने निशां

अरूप रॉयचौधरी /  August 25, 2019

अरुण जेटली को सबसे ज्यादा इस बात के लिए याद किया जाएगा कि भारत के आर्थिक इतिहास में उथलपुथल मचाने वाली दो सबसे बड़ी घटनाओं - नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)- के क्रियान्वयन के दौरान वित्त मंत्रालय की कमान उन्हीं के हाथ थी। नॉर्थ ब्लॉक यानी वित्त मंत्रालय में उनके कार्यकाल के दौरान कई महत्त्वपूर्ण आर्थिक कानून बने और अहम कदम उठाए गए। इनमें ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), काला धन निरोधक अधिनियम, बेनामी कानून में संशोधन, भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, इंद्रधनुष कार्यक्रम के जरिये बैंकिंग सुधारों की कोशिश, सरकारी स्वामित्व वाले कई बैकों के विलय और विनिवेश की ऐतिहासिक पहल जैसे फैसले शामिल हैं।

 
नीतियों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों से बात करें तो जेटली की सबसे बड़ी उपलब्धि राजकोषीय ईमानदारी थी, जिस पर उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी भरपूर समर्थन मिलता रहा। जेटली ने जुलाई 2014 में जब अपना पहला बजट पेश किया तो राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.1 फीसदी पर सीमित करने का लक्ष्य उनके सामने था क्योंकि पिछली सरकार के समय इस मोर्चे पर खासी ढिलाई बरती गई थी। उन्होंने कहा, 'राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.1 फीसदी पर लाने का लक्ष्य डरावना तो है। भले ही यह मुश्किल लगे मगर मैंने इस लक्ष्य को चुनौती के रूप में लिया है। हमारी हार तभी होती है जब हम कोशिश करना बंद कर देते हैं।'
 
जेटली की कोशिशों का ही असर था कि वित्त वर्ष 2018-19 खत्म होते-होते राजकोषीय घाटा 4.1 फीसदी से घटकर 3.4 फीसदी रह गया था। इस दौरान दो बार (2017-18 और 2018-19 में) ही राजकोषीय घाटा अपने बजट लक्ष्य से फिसला था और जीएसटी लागू होने के बाद पनपी समस्याएं इसकी बहुत बड़ी वजह थीं। जेटली के समय मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर काम कर चुके अरविंद सुब्रमण्यन ने उन्हें अपना 'सबसे शानदार बॉस' बताया था। यह सही है कि जब विपक्षी नेता अफसरों पर हमला करते थे तो उन्हें बचाने के लिए जेटली पूरा दम लगा दिया करते थे। उनमें से कुछ अधिकारियों को जब अनुशासन में रखने की जरूरत पड़ी तब भी उन्होंने सार्वजनिक तौर पर उनकी आलोचना नहीं की।
 
ऐसा एक मौका तब आया था, जब विरल आचार्य भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर थे और उनसे जुबानी जंग करने पर जेटली ने तत्कालीन वित्त सचिव सुभाष गर्ग को निजी तौर पर फटकार लगाई थी। लेकिन सार्वजनिक रूप से जेटली ने रिजर्व बैंक से जुड़े कई मुद्दों पर गर्ग का खुलकर साथ दिया था। कई वर्तमान और पूर्व अफसरशाह अनौपचारिक बातचीत में जेटली को ऐसे मंत्री के तौर पर याद करते हैं, जिन्हें अपने अफसरों के फैसलों और तजुर्बे पर यकीन था। उनके अफसर भी सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए संविधान, संसदीय प्रक्रिया एवं कानून के बारे में जेटली की गहरी समझ के कायल थे।
 
कुछ आलोचक मानते थे कि अपने अफसरों पर जेटली की अधिक निर्भरता कई मौकों पर नुकसानदेह भी साबित हुई है। कोई नहीं जानता कि पिछले अक्टूबर में अधिकारियों ने जेटली के सामने ऐसी कौन सी दलील रखी थीं कि वित्त मंत्रालय ने आिरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत कई मामलों पर बातचीत करने का संदेश रिजर्व बैंक के पास भेज दिया। इस कदम से सरकार और केंद्रीय बैंक के रिश्तों पर पिछले कई वर्षों में सबसे बड़ी चोट पहुंची थी। बहरहाल विरोधी पक्षों के बीच सुलह कराने वाले वार्ताकार के तौर पर जेटली की महारत का फायदा जीएसटी से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने में मिला था। जेटली की कोशिशों से ही उस समय सहमति बनी और जीएसटी से जुड़े कानून संसद तथा विधानसभाओं में पारित हो गए। इसके साथ ही इस अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को 1 जुलाई 2017 को लागू करने का रास्ता साफ हो गया। जेटली की अगुआई में जीएसटी परिषद की 33 बैठकें हुईं और किसी भी मसले पर मतदान से फैसले की नौबत नहीं आई। जेटली की अगुआई वाली जीएसटी परिषद ने सारे फैसले आम सहमति से ही लिए।
 
मगर क्या सबको साथ लेकर चलने की जेटली की आदत से नुकसान हुआ? जीएसटी के आलोचक कहते हैं कि इस प्रणाली का जटिल ढांचा, दो या तीन दरों के बजाय पांच तरह की कर दरें रखना असल में सभी राज्यों एवं विरोधियों को खुश करने की जेटली की कोशिश का ही नतीजा था। जीएसटी के क्रियान्वयन से जुड़ी शुरुआती समस्याओं का ठीकरा पूरी तरह से जेटली और उनके तत्कालीन राजस्व एवं वित्त सचिव हसमुख अढिय़ा पर फोड़ दिया गया था।  वित्त मंत्री के तौर पर नोटबंदी का फै सला घटिया ढंग से लागू करने, जीएसटी के क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं, बड़े आर्थिक अपराधियों के देश छोड़कर भागने, मुह बाए खड़ी सुस्ती और बेरोजगारी के संकट को भांपने में नाकामी तथा नियामकीय संस्थाओं की स्वायत्तता में सेंध लगाने की कोशिश के आरोप जेटली पर लगते रहे। मगर वित्त मंत्रालय की खबरें लाने वाले पत्रकार जेटली को नॉर्थ ब्लॉक में अनौपचारिक चर्चाओं के लिए याद रखेंगे। वहां होने वाली चर्चा संसद और अन्य जगहों पर लगने वाले जेटली के 'दरबारों' से अलहदा होती थीं और इनमें राजनीति से अधिक जोर नीतिगत मुद्दों पर होता था। उनमें अफवाहों और किस्से-कहानियों के साथ ऐसी छोटी-मोटी जानकारी भी होती थीं, जिन्हें खबरों के तौर पर परोसा जा सकता था।
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