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घर खरीदार आईबीसी को बनाएं अंतिम हथियार

तिनेश भसीन /  August 25, 2019

उच्चतम न्यायालय ने हाल में घर खरीदारों का ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत वित्तीय ऋणदाता का दर्जा बरकरार रखा है। इस फैसले का मतलब है कि घर खरीदारों को अन्य ऋणदाताओं के समान माना जाएगा। अगर डेवलपर तय समय पर मकान देने में चूक करता है तो खरीदार उसे राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में भी घसीट सकते हैं।  शीर्ष अदालत का यह फैसला घर खरीदारों को सशक्त बनाता है। यह उन्हें राहत प्राप्त करने का एक अतिरिक्त जरिया मुहैया कराता है। लेकिन डेवलपर को एनसीएलटी में घसीटना हमेशा सही फैसला नहीं हो सकता है। एक विधि कंपनी मुकेश जैन ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक मुकेश जैन ने कहा, 'प्रॉपर्टी खरीदारों को आईबीसी को अंतिम रास्ते के रूप में अपनाना चाहिए। जब कोई मामला एनसीएलटी में जाता है तो इस प्रक्रिया में सभी ऋणदाता शामिल हो जाते हैं। इससे घर खरीदारों के लिए बहुत कम पैसा बचने के आसार होते हैं। दूसरी तरफ रियल एस्टेट (नियमन एवं विकास) अधिनियम (रेरा) घर खरीदारों को ज्यादा अधिकार देता है। इसमें समाधान ज्यादा जल्दी होने के आसार हैं।' जैन कहते हैं कि अगर रियल एस्टेट कंपनी अपने कर्ज नहीं चुका पा रही है तो भी उपभोक्ता अदालत से संपर्क करना बेहतर विकल्प होता है। वकीलों का कहना है कि एनसीएलटी की प्रक्रिया भी जटिल हो सकती है। इस समय ऐसे मामलों के लिए आईबीसी में पहले के कोई उदाहरण भी नहीं हैं। 

 
दोषी डेवलपरों से निपटने के लिए रेरा बेहतर 
 
रेरा जैसे कानून विशेष रूप से प्रॉपर्टी खरीदारों की समस्याओं के समाधान के लिए बनाए गए हैं। वकीलों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में रियल एस्टेट नियामक ने बहुत सी परियोजनाएं पूरी करने का काम अपने हाथ में लिया है। महाराष्ट्र में राज्य नियामक ने कुछ ऐसे दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत डेवलपर के मकान देने में देरी करने पर खरीदार उसे हटा सकते हैं। अगर ज्यादातर घर खरीदारों में सहमति है तो वे खुद भी परियोजना को विकसित कर सकते हैं।  मुंबई में ओरबिट टेरेसेज को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों ने अपनी परियोजना को अपने हाथ में लेने के लिए उच्च न्यायालय से संपर्क किया था। खरीदारों ने ऋणदाताओं के समूह के साथ भी निपटान किया। इन ऋणदाताओं ने कंपनी को बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। वकीलों का कहना है कि अगर ऐसे मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई होती तो घर खरीदारों को उस पैसे का महज एक छोटा सा हिस्सा मिलता, जो उन्होंने घर खरीदने के लिए चुकाया था। 
 
अभी कानून में नहीं आई स्थिरता 
 
आईबीसी नई है और इसमें अब भी बदलाव हो रहे हैं। इसके कई प्रावधानों को चुनौती दी जा रही है और इनमें स्थायित्व आने की प्रक्रिया जारी है। आईबीसी की प्रक्रिया में तीन अहम भागीदार बैंकों जैसे सुरक्षित ऋणदाता, घर खरीदार और परिचालन ऋणदाता  (आपूर्तिकर्ता जिनका पैसा बकाया है) हैं। इनमें से घर खरीदारों और सुरक्षित ऋणदाताओं को वित्तीय ऋणदाता माना जाता है और दोनों के अलग-अलग मकसद हैं। ऋणदाता अपने ऋणों की वसूली करना चाहते हैं, जबकि घर खरीदारों की मंशा होती है कि परियोजना पूरी हो और उन्हें अपना घर मिल जाए। 
 
इकॉनोमिक लॉज प्रैक्ट्सि में पार्टनर बाबू शिवप्रकाशम ने कहा, 'यह देखना होगा कि समाधान के किस स्तर पर दोनों संतुष्ट होंगे।' कुछ वकीलों का कहना है कि इसे लेकर भी मामूली स्पष्टता है कि घर खरीदार सुरक्षित या असुरक्षित ऋणदाता हैं। अन्य का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के फैसलों की व्याख्या के मुताबिक प्रॉपर्टी खरीदार असुरक्षित ऋणदाता हैं। किसी कंपनी के परिसमापन के मामले में असुरक्षित ऋणदाताओं को सुरक्षित ऋणदाताओं, श्रमिकों और कर्मचारियों से नीचे रखा जाता है।  आईबीसी के तहत ऋणदाताओं की समिति के सदस्यों के मत की ताकत उनके बकाया ऋण के हिसाब से निर्धारित होती है। उदाहरण के लिए माना कि दो बैंकों की बकाया राशि 1,000 करोड़ रुपये है। घर खरीदारों की बकाया राशि 400 करोड़ रुपये है। जब ऋणदाताओं की समिति में कोई प्रस्ताव पेश किया जाता है तो इसे पारित किए जाने के लिए 66 फीसदी मतों का पक्ष में होना जरूरी है। जिन बैंकों के 1,000 करोड़ रुपये बकाया हैं, वे 71 फीसदी मतों का प्रतिनिधित्व करेंगे। ऐसे मामले में अगर बैंक प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं तो घर खरीदार अपना पक्ष नहीं रख पाएंगे। इसलिए वकीलों का कहना है कि खरीदारों को आईबीसी का सहारा तभी लेना चाहिए जब राहत के अन्य तरीके इस्तेमाल किए जा चुके हों। 
 
सहायक कंपनियां बनती हैं समस्या 
 
आम तौर पर डेवलपर किसी परियोजना को अमलीजामा पहनाते समय कोई विशेष उद्देश्य कंपनी (एसपीवी) या सहायक कंपनी बनाते हैं। बैंक सहायक कंपनी को ऋण देते हैं। डिफॉल्ट करने की स्थिति में एसपीवी या सहायक कंपनी ऋण चुकाने में अक्षम बन जाती है, इसलिए पैतृक समूह को एनसीएलटी में नहीं घसीटा जा सकता है। एकमात्र राहत यह होती है कि आम तौर पर बैंकर प्रवर्तकों से व्यक्तिगत गारंटी लेते हैं, जिसकी बिक्री की जा सकती है। जैन ने कहा, 'लेकिन यदि सहायक कंपनी दिवालिया होती है और पैतृक कंपनी के पास पैसा होता है तो घर खरीदार पैतृक कंपनी से पैसा वसूल नहीं कर सकते क्योंकि वह स्वतंत्र इकाई होती है। अगर खरीदार यह साबित कर दें कि एसपीवी से पैतृक कंपनी को धनराशि भेजी गई है तो वे प्रक्रिया में पैतृक कंपनी को शामिल करने के लिए अदालत से संपर्क साध सकते हैं।'
 
देरी मानी जाती है प्रदर्शनमें चूक 
 
घर खरीदार किसी डेवलपर के खिलाफ आईबीसी की प्रक्रिया तभी शुरू कर सकते हैं, जब वित्तीय डिफॉल्ट किया गया हो। घर मिलने में देरी को प्रदर्शन में चूक माना जाता है। घर खरीदारों को देरी को मौद्रिक डिफॉल्ट में तब्दील करने की जरूरत होगी। किंग्स ऐंड अलायंस एलएलपी में प्रबंध निदेशक मोहित चौधरी ने कहा, 'उन्हें ऐसा करने के लिए डेवलपर को कहना होगा कि वह उनकी बुकिंग रद्द कर ब्याज समेत पैसा लौटा दे। अगर डेवलपर ऐसा करने में नाकाम रहता है और डिफॉल्ट की राशि 1 लाख रुपये से अधिक है तो खरीदार आईबीसी की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।' अगर डेवलपर करार में यह उल्लेख करता है कि वह देरी की स्थिति में घर खरीदारों को हर्जाना देगा, लेकिन निर्धारित समयसीमा में ऐसा नहीं करता है तो इसे भी वित्तीय डिफॉल्ट माना जा सकता है। 
 
लड़ाई के लिए हों एकजुट 
 
जब सुरक्षित ऋणदाता किसी डेवलपर के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करते हैं तो घर खरीदारों को एकजुट होने की जरूरत होती है ताकि उन्हें अपना बकाया मिल सके। जब कोई मामला एनसीएलटी में जाता है तो एक अंतरिम समाधान पेशेवर की नियुक्ति की जाती है और ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) गठित होती है, जो ज्यादातर फैसले लेती है। समाधान पेशेवर एक दिवालिया पेशेवर की नियुक्ति करेगा, जो ऋणदाताओं की समिति में घर खरीदारों का प्रतिनिधित्व करेगा। इस विशेषज्ञ को चुकाई जाने वाली फीस का बोझ घर खरीदारों को उठाना पड़ेगा। जब बोली लगाने वाले व्यक्ति परियोजना के लिए अपनी समाधान योजनाएं जमा कराते हैं तो दिवालिया समाधान पेशेवर को उनके बारे में घर खरीदारों से बातचीत करनी होती है और यह मत हासिल करना पड़ता है कि वे पेशकश से सहमत हैं या नहीं। मतदान के लिए बड़ी संख्या में खरीदारों के आने से वह फैसला लिया जा सकेगा, जिससे ज्यादातर सहमत होंगे।  आखिर में आईबीसी और रेरा में कुछ ऐसे उपबंध हैं, जिनमें कहा गया है कि अन्य कानून के साथ विरोध की स्थिति में वह स्वीकार्य होगा। उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि आईबीसी और रेरा के बीच विरोधाभास की स्थिति में आईबीसी को प्रमुखता मिलेगी। 
Keyword: real estate, property, GST,,
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