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कॉर्पोरेट क्षेत्र में बेहतर संचालन मानक स्थापित करे सरकार

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  August 25, 2019

प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों लाल किले के प्राचीर से कहा कि देश के परिसंपत्ति निर्माताओं को संदेह की दृष्टिï से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि जब वे परिसंपत्ति बनाएंगे तभी उसका वितरण किया जा सकेगा। सामान्य परिस्थितियों में इस बयान को अनापत्तिजनक माना जाता लेकिन मौजूदा परिदृश्य में इसके लिए चुना गया समय अनुकूल नहीं है।  हमारा मानना है कि संपत्ति निर्माताओं से प्रधानमंत्री का तात्पर्य भारतीय उद्यमियों से था। पांच दिन बाद वित्त मंत्री ने इस शब्द को ऐसे ही परिभाषित किया। क्या वाकई यह संभव है कि इन परिसंपत्ति निर्माताओं को संदेह की दृष्टिï से न देखा जाए?

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उचित कदम
 
नीरव मोदी से लेकर आईएलऐंडएफएस और अवांता समूह तक कारोबारी धोखाधड़ी जैसे तमाम मामले बीते दो साल से लगभग हर महीने सुर्खियों में रहे हैं। अगर हम बीते 15 वर्ष को ध्यान में रखें तो रामलिंग राजू की स्वीकारोक्ति से हुई शुरुआत के बाद आशंका की वजह दोगुनी हो गई है। प्रधानमंत्री भले ही ऐसा कह रहे हों लेकिन उनके कार्यकाल में प्रवर्तन एजेंसियां परिसंपत्ति निर्माण को लेकर खासा संदेह करती नजर आ रही हैं। जब कॉर्पोरेट जगत से मोदी के कट्टïर समर्थक मोहनदास पई जैसे लोग सार्वजनिक रूप से कर आतंकवाद की शिकायत करने लगें तो समझना चाहिए कि हालात वाकई गंभीर है। कैफे कॉफी डे के संस्थापक वी जी सिद्घार्थ की मृत्यु और कथित रूप से उनके पत्र में कर अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत  की बात सामने आने के बाद पई ने ऐसा कहा था। तात्कालिक संदर्भ से इतर प्रधानमंत्री का वक्तव्य एक अहम प्रस्थान बिंदु को परिलक्षित करता है। अतीत का कोई प्रधानमंत्री अमीरों के उद्देश्य को यूं सार्वजनिक रूप से उद्घाटित करने की हिम्मत नहीं करता। इसकी जड़ें ऐतिहासिक हैं। एक समय में वालचंद से लेकर टाटा और बिरला जैसे कारोबारियों ने खूब संपत्ति बनाई। इसमें दो विश्व युद्घों से मिले अवसर भी शामिल थे। हालांकि यह भी सही है कि इन उद्यमियों ने स्वतंत्रता संघर्ष को भी धन मुहैया कराया। यह स्पष्टï था कि उनके परिसंपत्ति निर्माण ने गरीब मुल्क में संपत्ति वितरण की कोई राह नहीं बनाई। उस दौर के दुनिया के तमाम अन्य बुद्घिजीवियों की तरह देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी सोवियत आर्थिक मॉडल से बहुत प्रभावित थे। स्टालिन के सुधारों का जायजा लेने के बाद तो उन्हें इस बात का और यकीन हो गया था कि राज्य के नेतृत्व वाली अर्थव्यवस्था ही देश को उबार सकती है। 
 
पीसी महालनोबिस और योजना आयोग के चलते देश के आर्थिक मॉडल में चीन के उस सरकारी पूंजीवाद की कोई छाया नहीं नजर आई जो दो दशक बाद उभरी और जिसके चलते चीन भारत से आगे निकल गया। महालनोबिस के मॉडल में बहुत अधिक नियंत्रण की व्यवस्था थी जिसके चलते कारोबारी लालफीताशाही में उलझे रहते और इसके कारण आर्थिक गतिविधियों या परिसंपत्ति वितरण का कोई प्रभाव नजर नहीं आता। उदारीकरण के पहले देश की धीमी आर्थिक वृद्घि दर ने देश को गरीब बनाए रखा। इंदिरा गांधी ने देश की गरीबी में राजनीतिक अवसर पहचाना और संरक्षणवाद, राष्टï्रीयकरण और लाइसेंस-परमिट राज के जरिये खुद को मजबूत किया। गरीबी हटाओ के चुनावी नारे के पीछे एक बात छिप गई कि मोटे तौर पर परिसंपत्ति निर्माण भ्रष्टï राजनेताओं और अफसरशाहों के स्तर पर हो रहा था। गरीबी को ऐसे शायद ही कभी भुनाया गया था। परिसंपत्ति निर्माण करने वालों को लेकर संदेह की जड़ें इसी आर्थिक मॉडल में निहित हैं। इन वजहों ने कुछ कारोबारी समूहों को प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त हासिल करने के लिए राजनीतिक रिश्ते कायम करने के लिए प्रोत्साहित किया या कहें मजबूर किया। ऐसा करके उन्होंने विदेशी और घरेलू प्रतिस्पर्धा से निजात पाई। वाहन उद्योग को इसके लिए जाना जाता है। कारोबार और राजनीति के इस गठजोड़ ने एक दुष्चक्र को जन्म दिया। ढांचागत गतिरोधों के कारण कारोबारी वृद्घि धीमी बनी रही। करों के कारण उद्यम चलाना व्यवहार्य नहीं रह गया। उच्च कर दरों के कारण कर वंचना भी बढऩे लगी। जिनके पास निर्यात लाइसेंस था, उन्होंने भारी मात्रा में धन को विदेशी टैक्स हैवन में ठिकाने लगा दिया। 
 
ऐसे में एक ऐसा राजनेता सामने आया जिसने इन परिसंपत्ति निर्माताओं को संदेह की दृष्टिï से देखा। राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह की काली सूची ने कारोबारी समुदाय को बुरी तरह भयभीत कर दिया। यह सही है कि आर्थिक सुधारों ने देश के उद्यमी जगत को किफायती और उत्पादक बनाया। उसने इसे विस्तार का अवसर दिया और कुछ हद तक पुनर्वितरण की स्थिति तैयार की। कमजोर शुल्क दर और लाइसेंस व्यवस्था खत्म करने से कुछ हद तक आर्थिक विस्तार का अवसर दिया और लोगों को अपेक्षाकृत समृद्घ बनाया। पहली बार परिसंपत्ति निर्माण वैध था और उसकी सराहना की जा रही थी। यह महत्त्वाकांक्षा में तब्दील हो रहा था लेकिन राजनीतिक वर्ग अभी भी इस संदेश से दूरी बना रहा था। संप्रग सरकार गरीब समर्थक बनी रही जबकि इस बीच लाखों की तादाद में लोग गरीबी के भंवर से बाहर निकले। 
 
आज दिक्कत यह है कि कारोबारी जगत के पुराने प्रमुख परिसंपत्ति निर्माता अभी भी लाइसेंस राज से जूझ रहे हैं। चार दशक के दंडात्मक कराधान और सीमित प्रतिस्पर्धा ने इन बातों को देश के कारोबारी प्रशासन मानक के डीएनए में शामिल कर दिया। कर वंचना, परिवार आधारित कारोबारी ढांचा, बोर्ड की अवमानना और सरकारी बैंकिंग का गलत इस्तेमाल करना आदि आज भी वैसे ही हैं जैसे कि सन 1991 के पहले थे।  अब निजी क्षेत्र आर्थिक वृद्घि का वाहक है। मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के दिन जो बात कही वह सच की समझ को दर्शाता है। उन्हें ऐसा माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें कॉर्पोरेट क्षेत्र अच्छी तरह विकसित हो और वैध तरीके से प्रतिस्पर्धा करे। सरकार को बेहतर संचालन मानक स्थापित करने चाहिए। फिलहाल ऐसा नहीं नजर आ रहा है।
Keyword: narendra modi, company, CSR,,
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