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गलत राह ले जाते हैं दक्षिणपंथ के मिथक

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  August 25, 2019

गत सप्ताह इस स्तंभ में हमने जम्मू कश्मीर को लेकर देश के उदारवादी समुदाय के पांच प्रमुख मिथकों को तथ्यों और हकीकत की कसौटी पर कसा था। तार्किक रूप से देखें तो अब हमें दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों की मान्यताओं के साथ भी यही करना चाहिए। यह समूह बहुत बड़ा है। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के मतदाता वर्ग से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। उनकी यह मान्यता है कि अनुच्छेद 370 और कश्मीरी नेताओं का दोहरापन, देश के उदारवादियों की राज्य सत्ता के सामूहिक अन्याय की धारणा से कहीं अधिक बड़ी समस्या है। दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों का यह जुनून तथ्यों और हकीकत की कम समझ से पैदा होता है। 

 
ये मिथक चाहे वाम के हों, दक्षिण के या मध्यमार्गियों के, इनसे देश का कोई हित नहीं सधने वाला है। इनमें कश्मीर भी शामिल है। यही कारण है, हमें इन पर तथ्यों और तर्कों की रोशनी डालनी चाहिए। इसलिए क्योंकि मान्यताएं अच्छी होती हैं लेकिन अगर वे तथ्यात्मक न हों तो बहुत खतरनाक भी होती हैं। मैं कश्मीर को लेकर दक्षिणपंथ के पांच पसंदीदा मिथक प्रस्तुत कर रहा हूं।
 
1. पहला और प्रमुख मिथक यह है कि अनुच्छेद 370 और राज्य को मिला विशेष दर्जा ही समस्या की जड़ था। अब यह समाप्त हो चुका है और समस्या भी खत्म हो चुकी है। इतिहास बन चुका है और एक नया सवेरा सामने है।  अच्छी बात है लेकिन इतिहास बनने से पिछला इतिहास मिट नहीं जाता। अनुच्छेद 370 कश्मीर तथा राष्ट्रीय चेतना के लिए एक भावनात्मक मसला था लेकिन तथ्य यह है कि यह अस्थायी अनुच्छेद 69 वर्ष बाद मूल प्रावधान की छाया भी नहीं बचा था। संभवत: विश्वनाथ प्रताप सिंह को छोड़कर देश के हर प्रधानमंत्री ने अनुच्छेद 370 को शिथिल किया। इस माह के आरंभ में मोदी सरकार द्वारा भंग किए जाते वक्त यह केवल औपचारिकता रह गया था। पहले के रक्षा, विदेश मामलों, वित्त और संचार के साथ-साथ अब संविधान के 395 में से 290 अनुच्छेद कश्मीर पर सीधे लागू हैं। हां, कुछ अड़चनें अवश्य बाकी थीं जिनमें आम भारतीयों को कश्मीर में संपत्ति और रोजगार का अधिकार न होना प्रमुख था। इसके अलावा गैर कश्मीरी व्यक्ति से शादी करने वाली कश्मीरी स्त्री को संपत्ति से बेदखल कर दंडित करना और ऐसे विवाह से उत्पन्न बच्चों को कश्मीरी होने का दर्जा न देना, तीन तलाक और दंड संहिता की धारा 377 का प्रदेश में लागू न होना आदि इसके उदाहरण हैं। यह अन्याय है लेकिन इसे अलगाव का मूल कारण मानना गलत है। अगले दो अहम मिथकों का संबंध पाकिस्तान से है। एक तो यह पाकिस्तान आक्रांता है जिसे निकाल बाहर करने की आवश्यकता है और दूसरा वह उकसाने का काम करता है।
 
2. दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी बहस सन 1948 से यही कहती आई है: अगर भ्रमित नेहरू कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में न ले गए होते तो भारतीय सेना गिलगित-बाल्टिस्तान समेत पूरा कश्मीर पाकिस्तान से छीन लेती। सबकुछ सरदार पटेल के हाथ में होता तो शायद ऐसा नहीं होता। हकीकत अलग है और क्योंकि यह असहज करने वाली है इसलिए यह बदल नहीं जाएगी। सन 1947-48 में दो मौसमों की लड़ाई के बाद जाड़े में दोनों सेनाएं गतिरोध पर थीं। दोनों देशों का सैन्य साहित्य पढऩे पर समझा जा सकता है कि कैसे भौगोलिक स्थिति, जमीनी हालात, सैन्य शक्ति और स्थानीय समुदायों की स्थिति के कारण किसी के लिए भी आगे बढऩा मुश्किल हो गया था। नवंबर दिसंबर में जब पहले चरण की लड़ाई शुरुआती दौर में थी तब शायद भारत उड़ी के पार मुजफ्फराबाद तक पहुंच सकता था। परंतु जब तक बनिहाल दर्रा बर्फ से बंद था, तब तक सैनिकों को हवाई या सड़क मार्ग से पहुंचाना संभव नहीं था। भारत और पाकिस्तान दोनों पक्षों से लोग यह दावा करते हैं कि सन 1948 में जीत संभव थी लेकिन यह कपोल कल्पना है। स्मरण रहे कि यह जंग उस समय हुई जब दोनों सेनाओं का नेतृत्व ब्रिटिश प्रमुखों के पास था। भारत को उस समय पर्याप्त सैन्य बढ़त हासिल नहीं थी। विभाजन के वक्त पाकिस्तान को संयुक्त भारत का एक तिहाई सैन्य बल और अर्थव्यवस्था का छठा हिस्सा दिया गया था। आगे चलकर भले ही उसने मुल्क बरबाद कर लिया लेकिन सन 1947-48 में दोनों सेनाओं में इतना अंतर नहीं था कि हिमालय के पार वह चर्चित जीत हासिल हो जाती। क्या अब पाकिस्तान को उसके कब्जे वाले कश्मीर से बाहर निकाला जा सकता है? यह संभव नहीं है। सन 1948 से हम कई लड़ाइयां और झड़पों के साक्षी रह चुके हैं, इनमें दोनों पक्षों से हजारों जानें गई हैं परंतु सन 1971 को छोड़ दें तो दोनों पक्षों की सेनाएं कमोबेश बराबरी पर रहीं। सियाचिन भी निर्जन था और उस पर किसी का कब्जा नहीं था। उसे बिना लड़े हासिल कर लिया गया। असली लड़ाई में पाकिस्तानी सेनाएं रक्षात्मक युद्घ करने के लिए सक्षम हैं। ऐसे में 1948 में गंवाया इलाका वापस लेने और बांग्लादेश के तर्ज पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लेना दोनों अतार्किक मिथक हैं। 
 
3. पाकिस्तान के दुष्प्रचार से फैले वैचारिक प्रदूषण और इस्लामिक कट्टïरपंथ को छोड़ दिया जाए तो कश्मीर के लोग आमतौर पर विनम्र, शांतिप्रिय और देशभक्त हिंदुस्तानी हैं। इनमें से पहला मामला अब नहीं है। 30 वर्ष के उपद्रव के शुरुआती चरणों में अधिकांश सैन्य लड़ाके पाकिस्तान से आते थे। बल्कि सन 1990 के दशक के आरंभ में आईएसएआई ने कई विदेशी जिहादी (अफ्रीकी और अरब देशों से) भेजे। अधिकांश स्थानीय कश्मीरी इनसे बहुत नफरत करते थे। बीते दशक में उपद्रवी अधिकांशतया स्थानीय रहे हैं। ये औसत युवा कश्मीरी नाराज और पीडि़त महसूस करते हैं और हथियार उठाने को तैयार हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न घटनाओं में मृत या पकड़े गए आतंकी कश्मीरी हैं। ये स्थिति बदलेगी नहीं। घाटी में इतने हथियार मौजूद हैं कि छोटे आतंकी समूह चलते रह सकें। पाकिस्तान भी इनकी आपूर्ति जारी रखेगा। अनुच्छेद 370 का खात्मा और पुलिस पर नियंत्रण तथा मजबूत सुरक्षा के साथ केंद्र का शासन आतंकवाद को समाप्त नहीं कर सकेगा।
 
4. सभी कश्मीरियों को निवेश और आर्थिक विकास चाहिए: इस बात पर यकीन करना मानव मस्तिष्क को गलत समझना होगा। किसी भी तरह का आर्थिक विकास, केंद्र की सहायता आदि लोगों का दिमाग तब तक नहीं बदल सकते जब तक कि उनका सामूहिक गुस्सा, पीड़ा और अलग-थलग पडऩे की भावना खत्म न की जाए। संपत्ति खरीदकर और बाहरी लोगों को बसाकर, यहां की औरतों से विवाह कर कश्मीर का जनांकीय ढांचा बदलने की मूर्खतापूर्ण और दंभ भरी बातों से माहौल और खराब हो रहा है। जम्मू कश्मीर का यह भू-भाग हमेशा भारत के साथ था और कोई इसे छीन नहीं सकता। परंतु जब तक घाटी के लोग साथ नहीं है कुछ नया नहीं होने वाला है। आखिर में हम आते हैं सबसे संवेदनशील मिथक के बारे में जो सर्वाधिक आत्मघाती भी है। 
 
5. वहां के आबादी के ढांचे को बदलने के बारे में सोचने वालों को इजरायल से सबक लेना चाहिए। अगर आप इजरायल से सबक लेंगे तो ऐसा करने का सोचेंगे भी नहीं। इजरायल दशकों से इस काम में लगा है और नाकाम है। उसे न तो शांति हासिल हुई, न ही भू-भाग पर उसका दावा मजबूत हुआ। भारत के पास भूभाग है, पाकिस्तान और चीन को छोड़कर दुनिया का कोई देश इसे विवादित नहीं मानता। इजरायल जहां यहूदी देश है, वहीं भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इतना ही नहीं यह मामला पुरानी दिल्ली के दो मोहल्लों, चंडीगढ़ अथवा गुरुग्राम के किसी सेक्टर की आबादी का ढांचा बदलना नहीं है। इसके लिए करोड़ों हिंदुओं को घाटी में बसाना होगा। यह कभी नहीं होगा। यह चीन नहीं है जहां आप लाखों लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर बसा दें। इसके बावजूद चीन तिब्बत या शिनच्यांग में शांति नहीं स्थापित कर सका। न ही इजरायल को ऐसा करने से सुरक्षा या स्थिरता हासिल हुई।
 
भारत के बारे में अलग बात यह है कि हम विविधता को आसानी से अपना सकते हैं। कश्मीर के लिए यही सबसे बेहतर होगा। दिलों और दिमाग की लड़ाई अब भी वही है: क्या भारत उन्हें पाकिस्तान से बेहतर पेशकश कर रहा है? उनके आत्मसम्मान, प्रभुता और उनकी पहचान के बचाव के साथ? अनुच्छेद 370 से निजात पाना अच्छा है, यह लंबे समय से लंबित था। आगे की राह वाजपेयी के तरीकों से सीखकर निकलेगी न कि शी चिनफिंग के।   
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