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जनधन: असल वित्तीय समावेशन अभी हकीकत बनना बाकी

अनूप रॉय / मुंबई August 25, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में लालकिले से 15 अगस्त 2014 के पहले भाषण में वित्तीय समावेशन को लेकर जंग छेडऩे की बात कही थी। उन्होंने बैंकरों से कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर परिवार का बैंक खाता हो और इसके साथ ही व्यापक पेंशन योजनाएं व माइक्रो इंश्योरेंस शुरू किया गया। पांच साल के बाद 36.55 करोड़ खाते खोले गए, 28.91 करोड़ रुपे कार्ड जारी हुए और 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा प्रधानमंत्री जनधन योजना (पीएमजेडीवाई) के तहत जमा हुए।  यह योजना एक सप्ताह में सर्वाधिक खाते खोलने को लेकर गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड में भी आ गई।  23 अगस्त से 29 अगस्त, 2014 के बीच 1.8 करोड़ खाते खोले गए। जीरो बैलेंसके जनधन खातों पर 30,000 रुपये प्रति व्यक्ति जीवन बीमा और 1 लाख रुपये दुर्घटना बीमा दिया गया। सक्रिय ग्राहक को बैंक से 5,000 ओवरड्राफ्ट सुविधा भी दी गई। 
 
इस योजना से वित्तीय व्यवस्था के बाहर के लोगों में बहुप्रतीक्षित वित्तीय अनुशासन आया और तमाम प्रत्यक्ष नकदी अंतरण में बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई और लाभार्थी को सीधे पैसे मिलने लगे।  येस बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी रवनीत गिल ने कहा, 'जनधन योजना बैंकों के लिए बहुत अच्छी रही। नकदी रहित अर्थव्यवस्था की ओर बढऩे के सरकार के लक्ष्य में वित्तीय समावेशन अहम है। इससे सरकार को सीधे गरीबों को सब्सिडी देने में मदद मिली। इस योजना से नोटबंदी के समय भी फायदा हुआ और बाद में वस्तु एवं सेवाकर लागू करने में भी लाभ हुआ जिसने अर्थव्यवस्था को बदल दिया है।' 
 
लेकिन एक समस्या भी है। जब खाते खोले गए तब ज्यादातर ग्राहकों को नहीं पता था कि इसका क्या करना है। और बैंकर अपने ऊपर इसका आरोप नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा कि खाते खोलने का काम उन्होंने कर दिया है और देश के हर कोने में वित्तीय समावेशन से बाहर रहे लोगों को शामिल करने के लिए उन्होंने अपने बैंकिंग प्रतिनिधि भेजे।  पीएमजेडीवाई की वेबसाइट के मुताबिक 1,26,000 बैंकिंग प्रतिनिधि शाखा विहीन बैंकिंग सेवाएं दूरस्थ इलाकों में दे रहे हैं। सामाजिक आर्थिक मसलोंं पर काम करने वाले थिंक टैंक स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन समीर कोचर ने के मुताबिक वित्तीय समावेशन के इस अभियान के लिए सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिे, जिसकी वजह से बचत की आदत बढऩे के साथ पूंजी सृजन हुआ। मुफ्त में खाते खोले जाने से लाभार्थियों का बड़ा हिस्सा योजना का लाभ लेने को प्रोत्साहित नहीं होता। पर्याप्त वित्तीय साक्षरता की कमी की वजह से ऐसा होता है। 
 
कोचर ने कहा, 'रिजर्व बैंक और सेबी दोनों ही नियामकों के पास कोई रास्ता नहीं है कि लोगोंं को वित्तीय उत्पादों के इस्तेमाल के लिए शिक्षित किया जाए। और सही कहा जाए तो यह जिम्मेदारी उन्हीं पर जाती है क्योंकि बैंकों ने सही मायने में लोगों को शिक्षित करने की कोशिश भी नहीं की है।'  वित्तीय रूप से बाहर का तबका दो तरह के कर्ज चाहता है। आजीविका ऋण और खपत ऋण। आजीविका ऋण मुद्रा योजना के तहत मिल रहा है, जिसमें बगैर किसी गिरवीं के 10 लाख रुपये तक कर्ज छोटे कारोबारियों को मिलता है। लेकिन इन खाताधारकों को खपत ऋण उपलब्ध नहीं है। 
Keyword: jandhan bank, narendra modi,,
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