बिजनेस स्टैंडर्ड - कर कानूनों व व्यवहार में ही निहित है आतंक
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कर कानूनों व व्यवहार में ही निहित है आतंक

देवाशिष बसु /  August 23, 2019

यदि संसाधन जुटाने का बहुत अधिक दबाव नहीं हो तो कर आतंक को सीमित करना भी इतना मुश्किल नहीं होगा। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं देवाशिष बसु

 
मार्च 2018 में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के पूर्व कर्मचारी अशोक सिंह (बदला हुआ नाम) को आयकर अधिनियम की धारा 276 सीसी के तहत एक नोटिस मिला। इसके मुताबिक वह वर्ष 2011-12 (आकलन वर्ष 2012-13) का अपना आयकर रिटर्न तय समय में दाखिल नहीं कर सके थे। इस अभियोग के दंड की बात करें तो यदि कर की राशि एक लाख रुपये से अधिक हुई तो न्यूनतम छह माह और अधिकतम 7 वर्ष का सश्रम कारावास और जुर्माना देना होता। अशोक ने 2012 में नौकरी छोड़कर एक सलाहकार कंपनी शुरू कर दी थी। वित्त वर्ष 2011-12 में उन्हें अपनी नौकरी की एक खास अवधि का ही वेतन मिला था। स्रोत पर आयकर कटौती की गई थी और नियोक्ता ने उसे चुका दिया था। शेष अवधि में उनकी आय सलाहकार सेवा से हुई थी। वर्ष 2012 में उनके परिवार में बीमारी का प्रकोप था और साथ ही नई सेवा शुरू करने के कारण काम का दबाव भी बहुत अधिक था। 
 
यही कारण था कि वह वित्त वर्ष 2011-12 (आकलन वर्ष 2012-13) का कर रिटर्न नहीं जमा कर पाए, जो उन्हें 31 अगस्त 2012 तक जमा करना था। चूंकि रिटर्न दाखिल करने का समय बीत चुका था इसलिए उन्होंने फरवरी 2015 में कर और ब्याज चुकाने के पश्चात रिटर्न भरा। स्पष्ट है कि वह कर चोरी करने वाले व्यक्ति नहीं थे और आयकर विभाग ने भी उनसे तीन वर्ष तक कुछ नहीं पूछा। उन्होंने स्वेच्छा से आगे आकर कर और ब्याज की राशि चुकाई। इसके बावजूद समन जारी कर कहा गया कि उन्होंने जानबूझकर कर नहीं चुकाया है। उन्होंने अपनी तरह से कारण स्पष्ट किया और अनुरोध किया कि उनके खिलाफ कार्रवाई न की जाए। इसके बावजूद विभाग ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आखिरकार हम स्वच्छ भारत में रहते हैं जहां नेता और बाबू पवित्र और मौलिक हैं तथा हम जैसे बाकी लोगों को हर रोज सैकड़ों पुरातन कानूनों का पालन न कर पाने के लिए कड़े सबक सिखाए जाते हैं। जुलाई 2019 में अशोक घबराहट के साथ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित हुए। खुशकिस्मती से उनका अधिवक्ता उन्हें जमानत दिलाने में कामयाब रहा। अब उनके सामने क्या विकल्प हैं? इस बारे में बात करने के पहले मैं कर आतंकवाद के व्यापक विषय पर बात करना चाहूंगा जिस पर इन दिनों मीडिया में खूब ध्यान दिया जा रहा है। मौजूदा सरकार के मजबूत समर्थक और इन्फोसिस के पूर्व बोर्ड सदस्य मोहनदास पई समेत अधिकांश लोग मानते हैं कि करदाताओं की समस्याओं के लिए अत्यधिक ईष्र्यालु कर अधिकारी उत्तरदायी हैं।
 
हाल ही में जब प्रधानमंत्री से कर आतंकवाद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'यह सही है कि कर प्रशासन में कुछ गलत लोग हैं जिन्होंने अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए करदाताओं को परेशान किया है। या तो उन्होंने ईमानदार करदाताओं को निशाना बनाया या फिर छोटे मोटे मामलों या प्रक्रियागत उल्लंघन के मामलों में जरूरत से ज्यादा कदम उठाए। मैंने यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि ईमानदार करदाताओं को परेशान न किया जाए और छोटी मोटी चूक करने वाले या प्रक्रियागत गलती करने वालों पर जरूरत से ज्यादा कड़ाई न की जाए।'
 
समस्या की जड़
 
खेद की बात है कि कर अधिकारियों को दोष देने से हम समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचेंगे। सरकार स्वयं समस्या है और ऐसा दो तरह से है। पहला, कर कानून और परिपत्र आदि पुरातन हैं और दिन ब दिन वे और पुरातन होते जा रहे हैं। अधिकारी तो केवल उनका क्रियान्वयन कर रहे हैं। दूसरा, बड़ी समस्या हैं मंत्रालय द्वारा राजस्व संग्रह के कठिन लक्ष्य तय किया जाना। ये अधिकारियों को मजबूर करते हैं कि वे अतिरंजित कदम उठाएं। ऐसा भी होता है कि एक रुपये का भी कर दावा गंवाने पर उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती है। इनमें से पहले मामले को समझने के लिए हमें अशोक की स्थिति को दोबारा देखना होगा कि वह जेल जाने से बचने के लिए क्या कर सकते हैं। अपनी देरी की भरपाई वह 'कंपाउंडिंग' करके यानी सरकार को पैसे देकर कर सकते हैं। क्या आपको अंदाजा है कि उन्हें कितनी राशि चुकानी होगी?
 
सरकार ने 14 जून, 2019 को धारा 276 सीसी के लिए कंपाउंडिंग शुल्क की घोषणा की। आयकर रिटर्न दाखिल नहीं कर पाने पर डिफॉल्ट की अवधि को आकलन पूरा होने की अवधि या फाइलिंग की तयशुदा तारीख मे से जो भी पहले आए उससे कम कर दिया जाएगा और कंपाउंडिंग शुल्क होगा 2,000 रुपये प्रतिदिन। एक अनुमान के मुताबिक अशोक को 16 लाख रुपये तथा कुछ अन्य शुल्क चुकाने होंगे। यही बात एक अन्य वित्तीय सलाहकार पर लागू होती है। वह अपनी अन्य आय का एक छोटा हिस्सा दर्शाने में चूक गईं। उन्होंने स्वैच्छिक रूप से इसका खुलासा किया और बकाया चुका दिया। 10 वर्ष बाद उन्हें जेल की सजा के उल्लेख वाला एक नोटिस मिला। उन्होंने 12 लाख रुपये कंपाउंडिंग शुल्क चुकाया। मुख्य आयकर आयुक्त इस बात से सहमत थे कि यह अनुचित है लेकिन वह कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि यही कानून है। जगह की कमी के कारण मैं और अधिक उदाहरण साझा नहीं कर पा रहा लेकिन कर सलाहकारों के पास ऐसे मामलों की सूचियां मौजूद हैं।
 
दूसरा मुद्दा कठिन राजस्व लक्ष्य का है। यह काफी पुराना मसला है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को कठिन लक्ष्य तय करने और कर आतंक फैलाने के लिए जाना जाता है। यह सरकार पिछली किसी भी सरकार से अधिक प्रतिबद्ध है। इसके नतीजों का अनुमान भी आप लगा सकते हैं। दोनों समस्याओं का हल केवल कर अधिकारियों पर लगाम लगाने में नहीं है। अगर घर की दीवार में नमी हो तो उसकी पुताई नहीं की जाती है। बल्कि यह पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि वह नमी कहां से आ रही है। इस मामले में मूल समस्या है सरकार का बड़ा आकार। इसकी बड़ी जरूरतें ही सरकार पर यह दबाव बनाती हैं कि वह कर अधिकारियों पर अधिक से अधिक वसूली का जोर डाले। यह दबाव दिनबदिन बढ़ता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात से अवगत नहीं है। याद कीजिए सन 2014 के आम चुनाव के पहले दिया गया उनका नारा जिसमें वह न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन की बात कहते थे। अगर संसाधन जुटाने का दबाव ज्यादा न हो तो ईमानदार करदाता कर आतंक से बच सकते हैं। यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। 
Keyword: income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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