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नदियों को जोडऩे से मॉनसून पर खतरा?

मिहिर शाह /  August 21, 2019

अगर नदियों को जोडऩे की परियोजना अमल में लाई जाती है तो भारत में मौसम चक्र के सबसे अहम किरदार मॉनसून पर भी गहरा असर पड़ सकता है। बता रहे हैं मिहिर शाह

 
देश भर में जल संकट गहराने के साथ ही विज्ञान एवं अध्यात्म दोनों के बुनियादी सिद्धातों के उल्लंघन के लिए तैयार होने की सीमा और हमारा दु:साहस भी बढ़ चुका है। अपनी गलतियों से सबक सीखने के बजाय हम गलत रास्ते पर ही आगे बढऩे से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं। भारत की नदियों को एक-दूसरे से जोडऩे का प्रस्ताव दोषपूर्ण धारणाओं की एक पूरी शृंखला पर आधारित है। कहा जाता है कि एक ही समय पर भारत के कुछ हिस्सों में बाढ़ और कुछ हिस्सों में सूखा होता है, लिहाजा पानी की अधिकता वाले क्षेत्रों से किल्लत वाले क्षेत्रों में पानी पहुंचा दिया जाए तो सबकी समस्या दूर हो जाएगी। सवाल है कि क्या वाकई में भारत के कुछ इलाकों में बहुत अधिक पानी है? पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में सोचिए। क्या आपको पता था कि धरती पर सर्वाधिक बारिश वाली जगहों में शुमार सोहरा (पहले चेरापूंजी के नाम से मशहूर) अब पीने लायक पानी की कमी से गुजर रहा है? जल प्रबंधन की पुरानी परिपाटी को इसकी वजह माना जा सकता है जिसमें अपने जलग्रहण क्षेत्रों का बेहतर प्रबंधन कर पाने में हम नाकाम रहे हैं। इसके अलावा प्राकृतिक झरनों को हमने बरबाद कर दिया और भूमिगत जल का खूब दोहन किया। जलवायु परिवर्तन ने हालात को और भी खराब कर दिया है। आज मेरा संगठन 'समाज प्रगति सहयोग' इस जटिल समस्या का समाधान तलाशने में लगा हुआ है लेकिन मैं बता सकता हूं कि सोहरा में महज 70,000 लोग होने और दिल्ली की तुलना में वहां दस गुना बारिश होने के बावजूद किसी और के लिए वहां अतिरिक्त जल नहीं रह गया है। भारतीय उप-महाद्वीप में मॉनसून पर निर्भरता के चलते नदियों में अधिक पानी होने की स्थिति लगभग एक समय पर ही पैदा होती है। एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि भारत के जल-अधिकता वाले नदी घाटी क्षेत्रों में मॉनसूनी बारिश में खासी कमी आई है। इस तरह नदी-जोड़ परियोजना की मूल धारणा ही सवालों के घेरे में आ जाती है।
 
यह बड़ी राहत की बात है कि वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में नदी-जोड़ परियोजना का जिक्र तक नहीं किया है। शायद यह नए जलशक्ति मंत्री की सोच की स्पष्टता का संकेत देता है। लेकिन इस विचार के समय-समय पर सामने आने की बात को ध्यान में रखें तो इस खतरनाक विचार का ध्यानपूर्वक अवलोकन जरूरी है। नदी-जोड़ परियोजना के तहत हिमालयी खंड में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों पर बड़े बांधों और उत्तरी एवं पूर्वी राज्यों के जल-अधिकता वाले इलाकों में पानी जमा करने की योजना है। फिर इस पानी को नहरों के जरिये पानी की कमी वाले मध्य, दक्षिणी एवं पश्चिमी इलाकों में भेजा जाएगा। वहीं परियोजना के प्रायद्वीपीय खंड के मुताबिक प्रायद्वीप में मौजूद नदियों के अतिरिक्त पानी को भी जमा कर दक्षिणी एवं पश्चिमी हिस्सों में भेजा जाएगा। इस परियोजना के तहत कुल 44 नदियों को 9,600 किलोमीटर लंबी नहरों के जरिये जोडऩे की तैयारी है जिस पर 11 लाख करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। यह परियोजना की असली लागत का एक अनुमान भर है और असली लागत इससे काफी अधिक रह सकती है। क्रियान्वयन में विलंब की आशंकाओं और ऊर्जा मद के अलावा खेती एवं जंगल को होने वाले नुकसान और मानवीय विस्थापन पर होने वाला खर्च भी इसमें शामिल नहीं है। असली विडंबना यह है कि भारत की स्थलीय संरचना देखते हुए नदियों को जोडऩे की जो परिकल्पना की गई है, वह मध्य एवं पश्चिमी भारत के असली सूखाग्रस्त इलाकों को दरकिनार कर देती है। ये इलाके समुद्र तल से 300-1,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं।
 
हाल में वैज्ञानिकों ने भारतीय नदी प्रणाली में इतने बड़े स्तर पर होने वाले दखल के संभावित असर का बारीकी से परीक्षण शुरू कर दिया है। परियोजना में शामिल 44 में से 29 नदियों के बारे में 2018 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक इस परियोजना की वजह से 3,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र डूब जाएगा और करीब सात लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। नहरें बनते समय विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या अलग होगी। यह 29 में से 24 नदियों के प्रवाह को भी बाधित करेगा जिससे गीली जमीन (वेटलैंड) एवं नदियों के चौड़े मुहाने (एस्चुअरी) तक पहुंचने वाला पानी भी कम हो जाएगा। जलमार्ग में नए दूषणकारी तत्त्व, प्रजातियां और बीमारियां पैदा करने वाले एजेंट मिलेंगे।  भारतीय उप-महाद्वीप के पहले से ही संकटग्रस्त डेल्टा क्षेत्र नदियों से लाई जाने वाली गाद में 87 फीसदी तक कमी हो जाने से और भी अधिक खतरे में पड़ जाएंगे। पानी के प्रवाह में कमी आने का असर डेल्टा क्षेत्रों में खारेपन पर असर पड़ेगा जिससे आगे चलकर समुद्र का जलस्तर बढऩे और भूमिगत जल एवं नदी जल के खारे होने की भी स्थिति पैदा हो सकती है। नदियों एवं डेल्टा क्षेत्रों में खारापन बढऩे से नदियों के मुहाने पर गिरने वाली गाद में और कमी आएगी। दुर्लभ पारिस्थितिकी एवं अहम कृषि क्षेत्र तूफानों की संख्या बढऩे, नदियों की बाढ़ और खारापन बढऩे को लेकर अधिक संवेदनशील हो जाएंगे।
 
कृष्णा, गोदावरी एवं महानदी नदियों में प्राकृतिक एवं मानव-निर्मित कारणों से पानी का प्रवाह पहले से ही धीमा हो चुका है। ऐसे में नदी-जोड़ परियोजना केवल इस समस्या को बढ़ाने का ही काम करेगी। यह कोलोरेडो, नील, सिंधु एवं येलो नदी प्रणालियों से मिलती-जुलती स्थिति है जहां ऐसी ही परियोजना सीमित स्तर पर लागू करने की कोशिश की गई थी। एलिमेंटा अध्ययन का दावा है कि 'भारत की नदी-जोड़ परियोजना अमेरिका में एक नदी प्रणाली से दूसरी प्रणाली तक पानी पहुंचाने की सबसे बड़ी परियोजना से भी 50-100 गुनी बड़ी है और इसके मानव इतिहास की सबसे बड़ी निर्माण परियोजना बनने की संभावना है।' 
 
आखिर में, हमें यह मान लेना चाहिए कि नदी-जोड़ परियोजना भारत की मॉनसून प्रणाली की समग्रता को ही गहराई से प्रभावित कर सकती है। नदियों के मीठे जल के लगातार समुद्र में जाने से ही बंगाल की खाड़ी के ऊपरी स्तरों में पानी में लवणता का निम्न स्तर और निम्न सघनता बनी रहती है। यह समुद्र में पानी के स्तर का ऊंचा तापमान (28 डिग्री सेल्सियस से अधिक) बने रहने की वजह है जिससे समुद्री इलाके में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है और मॉनसूनी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता है। उप-महाद्वीप के अधिकांश हिस्से में बारिश काफी हद तक कम खारे पानी के इस जलस्तर से ही निर्धारित होती है। लेकिन नदी-जोड़ परियोजना के तहत नदियों के मार्ग में बड़े अवरोध खड़े करने से समुद्र तक पहुंचने वाले मीठे पानी का प्रवाह बाधित होगा जिसका उप-महाद्वीप में जलवायु एवं बारिश पर गंभीर दीर्घकालिक दुष्परिणाम हो सकते हैं जो आबादी के बड़े हिस्से की आजीविका को भी खतरे में डाल सकता है।
 
सच तो यह है कि सड़कों एवं बिजली आपूर्ति की तरह नदियों को इंसानों ने नहीं बनाया है जिनका मनमाने ढंग से बेजा इस्तेमाल किया जा सके। नदियां एक जीती-जागती पारिस्थितिकी हैं जिनका जन्म हजारों वर्षों के भीतर क्रमिक रूप से होता रहा है। लेकिन हम अपने अहंकार के वशीभूत होकर नदियों को काफी नुकसान पहुंचा चुके हैं। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी नदी जल प्रणालियों में नई जान फूंकने, प्रकृति के नाजुक धागे को उलझाने के बजाय विनम्रता एवं समझदारी दिखाते हुए विज्ञान एवं अध्यात्म का समावेश करने की दिशा में आगे बढ़ें।
 
(लेखक समाज प्रगति सहयोग के सह-संस्थापक हैं)
Keyword: river, monsoon, water,,
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