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बॉन्ड बाजार का फूटता हुआ बुलबुला!

आकाश प्रकाश /  August 20, 2019

भारतीय बॉन्ड बाजार में बन रहे बुलबुले के बारे में हमें चिंतित होने की जरूरत है। बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
वैश्विक स्तर पर बॉन्ड बाजारों में कुछ अटपटा हो रहा है। कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं। काफी कुछ अप्रत्याशित घटित हो रहा है। ऐसा कुछ पहले नहीं देखा गया था।
 
करीब 15 अरब डॉलर मूल्य के बॉन्ड इस समय दुनिया भर में नकारात्मक प्रतिफल दे रहे हैं।
 
अमेरिका से बाहर के 43 फीसदी बॉन्ड नकारात्मक प्रतिफल दे रहे हैं और जर्मनी में समूचा सरकारी बॉन्ड प्रतिफल वक्र नकारात्मक हो चुका है। 
 
यूरोप में विभिन्न जंक बॉन्ड जारीकर्ताओं को उधार पर रकम लेने के लिए भुगतान किया जा रहा है।
 
करीब 10 साल पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग तबाह कर देने वाला सब-प्राइम दौर फिर से वापसी करता हुआ दिख रहा है। 
 
करीब 75 फीसदी वाणिज्यिक रियल एस्टेट ऋण केवल ब्याज हैं जो कि वर्ष 2006 के बाद का सर्वोच्च स्तर है।
 
अमेरिकी कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में जंक श्रेणी से ठीक ऊपर वाले बीबीबी रेटिंग का आकार इससे पहले कभी भी इतना बड़ा नहीं था।
 
अमेरिका में 30 साल की परिपक्वता वाले बॉन्ड का प्रतिफल अब तक के निचले स्तर पर है और इसी समय जापान, जर्मनी, फ्रांस और स्विट्जरलैंड में नकारात्मक बॉन्ड प्रतिफल की स्थिति है। अधिकांश परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड में प्रतिफल वक्र उलटा हो गया है।
 
वर्ष 2008 में जब वैश्विक वित्तीय प्रणाली पतन के कगार पर थी तब जी-7 देशों के सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल तीन फीसदी रहा था। आज उन्हीं बॉन्ड का प्रतिफल एक फीसदी से भी नीचे आ चुका है।
 
ऑस्ट्रिया के 100 वर्षीय बॉन्ड की कीमतें परवलयाकार बढ़ी हैं। गत 12 महीनों में बॉन्ड का मूल्य 110 से बढ़कर 185 हुआ है और पिछले दो महीनों में ही यह 150 से बढ़कर 185 हो चुका है। बॉन्ड मूल्य की यह सारिणी देखने में दिग्गज तकनीकी कंपनियों के सुनहरे दिनों की तरह लगती है।
 
नियत आय बाजार में कीमतों के इस तरह काफी बढ़ा-चढ़ाकर रखने की दो संभावित व्याख्याएं हैं। पहली, नियत आय बाजार वृद्धि एवं मुद्रास्फीति दोनों मोर्चों पर एक बेहद कमजोर परिदृश्य की तरफ इशारा कर रहा है। प्रतिफल वक्र का उलटा होना इस तरफ संकेत देता है कि एक मंदी आसन्न है और नकारात्मक वास्तविक प्रतिफल बताते हैं कि बाजारों को मुद्रास्फीति में गिरावट जारी रहने की उम्मीद है। बाजार बेहद कमजोर आर्थिक वृद्धि और अवस्फीति का जोखिम बढऩे के परिदृश्य को आत्मसात करते नजर आ रहे हैं। मौजूदा व्यापार युद्ध और वैश्विक स्तर पर कंपनियों के प्रति भरोसा कम होने से हम एक वैश्विक मंदी की तरफ बढ़ सकते हैं जो कि असंभव नहीं लगता है। लेकिन उस स्थिति में भी बॉन्ड की कीमतें बढ़ी हुई नजर आती हैं।
 
इक्विटी बाजारों में बुलबुलों का होना सामान्य बात है। हम तमाम देशों में समय-समय ऐसा होते हुए देख चुके हैं। इनमें शायद सबसे बड़ा बुलबुला डॉट-कॉम का था जो मार्च 2000 में फूट गया। बॉन्ड बाजारों को कहीं अधिक टिकाऊ माना जाता है। निवेशक एक टिकाऊ एवं सुरक्षित आय के लिए ही बॉन्ड की तरफ रुख करते हैं, न कि कीमतों में जोरदार उछाल के लिए। आम तौर पर मीडिया भी बॉन्ड बुलबुलों की पहचान पर अधिक ध्यान नहीं देता है। हालांकि हाल में हमें बॉन्ड निवेशकों के बीच बुलबुले जैसा आचरण दिखने लगा है। एक परंपरागत बुलबुले में निवेशकों को इससे कोई मतलब नहीं होता है कि वे जो संपत्ति खरीद रहे हैं उसका वास्तविक मूल्य क्या है? वे इसे लेकर आश्वस्त होते हैं कि वे जरूरत पडऩे पर थोड़े समय में ही खरीदी गई संपत्ति को किसी और को बेच देंगे। आज के दौर में बड़े बेवकूफ केंद्रीय बैंक माने जाते हैं जो परिसंपत्ति खरीद कार्यक्रम शुरू होने पर इन परिसंपत्तियों को किसी भी भाव पर खरीद लेंगे। वैकल्पिक तौर पर पेंशन फंड एवं बीमा कंपनियों को नियत आय परिसंपत्तियां नियामकीय जरूरतों के चलते किसी भी भाव पर खरीदने के लिए बाध्य किया जा सकता है। निश्चित रूप से, जर्मनी के 15 वर्षीय बॉन्ड को नकारात्मक प्रतिफल देने के बावजूद अगर कोई खरीदता है तो उसका इरादा उसे परिपक्व होने तक बनाए रखने और पूंजी का तयशुदा नुकसान उठाने का कतई नहीं होता है। वे बॉन्ड इसलिए खरीद रहे हैं ताकि किसी और खरीदार को ऊंचे भाव पर बेच सकें।
 
बुलबुले-जैसे माहौल में निवेशक मौजूदा आर्थिक हालात को भविष्य में भी आरोपित करने लगते हैं। हमारे बॉन्ड बाजार में 30 वर्षों तक तेजी रही है। बाजार में तेजी का यह दौर राजकोषीय मजबूती, उत्पादकता में वृद्धि और भूमंडलीकरण से हासिल लाभों का नतीजा था। ब्याज दरों एवं मुद्रास्फीति में 30 वर्षों के भीतर लगातार गिरावट रही है। हालांकि इसकी संभावना काफी कम है कि आगे भी यह रुझान कायम रहने वाला है। न तो ब्याज दर और न ही मुद्रास्फीति में आगे और कमी की गुंजाइश रह गई है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि भविष्य में वे मुद्रास्फीति को बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। मुद्रास्फीति के लगातार लक्ष्य से नीचे रहने को ब्याज दरों में आगे और कटौती के लिए आधार बताया जाता रहा है। इसी तरह सरकारें राजकोषीय दायित्व निभाने में चूकती जा रही हैं। अधिक खर्च करने पर सरकारों को मत मिल रहे हैं। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में भी राजकोषीय संयम के अधिक मुरीद नहीं रह गए हैं।
 
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया भी अब अवरूद्ध नजर आती है। एक के बाद एक देश में व्यापार एवं आव्रजन संबंधी बाधाएं खड़ी हो रही हैं। भारत और चीन में उदारीकरण और वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बनने के अवस्फीतिकारी आघात दोहराए जाने की संभावना नहीं है। दुनिया के किसी भी अन्य क्षेत्र में उत्पादों की कीमतें वैश्विक स्तर पर कम कर पाने की क्षमता नहीं है। इन कारकों के उलट जाने से क्या हम वास्तव में उम्मीद कर सकते हैं कि बॉन्ड कीमतों से मिल रहे संकेतों के हिसाब से मुद्रास्फीति अब आगे से कम होती रहेगी?
 
बुलबुलों के मामले में मूल्य-निर्धारण बहुत मायने नहीं रखता है। आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। बॉन्ड की कीमतें ऐसे तय हो रही हैं जैसे वृद्धि एवं मुद्रास्फीति लौटकर ही नहीं आएगी। सिद्धांत कहता है कि कर्ज का पहाड़ वैश्विक अर्थव्यवस्था को नीचे की तरफ घसीट रहा है। जितना अधिक कर्ज दिया जाता है, वृद्धि एवं मुद्रास्फीति के अभाव की स्थिति उतनी ही मजबूत होती जाती है। ऐसे हालात सशक्त होने पर निवेशक उतना ही अधिक कर्ज लेते हैं क्योंकि वृद्धि नदारद रहने पर उन्हें यही परिसंपत्ति समझदार लगती है। यह खुद को सशक्त बनाने की कवायद लगती है। 
 
सामान्य सहज बुद्धि कहती है कि ये प्रतिफल स्तर अवास्तविक हैं। आखिर ग्रीस में उधारी की लागत अमेरिका से कम कैसे रह सकती है? निवेशक ऑस्ट्रिया के 100 वर्ष वाले बॉन्ड के पीछे क्यों भागेंगे जबकि प्रतिफल में एक फीसदी की भी वृद्धि से 30 फीसदी पूंजी का नुकसान हो जाएगा? समूची आर्थिक प्रणाली में पैसे की कीमत ही सबसे अहम संकेत है। बाकी सब कुछ जोखिम-मुक्त दर से इतर तय होता है। कृत्रिम रूप से कम जोखिम-मुक्त दर सभी परिसंपत्ति संवर्गों में कीमत संबंधी विकृति पैदा करेगी। वास्तविक दरों के शून्य हो जाने पर भी परिसंपत्ति समूहों में मूल्य की खासी उठापटक देखी जा सकती है। इसके अनचाहे नतीजे होंगे।
 
अगर भारत विदेशी मुद्रा सॉवरिन बॉन्ड जारी करने का फैसला करता है तो उसके लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता है। यह बॉन्ड जारीकर्ताओं का बाजार है। आप नाममात्र के प्रतिफल पर पैसे जुटा सकते हैं, लिहाजा इसका फायदा उठाइए। अगर एक बाजार या परिसंपत्ति समूह एक बुलबुले जैसे माहौल में हैं तो निश्चित रूप से आपको इसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करना चाहिए।
 
(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
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