बिजनेस स्टैंडर्ड - रीपो से उधारी दर जोडऩे की पहल
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रीपो से उधारी दर जोडऩे की पहल

बीएस संवाददाता / मुंबई August 19, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने आज कहा कि आरबीआई बैंकों को अपनी उधारी दरों को बाह्य बेंचमार्क जैसे कि रीपो दर से जोडऩे में मदद करेगा। ऐसा करने से ग्राहकों को मौद्रिक नीति का लाभ तेजी से पहुंचाया जा सकेगा। फिलहाल बैंक इसे स्वेच्छा से अपना रहे हैं और नियामक का इस पर कोई दबाव नहीं है। उद्योग संगठन फिक्की और बैंकिंग संगठन आईबीए की ओर से आयोजित सालाना बैंकिंग सम्मेलन एफआईबीएसी में आरबीआई गवर्नर ने कहा, 'मौद्रिक नीति दरों में कटौती का लाभ ग्राहकों तक तेजी और प्रभावी तरीके से पहुंचाने के लिए हम बैंकों के साथ लगातार चर्चा करते हैं और यह सतत प्रक्रिया है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) जैसे कुछ बैंक पहले ही अपनी नई उधारी को रीपो दर से जोड़ चुके हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि इस दिशा में और पहल होंगे और प्रक्रिया में तेजी आएगी। एक समय आएगा जब हमें इस व्यवस्था को औपचारिक बनाने की जरूरत होगी।'
 
आरबीआई इस साल अप्रैल में ही बैंकों को अपनी उधारी दरों को रीपो दर से जोडऩे का दबाव दिया था लेकिन बैंकों की आपत्ति के बाद कदम वापस खींच लिए गए। बैंकों का तर्क था कि ऐसा करने से उनके मार्जिन पर दबाव पड़ेगा क्योंकि जमा दरें उधारी दरों की तरह तेजी से कम नहीं होती हैं। हालांकि 7 अगस्त को आरबीआई द्वारा रीपो दर में 35 आधार अंक की कटौती के दो दिनों के अंदर सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों ने अपनी उधारी दर कम कर दी और कहा कि कम से कम खुदरा कर्ज को रीपेा दर से जोड़ा जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि जब कभी भी दर में कटौती या बढ़ोतरी होगी, उससे जुड़े कर्ज की दर में भी उसी तरह घट-बढ़ होगी। एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार ने रविवार को कहा था कि एसबीआई जल्द ही अपने आवास ऋण के ग्राहकों को अपने मौजूदा कर्ज को रीपो से जुड़े कर्ज में तब्दील करने की सहूलियत देगा।
 
दास ने अपने रुख को दोहराते हुए कहा कि बैंकों को दरों में और कमी करने की जरूरत है। आरबीआई ने हाल के समय में 75 आधार अंक की कटौती की है जबकि बैंकों ने कुल मिलाकर कर्ज की दर में करीब 35 आधार अंक की ही कमी की है, जो कि पर्याप्त नहीं है। दास ने कहा, 'आज अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन की जरूरत है और यह केवल मौद्रिक नीति से ही नहीं हो सकता है बल्कि इसका लाभ भी मिलना चाहिए। मेरी राय में नए कर्ज की उधारी दरों को रीपो दर से जोडऩे का औपचारिक समय आ गया है। हम घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं और आने वाले हफ्तों में जो भी जरूरी कदम होंगे उठाए जाएंगे।'
 
अगर आरबीआई बैंकों के लिए अपनी उधारी दरों को रीपो दर से जोडऩा अनिवार्य करता है तो नीतिगत दरों में कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को मिलेगा, साथ ही रीपो दर में कटौती का लाभ नहीं दिए जाने की दशकों पुरानी समस्या का समाधान भी हो जाएगा। निश्चित तौर पर इससे बैंकों के मुनाफे पर असर पड़ेगा। ऐसे में बैंकों को उधारी दरों के साथ ही जमा दरों में भी कटौती करनी होगी। ऐसे में फ्लोटिंग दर की व्यवस्था अपनानी होगी। रजनीश कुमार ने कहा, 'फ्लोटिंग दर दोनों तरीकों में काम करेगी, यानी जब ब्याज दर बढ़ती है तो जमा और उधारी दोनों में संतुलन सुनिश्चित करना होगा।'
 
आरबीआई गवर्नर द्वारा दरों में कटौती की अपील पर एसबीआई चेयरमैन ने कार्यक्रम से इतर कहा कि दरों को रीपो से जोडऩे सही कदम है लेकिन जमा और उधारी दोनों में इसका असर दिखना चाहिए। हालांकि आरबीआई गवर्नर चाहते हैं कि बैंक इस दिशा में तेजी दिखाएं। दास ने कहा, 'हम उम्मीद करते हैं कि बैंक इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ेंगे। आरबीआई निश्चित तौर पर बैंकों के साथ नियामक की भूमिका अदा करेगा और नई उधारी को रीपो दर या बाह्य बेंचमार्क से जोडऩे को औपचारिक बनाने के लिए कदम उठा सकता है।' 
 
दास ने कहा कि आरबीआई बैंकों तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के नियमों में तारतम्यता लाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने आश्वस्त किया कि कोई भी बड़ी एनबीएफसी को विफल होने नहीं दिया जाएगा और केंद्रीय बैंक इस क्षेत्र की मदद के लिए हर जरूरी उपाय करेगा। दास ने कहा, 'जब मैं समाचारपत्र पढ़ता हूं या बिज़नेस चैनल देखता हूं तो माहौल सकारात्मक और आशावादी नहीं दिखता है। मेरा मानना है कि सोच की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कृपया आगे के अवसरों की ओर देखिए।' उन्होंने कहा कि लोगों को समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में चुनौतियां जरूर है। कुछ क्षेत्र विशेष से जुड़े मसले हैं और अनेक वैश्विक और बाहरी चुनौतियां हैं। कई बाह्य वैश्विक चुनौतियां भी हैं। ऐसे में भारत अलग-थलग नहीं रह सकता। लेकिन हमें अवसरों को देखना चाहिए और उसका फायदा उठाना चाहिए।' दास ने ने कहा, 'मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हर हाल में चेहरे पर प्रसन्नता का भाव रखें और मुस्कराहट से हर कठिनाई को दूर कर दें। लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था में मनोबल की बड़ी भूमिका होती है। चुनौतियों के बाजूद अर्थव्यवस्था में बहुत से अवसर मौजूद हैं। वित्तीय क्षेत्र, कारोबारी समुदाय, नीति निर्माताओं और नियामकों को साथ मिलकर चुनौतियों का सामना करना चाहिए और भविष्य को अधिक आत्मविश्वास से देखना चाहिए।'
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