बिजनेस स्टैंडर्ड - कर राजस्व नहीं जीडीपी को दी जाए प्राथमिकता
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कर राजस्व नहीं जीडीपी को दी जाए प्राथमिकता

अजय शाह /  August 19, 2019

देश की मौजूदा कर नीति में कर राजस्व बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है जबकि प्रयास यह होना चाहिए कि कराधान से उतने ही रुपये प्राप्त करते हुए जीडीपी की दर में इजाफा किया जाए। बता रहे हैं अजय शाह

 
व्यापक तौर पर यही समझा जाता है कि हमारे देश में विभिन्न कंपनियों पर लगने वाले करों  की दर वैश्विक मानकों के अनुरूप नहीं हैं। विदेशी निवेशकों के साथ-साथ देश के कराधान पर भी यही बात लागू होती है। अनिवासी निवेशकों के कराधान के कारण भारतीय कंपनियों की पूंजी की लागत बढ़ती है और इसका बुरा असर देश में होने वाले निवेश पर पड़ता है। इससे वित्तीय सेवाओं की वृद्घि प्रभावित होती है और उनसे संबद्घ उद्योग धंधे भी प्रभावित होते हैं।  इतना ही नहीं इससे बाजार में नकदी की स्थिति और वित्तीय बाजारों की क्षमता पर भी नकारात्मक असर होता है। एक ऐसी दुनिया से शुरुआत करते हैं जहां भारत में निवास आधारित कर प्रणाली है: यानी अनिवासी भारतीयों पर कर नहीं लगता है। मान लेते हैं कि हम विदेशियों को भारतीय सरकारी बॉन्ड बेचने का प्रयास करते हैं और यह भी मान लेते हैं कि 10 फीसदी की ब्याज दर पर मांग और आपूर्ति समान रहती हैं। 
 
इसमें एक और प्रावधान जोड़ते हैं: हम विदेशी निवेशकों से कहते हैं कि उन्हें भारत में जो भी ब्याज मिलता है, उसका एक फीसदी उन्हें आय कर के रूप में चुकाना होगा। विदेशियों के लिए ब्याज की आवश्यक दर तत्काल 11 फीसदी हो जाएगी। जबकि सरकार के लिए पूंजी की वास्तविक लागत वही रहेगी। धन का भुगतान सार्वजनिक ऋण प्रबंधन द्वारा किया जाता है और यह आय कर के रूप में प्रदर्शित होता है। कई चीजों में बदलाव आएगा। बॉन्ड बाजार में प्रक्रियात्मक टकराव नजर आएगा जहां सरकार पहले अपनी उधारी लागत का 11 फीसदी चुकाएगी और फिर उसका दसवां हिस्सा कराधान के रूप में आएगा। यह निवास आधारित कराधान के तमाम लाभों में से एक है। यही कारण है कि तमाम विकसित देश इसे अपनाते हैं। 
 
देश के निजी कॉर्पोरेट जगत की इक्विटी के साथ भी यही बात लागू होती है। हमने लेनदेन पर प्रतिभूति लेनदेन कर लगाया। यह सार्वजनिक वित्त के सिद्घांतों का उल्लंघन करता है जहां लेनदेन पर किसी भी तरह केे कराधान को अच्छा नहीं माना जाता। विदेशी निवेशक देश में इन्फोसिस के शेयर के कारोबार के बजाय न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज पर इन्फोसिस के एडीआर का प्रयोग करना उचित समझेगा क्योंकि वहां इस पर कोई प्रतिभूति कर नहीं चुकाना होगा। ऐसे में जो ऑर्डर भारत आ सकता था वह उस एक्सचेंज को चला जाएगा। इससे नकदी कम होगी और देश के वित्तीय बाजारों की किफायत प्रभावित होगी। यह प्रतिभूति कंपनियों के राजस्व को भी प्रभावित करेगा और वित्तीय बाजारों से जुड़ी अन्य सहायक सेवाओं को भी। विदेशियों पर कर लगाने का हमारा प्रयास देश को निर्यात और जीडीपी में नुकसान पहुंचाएगा। 
 
मॉरीशस संधि देश को कर नीति की गलतियों से बचाने का अहम जरिया थी। लंबे समय तक हमारे यहां खराब कर नीति थी लेकिन मॉरीशस संधि के माध्यम से पोर्टफोलियो विदेशी निवेशकों पर लागू होने वाली विसंगतियों का असर सीमित किया जाता था। यह व्यवस्था तब तक ठीक चली जब तक कि मॉरीशस में स्थित सेवा प्रदाताओं को शुल्क चुकाया गया। अब मॉरीशस या सिंगापुर संधियों के कई प्रावधान विश्व मानकों के अनुरूप नहीं रह गए हैं। उदाहरण के लिए मॉरीशस संधि रॉयल्टी भुगतान पर इस तरह कर लगाती है जो तरीके दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते। इसी प्रकार सिंगापुर संधि में स्थायी प्रतिष्ठïान की परिभाषा और श्रेणी शेष विश्व से अलग हैं। 
 
यदि हम निफ्टी डेरिवेटिव और रुपये के डेरिवेटिव पर नजर डालें तो गंवाये गये राजस्व का आंकड़ा काफी अधिक नजर आता है। वर्ष 2007 में भारत से संबंधित प्रतिभूतियों के वैश्विक कारोबार में भारत की 100 फीसदी हिस्सेदारी थी। तब से अब तक हमने वित्तीय नियमन, कराधान और पूंजी नियंत्रण के कई उपाय अपनाए। इससे वित्तीय बाजार कारोबार का नुकसान हुआ। निफ्टी और रुपये जैसे दो बड़े वित्तीय उत्पादों की गतिविधि देश से बाहर हो रही है। इसी प्रकार भारत से संबंधित फंड प्रबंधन भी भारत में होना चाहिए। यकीनन भारत को दक्षिण एशिया या एशिया में फंड प्रबंधन का आधार बन जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका एक बड़ा हिस्सा नीतिगत माहौल और नीतिगत जोखिम के चलते भारत से दूर हो गया। यह जोखिम कराधान, पूंजी नियंत्रण और वित्तीय नियमन के भविष्य से जुड़ा था। 
 
ये समस्याएं हमारी सार्वजनिक नीतिगत क्षमताओं का परीक्षण भी हैं। ऐसे में हमारे लैटिन अमेरिकी देशों जैसा बन जाने का जोखिम है जहां वित्तीय बाजार पूरी तरह न्यूयॉर्क का रुख कर चुके हैं। कर नीति अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है। टाटा स्टील जैसी कंपनी की बात करें तो उसके लिए कोयला या लौह अयस्क सबसे महत्त्वपूर्ण है। वैश्विक निवेशक कर बाद प्रतिफल की तुलना चीन, ताइवान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया अथवा भारत के प्रतिस्पर्धी स्टील कारोबार में लगी पूंजी या डेट पूंजी से करते हैं। एक विदेशी व्यक्ति टाटा स्टाल के बॉन्ड को कर पश्चात प्रतिफल के तर्ज पर देखता है और इसकी तुलना विदेश में प्राप्त कर पश्चात लाभ से करता है। चूंकि भारत में कराधान ज्यादा है इसलिए यहां पूंजी की लागत भी बढ़ जाती है। 
 
देश में पूंजीगत कराधान मसलन कॉर्पोरेट आय कर, लाभांश वितरण कर, उपकर और प्रतिभूति लेनदेन कर के कारण पूंजी की लागत बढ़ जाती है। यह देश में स्टील कारोबार को महंगा करती है। पूंजी की लागत में ऐसी बढ़ोतरी भारत के हित में नहीं है। इससे निवेश में कमी आएगी क्योंकि देश में निवेश की लागत बढ़ती है। देश की कर नीति कर राजस्व बढ़ाने पर केंद्रित है। इसके बजाय हमें समान मात्रा में कराधान के साथ जीडीपी में इजाफा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हमें उच्च जीडीपी हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि उच्च कर और जीडीपी अनुपात पर। देश की अर्थव्यवस्था का आकार 5 लाख करोड़ डॉलर करने की राह में कर सुधार एक अहम घटक है। देश में कर सुधारों तथा तमाम आर्थिक नीतियों का लक्ष्य जीडीपी वृद्घि दर में इजाफा करना होना चाहिए।
 
(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं।)
Keyword: revenue, tax, GST,,
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