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भ्रामक बयान

संपादकीय /  August 19, 2019

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन की पहली बरसी पर सरकार ने उनके कार्यकाल के प्रमुख सिद्धांतों में से एक पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। सन 1998 में वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जिस पोकरण में परमाणु परीक्षण किया था, उसकी यात्रा के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट किया 'पोकरण वह स्थान है जो अटल जी के भारत को परमाणु शक्ति बनाने और उसके बावजूद इन हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की प्रतिबद्धता जताने का साक्षी रहा है।' सिंह ने लिखा कि भारत इस सिद्धांत का दृढ़ता से पालन करता रहा है लेकिन भविष्य में क्या होगा यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी केंद्रीय मंत्री ने पहले इस्तेमाल न करने की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाया है। सन 2016 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी सन 2003 से लागू इस नीति को लेकर संदेह जताया था।

 
यह सही है कि ऐसी किसी भी रक्षा नीति के बुनियादी तत्त्वों पर कभी भी बहस की गुंजाइश रहती है और इनका समय-समय पर आकलन किया जाना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि इस वक्त सिंह के वक्तव्य का मूल्य क्या है और क्या इस नीति में बदलाव की आवश्यकता है और सरकार में इस बारे में पूरी चर्चा की जा चुकी है। सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों तरह के सवाल पूछे जा सकते हैं। सैद्धांतिक तौर पर यह नीति अन्य परमाणु हथियार संपन्न देशों के विरुद्ध एक विश्वसनीय प्रतिरोध है और अस्थिर माहौल में स्थिरता लाने का काम करती है। यह नीति यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि इन हथियारों का सैन्य प्रयोग दूर बना रहे क्योंकि वह व्यापक आपदा का कारण बन सकता है। जंगी माहौल यह दर्शा चुके हैं कि यह शत्रु द्वारा परमाणु हथियारों की सामरिक तैनाती को रोकने में प्रभावी भूमिका निभाता है। यह सामरिक रूप से प्रभावी होता है लेकिन यह सामरिक परमाणु हथियारों के प्रलयकारी विनिमय की ओर भी ले जा सकता है, जिसे दोनों देश टालना ही बेहतर समझते होंगे। 
 
ध्यान देने वाली बात यह है कि पहले प्रयोग न करने की नीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शीतयुद्ध के दिनों में निहित है। उस समय यूरोप के भीतर पारंपरिक सैन्य शक्ति में वारसा संधि को बड़ी बढ़त हासिल थी। उस वक्त नाटो ने सोवियत आक्रमण के दौरान पश्चिमी यूरोप को गंभीर खतरा उत्पन्न होने की स्थिति में परमाणु हथियार के पहले इस्तेमाल के विकल्प को खुला रखा था। परंतु, सोवियत सेना जिसे पारंपरिक लड़ाई में बढ़त हासिल थी, उसने सन 1983 में पहले इस्तेमाल न करने की नीति अपना ली। सोवियत संघ का विभाजन होने और रूस की पारंपरिक बढ़त समाप्त होने के बाद रूस ने इस नीति को त्याग दिया। भारत को भी पाकिस्तान पर पारंपरिक बढ़त हासिल है। ऐसे में यह नीति समझ में आती है। सवाल यह है कि क्या किसी बड़े विवाद में भी यह कारगर होगी?
 
ये वे सवाल हैं जिन पर सावधानीपूर्वक चर्चा होनी चाहिए और इस दौरान देश की पारंपरिक शक्ति और परमाणु जखीरे को भी ध्यान में रखना चाहिए। राजनाथ सिंह के बयान जैसी बातें केवल सामरिक भ्रम पैदा करेंगी जो देश के हित में नहीं है। यह भी ध्यान देने लायक है कि हमारी पारंपरिक बढ़त भी समाप्त हो रही है क्योंकि रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं हो रहा है। ऐसे में हमारा परमाणु प्रतिरोध भी इतना मजबूत नहीं है जिससे सैन्य नीतिकार सोचें कि पहले हमला करके हम शत्रु की संभावित क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर देंगे। अगर रक्षा मंत्री केवल यही बताना चाहते हैं कि उनकी पार्टी के 2014 के घोषणापत्र के अनुरूप परमाणु सिद्धांत का पुनराकलन हो रहा है, तो यह बताने के अन्य तरीके भी हैं।
Keyword: pokhran, atom, rajnath singh,,
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