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गन्ने की खेती हतोत्साहित करेगी समिति!

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली August 19, 2019

चीनी क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक समाधान खोजने की खातिर गठित उच्च अधिकार संपन्न कार्यबल गन्ने की खेती हतोत्साहित करने के पक्ष में रह सकता है। देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में आलू और मक्के जैसी वैकल्पिक फसलों की सुनिश्चित खरीद तथा अन्य नीतिगत विकल्पों के जरिये ऐसा किया जाएगा। यह समूह चीनी क्षेत्र में लगातार रहने वाली अधिकता से निपटने के लिए अनिवार्य एथनॉल मिश्रण को मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का भी समर्थन कर सकता है। सरकार ने तेल आयात पर निर्भरता में कमी करने के लिए 2022 तक 10 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य तय किया है। 17 जून, 2019 तक एथनॉल मिश्रण 6.20 प्रतिशत था, जबकि आपूर्ति वर्ष 2012-13 में इसकी आपूर्ति 0.67 प्रतिशत थी।
 
गन्ना मूल्य निर्धारण के विवादास्पद मसले पर अधिकारियों ने कहा कि यह कार्यबल, जिसका गठन पिछले साल नीति आयोग द्वारा किया गया है, गन्ने का खरीद मूल्य चीनी और उसके उप-उत्पादों को बेचकर प्राप्त होने वाली आमदनी के साथ जोडऩे की सलाह दे सकता है। ऐसा 2012 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के पूर्व अध्यक्ष सी रंगराजन द्वारा सुझाव की तर्ज पर होगा। अधिकारियों ने कहा कि गन्ने के दामों के लिए राजस्व-हिस्सेदारी निर्धारित करने के लिए चीनी और इसके उप-उत्पादों से प्राप्त आमदनी पर आधारित फिलहाल रंगराजन का फार्मूला ही एकमात्र उपलब्ध तरीका है। हालांकि अगर कोई अन्य वैकल्पिक तरीका सामने आता है तो उस पर भी विचार किया जा सकता है।
 
रंगराजन फार्मूले के अनुसार गन्ने का मूल्य चीनी के 70 प्रतिशत और इसके तीन प्रमुख उप-उत्पादों यानी खोई, शीरा और मिट्टी (प्रेस मड) के मूल्य (एक्स-मिल) के अधार या अगर उप-उत्पादों से प्राप्त होने वाली आमदनी भी इसमें शामिल हो तो चीनी के 75 प्रतिशत मूल्य के आधार पर निर्धारित किया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी परिस्थितियों में किसानों को उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) का भुगतान किया जाएगा और वास्तव में किया जाएगा। उद्योग ने इस फार्मूले का व्यापक रूप से स्वागत किया था और कुछ राज्यों ने इसे गन्ने का मूल्य तय करने के लिए लागू भी किया है। लेकिन प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश ने इस समूह की सिफारिशों को लागू नहीं किया है। कई किसान संगठन रंगराजन फार्मूले के आलोचक रहे हैं। उनका कहना है कि खुदरा मूल्य में तेज गिरावट की स्थिति में यह किसानों के लिए खरा सौदा साबित नहीं होता है। जैसा कि पिछले कुछ वर्षों से होता आया है। 
 
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि गन्ना साल भर होने वाली फसल है (इसे परिपक्व होने में 12-18 महीने लगते हैं) और यह किसानों को सुनिश्चित आय प्रदान करती है। इस फसल की खेती को हतोत्साहित करने के लिए कुछ विशेष विकल्प दिए जाने की जरूरत है जिससे उन्हें इसके समान या इससे अधिक आमदनी प्राप्त हो। अधिकारी ने कहा कि हालांकि किसी विशेष वर्ष में उत्पादन में कुछ दिक्कत रह सकती है लेकिन लंबी अवधि वाले रुख के अनुसार उत्पादन 2.7-2.8 करोड़ टन से नीचे नहीं रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ओर जहां चीनी उत्पादन बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसकी मांग में उसी रफ्तार से इजाफा नहीं हो रहा है।  इससे चीनी बाजार में अधिकता की स्थिति पैदा हो गई है जो कुछ समय तक बनी रह सकती है। अक्टूबर से शुरू होने वाले 2019-20 के चीनी सीजन के दौरान देश में 1.4 करोड़ टन से अधिक का सर्वकालिक शुरुआती चीनी स्टॉक होगा। हालांकि उद्योग के भागीदारों का कहना है कि कई क्षेत्रों में सूखे के कारण 2019-20 में उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम रहने के आसार हैं लेकिन इससे भी आमदनी में बहुत अधिक इजाफे की उम्मीद नहीं है। वैश्विक उत्पादन की अधिकता के कारण निर्यात के मोर्च पर भी हालात उत्साहित नहीं दिख रहे हैं। अतिरिक्त चीनी की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने दीर्घकालिक नीतिगत उपायों का सुझाव देने के लिए नीति आयोग के तहत इस कार्यबल का गठन किया था।
Keyword: sugar, farmer, mills,,
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