बिजनेस स्टैंडर्ड - वाहन उद्योग की सरकार पर टिकी आस
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वाहन उद्योग की सरकार पर टिकी आस

शैली सेठ मोहिले / मुंबई August 19, 2019

वाहन कंपनियों की बिक्री में हर महीने गिरावट आ रही है और आने वाले समय में भी इसमें सुधार की संभावना नहीं दिख रही है। वाहन क्षेत्र का मानना है कि अगर सरकार मांग में सुधार के लिए सीधे या परोक्ष रूप से हस्तक्षेप नहीं करती है तो मंदी तय है। उनका कहना है कि बीएस-6 उत्सर्जन नियम और सुरक्षा मानक अगले छह महीने में लागू होंगी, ऐसे में अगले वित्त वर्ष तक बिक्री में गिरावट जारी रह सकती है। विश्लेषकों को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2021 की दूसरी या तीसरी तिमाही से बिक्री में सुधार हो सकता है। हालांकि विश्लेषकों से उलट शीर्ष वाहन कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारी बिक्री में सुधार की समयसीमा का अनुमान नहीं लगाना चाहते। वाहन विनिर्माताओं के संगठन सायम के अध्यक्ष राजन वढेरा ने कहा, 'जब हमें यह नहीं पता होता कि अगले महीने क्या होगा, तो फिर हम अगले वित्त वर्ष का अनुमान कैसे लगा सकते हैं?'
 
मारुति सुजूकी इंडिया के चेयरमैन आरसी भार्गव ने इस पर सहमति जताते हुए कहा, 'अगर कुछ नहीं हुआ तो मुझे इस वित्त वर्ष में सुधार की संभावना नहीं दिखती। वाहन क्षेत्र में सुधार के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कदम उठाने की जरूरत है।' इस चुनौतीपूर्ण समय में बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने कहा कि जोखिम दूर करना आगे बढऩे का सही तरीका है। उन्होंने कहा, 'मैंने अपने 29 साल के कॅरियर में एक भी ऐसा अनुमान नहीं देखा जो सटीक रहा हो... हम सभी वैश्विक बाजार में जाकर और नए प्लेटफॉर्म पर उत्पादों की डिजाइनिंग कर जोखिम को कम कर सकते हैं। बाकी सबकुछ किस्मत पर निर्भर है।'
 
भारत में तेजी से बढ़ रहे वाहन बाजार को इस साल बिक्री की कमी से जूझना पड़ रहा है। आईएलऐंडएफएस के चूक करने के बाद से वित्तीय कंपनियों में नकदी का संकट होने के साथ ही बीमा, ज्यादा रोड टैक्स और नए एक्सल नियमों से भी वाहनों की बिक्री प्रभावित हो रही है। यात्री वाहनों की बिक्री घटकर जुलाई में दो दशक के निचले स्तर पर आ गई है। रिलायंस सिक्योरिटीज में उपाध्यक्ष, शोध मितुल शाह ने कहा, 'अगले वित्त वर्ष के मध्य तक बिक्री में सुधार होने की संभावना नहीं दिख रही है।' अन्य विश्लेषकों का भी मानना है कि जब तक सरकार खरीदारों की धारणा को बढ़ावा नहीं देती है, मांग में सुधार नहीं हो सकता।
 
डीलरों के पास और कारखानों में वाहनों का स्टॉक बढऩे की वजह से कंपनियों को कुछ दिनों तक उत्पादन बंद करने की घोषणा भी करनी पड़ी है। औसतन प्रत्येक मुख्य कंपनियों को अपने संयंत्र महीने में सात से आठ दिन तक अस्थायी तौर पर बंद करने पर मजबूर होना पड़ा है। उत्पादन बंद होने की वजह से कंपनियों को अस्थायी श्रमिकों की छंटनी भी करनी पड़ी है।  सायम के महानिदेशक विष्णु माथुर ने कहा, 'पिछले तीन से चार महीने में वाहन विनिर्माण क्षेत्र में करीब 15,000 अस्थायी/ठेका श्रमिकों की छंटनी करनी पड़ी है।' 
 
वढेरा ने कहा कि यह आंकड़ा भले ही छोटा दिखता हो लेकिन इसके मायने व्यापक हैं। उन्होंने कहा, 'अगर मैं छंटनी करता हूं तो मेरे डीलर और वेंडर भी अपने कर्मचारी कम करेंगे। अगर 100 लोगों का रोजगार छिनता है तो पूरे तंत्र में करीब 2,000 लोगों को नौकरी गंवानी पड़ती है, क्योंकि सभी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।'वाहनों के कलपुर्जा विनिर्माताओं को भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। वाहनों के लिए लाइटिंग एवं अन्य पुर्जे बनाने वाली कंपनी ल्युमैक्स इंडस्ट्रीज के सीएमडी दीपक जैन ने कहा, 'यह अब नरमी भर नहीं रह गर्इ है, बल्कि मंदी की दस्तक है।'नरमी से जूझने के लिए कंपनी कमर कस रही है और नई भर्तियां और वेतन वृद्घि पर रोक लगा रही है तथा लागत में कटौती कर रही है। 
 
जैन ने चेताया कि अगर त्योहारी मौसम के बाद भी यही स्थिति रही तो ल्युमैक्स को सख्त कदम उठाते हुए अपने 9,000 कर्मचारियों में से 1,000 की छंटनी करनी पड़ सकती है। वाहन विनिर्माताओं की निराशा की वजह यह है कि सरकार वृद्घि को बढ़ावा देने के उपाय करने में विफल रही है। वढेरा ने कहा, 'सरकार की ओर से किसी तरह की मदद मिलती नहीं दिख रही है। वह केवल बातचीत कर रही है और जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हो रहा है।' भार्गव यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार क्या करती है। उन्होंने कहा कि कम से कम नौ राज्य सरकारों ने पिछले कुछ महीनों में रोड टैक्स बढ़ा दिए हैं, जो सही कदम नहीं है क्योंकि इससे बिक्री राजस्व प्रभावित हुआ है और नौकरियों पर भी दबाव पड़ा है।
Keyword: vehicle, car, electric, petrol, diesel,,
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