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जीन संवद्र्धित बीजों पर मौजूदा नीति की समीक्षा का वक्त

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  August 18, 2019

आनुवांशिक रूप से संवद्र्धित (जीएम) जीन के खाद्य शृंखला एवं पर्यावरण क्षेत्र में पहुंच जाने के बारे में अगर कोई संदेह था तो बैगन, सरसों और कपास जैसी फसलों के गैर-अनुमोदित जीएम बीजों की बड़े पैमाने पर खेती होने की जानकारी सामने आने के साथ ही उसे दरकिनार कर देना चाहिए। असल में, यह जीन संरचना में छेड़छाड़ कर विकसित पहली फसल बीटी-कॉटन के पहले ही हो जाना चाहिए था। बीटी कॉटन में बैसिलस थुरिन्जींसिस (बीटी) बैक्टीरिया से निकला हुआ एक विदेशी जहरीला जीन भी मौजूद था। 

 
कृषि क्षेत्र में कीटनाशक बीटी जीन का इस्तेमाल असल में आनुवांशिक रूप से संवद्र्धित फसलों के विकास के पहले ही शुरू हो गया था। दुनिया भर में किसान दशकों से बीटी बैक्टीरिया का इस्तेमाल सूक्ष्मजीवी कीटनाशक एजेंट के तौर पर करते रहे हैं। ऑर्गेनिक खेती में भी यह एक आम बात मानी जाती है। इसके अलावा मिट्टïी में पाया जाने वाला आम बैक्टीरिया बीटी गलती से पशुओं एवं इंसानों के पेट में भी पहुंच जाता है। माना जाता है कि आयात किए जाने वाले कई खाद्य पदार्थों में किसी तरह की घोषणा के बगैर भी जीएम तत्त्व मौजूद होते हैं। 
 
इस तरह बीटी बीज की तुलना लोककथा के मशहूर किरदार जिनी से करने वाले जीएम-विरोधी एक्टिविस्ट पहले से ही सक्रिय हैं। अगर इसे स्वास्थ्य, पर्यावरण या जैव-विविधता को कोई चोट पहुंचानी होती तो वह अब तक कर चुका होता। लेकिन इस तरह का सुलभ साक्ष्य शायद ही मौजूद है। ऐसे में नए जीएम बीजों को मंजूरी देने पर लगी रोक जारी रखने का कोई मतलब नहीं रह गया है। आनुवांशिक रूप से संवद्र्धित बीजों को मिलने वाला किसानों का समर्थन एक तरह से आनुवांशिक इंजीनियरिंग तकनीक की ही वकालत करता है। किसान जानबूझकर कानून का उल्लंघन करते हुए गैर-अनुमोदित जीएम फसलों को लगा रहे हैं जो एक तरह से उनके 'सविनय अवज्ञा' आंदोलन की ही तसदीक करता है। सरकारी अनुमोदन न होने के बावजूद जिस तरह से जीएम बीजों की मांग बढ़ी है उसने इन बीजों की आपूर्ति शृंखला को भी जन्म दिया है। यह जीन में बदलाव कर विकसित की गई नई फसलों के प्रति किसानों के बढ़ते लगाव का भी सबूत देता है। जीएम-समर्थक किसानों का मानना है कि उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और कृषि को व्यवहार्य बनाने के लिए ऐसे बीजों की मौजूदगी जरूरी है। 
 
महाराष्ट्र के अकोला में किसानों ने अनधिकृत कपास की एचटीबीटी किस्म वाले बीज को पहली बार अपने खेतों में लगाया था। वहां से शुरू हुआ उनका प्रतिरोध धीरे-धीरे अन्य राज्यों में भी फैल चुका है और अब इस सूची में आनुवांशिक रूप से संवद्र्धित बैगन एवं सरसों की फसलें भी शामिल हो चुकी हैं। बिना मंजूरी वाले जीएम बीज बेचने वाले दुकानदारों और ऐसी फसलें उगाने वाले किसानों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज करने, खेतों में तैयार हो चुकी फसल को बरबाद कर देना और संदिग्ध बीजों को जब्त करने जैसे दंडात्मक कदम भी किसानों को डिगा नहीं पाए हैं। किसान अपने इस प्रतिरोध को 'सत्याग्रह' का नाम देकर विरोध जताने के महात्मा गांधी के इस अहिंसक तरीके को नई ऊर्जा दे रहे हैं। 
 
सरकार ने हाल ही में लोकसभा में यह स्वीकार किया था कि अनुमोदन नहीं मिलने के बावजूद एचटीबीटी-कपास की फसल महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बोई जा रही है। कृषि मंत्रालय की खेत निरीक्षण एïवं वैज्ञानिक मूल्यांकन समिति का अनुमान है कि वर्ष 2017-18 में कपास के कुल रकबे में से करीब 15 फीसदी इलाके में एचटीबीटी किस्म ही बोई गई थी। कपास और अन्य फसलों के जीएम बीजों की आपूर्ति के नियमित चैनल अब हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में भी व्यवस्थित ढंग से पाए जाते हैं।
 
इस तरह जीएम तकनीक के विरोधियों के दबाव में आकर सरकार का किसानों के इस पसंदीदा बीज किस्म पर रोक लगाने का कदम सही दिशा में जाता नहीं दिख रहा है। सरकार को अपनी इस नीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। भले ही किसानों के जीएम सत्याग्रह का सामना कर रही राज्य सरकारों ने किसानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न करने के संकेत दिए हैं लेकिन केवल इतने भर से बात नहीं बनेगी। सरकार को जीएम बीजों के बारे में अपनी समग्र नीति पर ही नए सिरे से गौर करने की जरूरत है। इसके बारे में अनिश्चितता कायम रहने से जीन-संवद्र्धन तकनीक से संबंधित शोध पर गहरा आघात लगा है और इसकी वजह से जैव-प्रौद्योगिकी कंपनियों में विदेशी निवेश की आवक भी प्रभावित हुई है। जीएम फसलों का विरोध करने वाली लॉबी संख्या में कम होते हुए भी काफी मुखर है लेकिन सरकार को इन लोगों के दुष्प्रचार के आगे कदम न टेकते हुए वैज्ञानिकों, संस्थानों और शोध केंद्रों की समझ भरी सलाह पर गौर करना चाहिए। 
 
जीएम उत्पादों के सुरक्षा संबंधी पहलुओं को नियंत्रित परिवेश एवं खुले खेतों में कठोर परीक्षण के जरिये परख लिए जाने के बाद इनके व्यावसायिक इस्तेमाल पर मंजूरी रोकने के पीछे कोई भी कारण नहीं रह जाता है। सरकार को जीन में बदलाव करने वाले इस तकनीक से होने वाले फायदों की तारीफ करने की जरूरत है। हालांकि जीएम बीजों को अनुमति हरेक मामले के विस्तृत विश्लेषण एवं भारतीय परिवेश के लिहाज से उसके अनुकूलन का आकलन करने के बाद ही करना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर भारतीय कृषि भी औषधि की तरह जैव-तकनीक आधारित क्षेत्रों की तरह पिछड़ी ही रह जाएगी। 
Keyword: agri, farmer, crop, GM,,
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