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जम्मू कश्मीर में तथ्य कल्पना और हकीकत

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  August 18, 2019

कश्मीर समस्या का हल तलाश करने के पहले हमें उसे सही ढंग से समझना होगा। बिना तथ्यों या हकीकत को समझे हल सुझाने के अपने जोखिम हैं। पुरानी बीमारियों की उचित जांच परख किए बिना उनका निदान सुझाने का काम केवल नीम हकीम या ओझा आदि ही कर सकते हैं। इन ओझाओं को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है जो तीन तरह के हल सुझा रहे हैं। पहला, भारत में सत्ताधारी दल का नजरिया जिसे व्यापक समर्थन मिल रहा है। इनका मानना है कि कश्मीर की इकलौती समस्या पाकिस्तान है और वह कश्मीर में राइफलों, रॉकेट लॉन्चर और आरडीएक्स के साथ इस्लाम के कट्टर स्वरूप का प्रसार करता है। इनके मुताबिक पाकिस्तानियों को खदेड़कर डल लेक पर आसानी से फिल्म 'कश्मीर की कली' का दूसरा भाग शूट किया जा सकता है। वहीं इसके उलट पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान इस मुगालते में है कि भारतीयों को वहां से बाहर निकाला जा सकता है और कश्मीर को पाकिस्तान का छठा प्रांत बनाया जा सकता है। इस धारणा को भी काफी जनसमर्थन हासिल है। उन्हें लगता है कि उन्होंने अफगानिस्तान में सोवियत और अमेरिकियों को हराया तो भारत की बिसात ही क्या है?

 
हमारे आज के विश्लेषण में तीसरी श्रेणी देश के उन उदारवादियों की है जिनकी तादाद कम है लेकिन जो मुखर और साहसी हैं। वे मानते हैं कि कश्मीर का भारत में विलय अंतिम नहीं है और इस मामले में कश्मीरियों की राय ही अंतिम है जो अब तक नहीं ली गई है। इस लिहाज से देखा जाए तो जनमत संग्रह, स्वायत्तता और स्वतंत्रता की उनकी बुनियादी मांग उचित है। सैन्य बल का सहारा लेकर उन्हें भारत के साथ नहीं रखा जा सकता। दार्शनिक रूप से देखा जाए तो इस तर्क से असहमति जताना कठिन है।  भारत राज्यों का एक स्वैच्छिक समूह है, ऐसे में लोगों को जबरन साथ नहीं रखा जा सकता। इस विचार को बुनियादी उदारवादियों और युवा बुर्जुआ वर्ग का भी समर्थन मिलता है। उनके साथ बहस के जोखिम से मैं अवगत हूं क्योंकि वे नैतिक रूप से ऊंचाई पर नजर आते हैं लेकिन हम भी खतरों में जीने के आदी हैं। उदारवादियों की मौजूदा स्थिति पांच बुनियादी बातों पर टिकी हुई है: 
 
1. भारत ने सन 1947-48 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर में जनमत संग्रह को लेकर प्रतिबद्धता जताई थी। उसने इसका उल्लंघन क्यों किया? सच यह है कि यह प्रतिबद्धता भारत और पाकिस्तान दोनों ने जताई थी और दोनों ने इसे तोड़ा। अगर आप संबंधित प्रस्ताव को पढ़ें तो आपको तीन चरण की प्रक्रिया नजर आएगी। पहला, पाकिस्तान द्वारा कश्मीर से सेना और जिहादियों समेत तमाम लोगों को वहां से हटाना। ऐसा कभी नहीं हुआ। अगले दो चरण थे, भारत द्वारा सैनिकों की तादाद को न्यूनतम करना और एक सर्वदलीय सरकार बनाकर संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त गवर्नर के अधीन जनमत संग्रह कराना। पाकिस्तान ने कभी पहल नहीं की और भारत इससे पहले आगे के कदम उठाने को तैयार नहीं था।
 
2. अधिकांश कश्मीरी न तो भारत का साथ चाहते हैं और न पाकिस्तान का। वे आजादी चाहते हैं। इसे नकारा कैसे जा सकता है? आप जनमत संग्रह के बारे में सोचिए, क्यूबेक, स्कॉटलैंड या ब्रेक्सिट के बारे में सोचिए। अगर आप प्रस्ताव को दोबारा पढ़ेंगे तो पाएंगे कि उसमें आजादी का विकल्प नहीं है। केवल भारत या पाकिस्तान को चुना जा सकता है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर की आजादी का समर्थन विशुद्ध झूठ है जिसे सायास स्थापित किया गया है। पाकिस्तान ने खुद द्वारा अधिकृत कश्मीर को आजाद कश्मीर कहकर 70 साल में यह झूठ खड़ा किया है। चूंकि वह पूरे कश्मीर पर दावा करता है तो क्या उसे इसे अपना प्रांत नहीं बताना चाहिए? वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि इससे कश्मीर को हड़पने का उसका पाखंड उजागर हो जाएगा। आपको पाकिस्तान के किसी नेता का बयान नहीं मिलेगा जहां वह आजादी को विकल्प मानता हो। अगर आपको आजादी की कहानी पर यकीन है तो करिए, देश के बाकी हिस्से इस पर यकीन नहीं करते।
 
3. क्या आप किसी भूभाग और आबादी को सैन्य शक्ति से हमेशा अपने साथ रख सकते हैं? इसका उत्तर एक प्रतिप्रश्न में निहित है: क्या आप सैन्य शक्ति के जरिये किसी देश के लोगों या भूभाग को छीन सकते हैं? पाकिस्तान ने दो बार इसका प्रयास किया। एक बार सन 1947-48 में और दोबारा सन 1965 में। सन 1989 के बाद वह छद्म युद्ध के जरिये इसका प्रयास कर रहा है। सन 1999 में उसने करगिल में भी ऐसा पागलपन दिखाया। हमें सन 1953 के मध्य से आगे तक संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को लेकर नेहरू के रुख को समझना होगा। उस वक्त  शीतयुद्ध जोर पकड़ रहा था। कश्मीर की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वह दो महाशक्तियों के बीच उलझ गया था। संकट को भांपते हुए नेहरू ने सन 1953 में शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर कश्मीर को भारत में समाहित करने का कदम उठाया। अगले दो वर्ष में पाकिस्तान अमेरिकी नेतृत्व वाले बगदाद समझौते, सीटो आदि में शामिल हो गया। इसके कारण अगले दशक में सैन्य संतुलन उसके पक्ष में झुकने लगा। वह नेहरू के कदम थे जिन्होंने कश्मीर को सैन्य अतिक्रमण से बचाया। पाकिस्तान ने पर्याप्त सैन्य शक्ति जुटाने तक इंतजार किया और सन 1962 की लड़ाई, नेहरू की मौत, खाद्यान्न संकट से कमजोर पड़े भारत पर हमला बोल दिया। इस दौरान उसने अमेरिका से मिले सैन्य प्रशिक्षण का भरपूर इस्तेमाल किया। परंतु कश्मीर पर कब्जे का उसका यह प्रयास नाकाम रहा। यह आखिरी मौका था जब पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई से कश्मीर हथिया सकता था। उसने अपने सैनिक और टैंक कश्मीर की आजादी के लिए नहीं भेजे थे। ये तीनों बातें संयुक्त राष्ट्र से शिमला समझौते के पूर्व तक कश्मीर के घटनाक्रम को समझने में मदद करती हैं। हालांकि उसके बाद चीजें तेजी से घटित हुईं और चौथी बात यहीं से निकलती है:
 
4. मोदी सरकार कश्मीर को शिमला समझौते के मुताबिक क्यों नहीं निपटा रही है जबकि इमरान खान भी ऐसा ही कह रहे हैं? जवाब के लिए शिमला समझौते को पढऩा होगा जिसमें कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तमाम समस्याएं द्विपक्षीय हैं, यानी इससे संयुक्त राष्ट्र का कोई लेनादेना नहीं। दोनों मानते हैं कि जबरन किसी क्षेत्र पर कब्जा नहीं किया जा सकता। इसके तहत युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा का नाम दिया गया और अपने लोगों को इसे ही सीमा मानने के लिए प्रेरित करने की बात कही गई। इस बात को साफ-साफ क्यों नहीं कहा गया यह एक पहेली है।
 
परंतु युद्धबंदियों की वापसी के साथ ही पाकिस्तान ने इस समझौते को छलन शुरू कर दिया। जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपने देश का इस्लामीकरण (जी हां, जिया ने नहीं उन्होंने) शुरू कर दिया। उन्होंने लाहौर में इस्लामिक देशों के संगठन की बैठक बुलाई। यहां तक कि अपने इस्लामिक बम के लिए धन राशि जुटाने के क्रम में उन्होंने लाहौर के क्रिकेट स्टेडियम का नाम मुअम्मर कज्जाफी के नाम पर रख दिया। शिमला समझौते की ठंडी बयार तभी तक बही जब तक कि बम तैयार नहीं हो गया। सन 1989 आते-आते पाकिस्तान ने दोबारा कश्मीर को बलपूर्वक हथियाने की कोशिश शुरू कर दी हालांकि वह सीधी लड़ाई नहीं कर रहा था क्योंकि वहां हार का खतरा था। शिमला समझौते का उल्लंघन पाकिस्तान ने किया।
 
5. परंतु कश्मीरी आपके साथ नहीं रहना चाहते, आप क्या कर सकते हैं? कश्मीरी कौन हैं? दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी जब कहते हैं कि घाटी के 10 जिले पूरे प्रांत की जुबान नहीं हो सकते तो वे असली बात नहीं समझ पाते। यही 10 जिले बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदारवादियों की दलील और गड़बड़ है। अगर घाटी के मुस्लिमों की बात राज्य के अल्पसंख्यकों पर भारी पड़ती है तो शेष 99.5 फीसदी भारतीयों का क्या करेंगे? आप मोदी को पसंद करें या नहीं लेकिन उन्होंने शिमला समझौते के बाद की यथास्थिति भंग कर दी है। पाकिस्तान के लिए अद्र्ध सैनिक कार्रवाई का रास्ता बंद हो चुका है। कोई राजनैतिक दल अनुच्छेद 370 हटाने पर सवाल नहीं उठा रहा है, केवल तरीके पर सवाल उठाया जा रहा है। यह एक नई यथास्थिति है। पाकिस्तान इसे तोडऩे का जोखिम उठा सकता है। कश्मीर में गुस्सा, अलगथलग पडऩे, हिंसा, मानवाधिकार हनन की दिक्कतें हैं जिन्हें दूर करना होगा। शुरुआत यह स्वीकार करने के साथ होनी चाहिए कि भारत और पाकिस्तान की मौजूदा सीमा ही स्थायी सीमा है। हमें यह समझने के लिए बिल क्लिंटन की आवश्यकता नहीं है कि इस क्षेत्र के मानचित्र रक्त के सहारे दोबारा नहीं खींचे जा सकते। एक बार हकीकत स्वीकार करने के बाद भविष्य के बारे में बात की जा सकती है।
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