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उचित कदम

संपादकीय /  August 18, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में कहा था कि कारोबारी जगत में सरकारी हस्तक्षेप कम किया जाएगा और कारोबारी सुगमता में सुधार लाया जाएगा। इस क्रम में आगे पहल करते हुए सरकार कंपनी अधिनियम की 65 धाराओं की आपराधिकता समाप्त कर उन्हें वैध करने की योजना बना रही है। इन धाराओं में वर्णित अपराधों की प्रकृति गंभीर नहीं है। इस मामले से संबंधितकंपनी मामलों के मंत्रालय की समिति दो चरणों में काम करेगी। अगले चरण में वह धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं का अध्ययन करेगी और संभवत: अगंभीर प्रकृति के और लोकहित को न प्रभावित करने वाले मामलों में दंड कम किए जाएंगे। खबरों के मुताबिक सरकार उन मामलों में समझौतों के प्रावधान भी तैयार कर रही है जहां जनहित प्रभावित न हो रहा हो। 

 
कंपनी अधिनियम की समीक्षा और इसके कुछ प्रावधानों को वैधानिक बनाने का विचार लंबे समय से लंबित था और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इससे न केवल कंपनियों के परिचालन का वैधानिक माहौल सुधरेगा बल्कि कानूनी मामलों में भी कमी आएगी। पुराने कानूनों की समीक्षा और कारोबारी सुगमता से जुड़ी दिक्कतों को दूर करना आवश्यक है। परंतु सरकार को इस संदर्भ में समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि वह जो हासिल करना चाहती है, कुछ भी उसके उलट न हो। कंपनी अधिनियम में उल्लिखित कारोबारी सामाजिक दायित्व (सीएसआर) संबंधी धारा इसका उदाहरण है। कानून में हाल ही में संशोधन किया गया और ऐसे प्रावधान शामिल किए गए जिनके मुताबिक अगर सीएसआर नियमों का सही क्रियान्वयन नहीं किया गया तो कंपनी के अधिकारियों को जेल भेजा जा सकता है। अब कंपनी मामलों के सचिव इंजेती श्रीनिवास की अध्यक्षता वाली समिति ने इसका पालन न करने को दीवानी अपराध बनाने की अनुशंसा की है। इससे अधिकारियों को जेल जाने की आशंका नहीं रहेगी। यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर सरकार को कानून में तब्दीली करके इतने कड़े प्रावधान लाने की जल्दबाजी क्यों थी जबकि इस संबंध में गठित एक उच्च स्तरीय समिति ने अभी अपनी रिपोर्ट भी नहीं दी थी।
 
बहरहाल, समिति की अनुशंसा मामले को और जटिल बना रही है। उदाहरण के लिए उसने कहा है कि सीएसआर व्यय को कर रियायत वाला बनाया जाना चाहिए। मूल विचार है कंपनियों को प्रोत्साहित करना लेकिन हकीकत में इससे कर ढांचा अनावश्यक रूप से जटिल होगा। जबकि जरूरत इसे सहज बनाने की है। इससे नए विवाद सामने आएंगे। समिति ने यह अनुशंसा की है कि एक तय स्तर से ऊपर व्यय करने वाली कंपनियां अपने सीएसआर कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन करें। कई अन्य अनुशंसाएं हैं जो मामलों को जटिल बनाएंगी और जिनसे बचा जाना चाहिए।
 
अनिवार्य सीएसआर का विचार ही गलत है। हालिया संशोधन इसे और गड़बड़ कर रहे हैं। यह मानना सही नहीं है कि सीएसआर पर व्यय न करने वाली कंपनियां समाज में योगदान नहीं दे रहीं। वे वस्तु एवं सेवाएं उत्पादित करती हैं, रोजगार पैदा करती हैं और कर चुकाती हैं। यह व्यय स्वैच्छिक होना चाहिए। इसे अनिवार्य बनाने से कंपनियों और सरकार दोनों का बोझ बढ़ता है। कंपनियों को अपने संसाधन लगाने पड़ते हैं और सरकार को अनुपालन पर नजर रखनी होती है। इससे शोषण की आशंका उत्पन्न होती है। प्रभाव की बात करें तो अक्सर व्यय ऐसे क्षेत्रों में होता है जो पहले से विकसित होते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कंपनियों को स्थानीय इलाकों में ध्यान केंद्रित करने को कहा जाता है। इससे असमानता बढ़ती है। कुलमिलाकर सरकार का कंपनी अधिनियम के हिस्सों की समीक्षा करने का विचार सुखद है। इससे कारोबारी सुगमता बढ़ेगी। परंतु यदि वह वाकई कारोबारी माहौल सुधारना और निवेश जुटाना चाहती है तो उसे अधिक व्यापक नजरिया अपनाना चाहिए।
Keyword: narendra modi, company, CSR,,
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