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कठिनाई भरे आर्थिक हालात को नकार नहीं रहे प्रधानमंत्री मोदी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 14, 2019

प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए पहले साक्षात्कार पर मीडिया की करीबी निगाह रहती है और वह उसका विश्लेषण भी करता है। इस सप्ताह के आरंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई सरकार के गठन के बाद पहला साक्षात्कार द इकनॉमिक टाइम्स को दिया। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपने पहले साक्षात्कार के लिए एक आर्थिक अखबार को चुना जबकि उनकी नई सरकार काफी हद तक राजनीतिक एजेंडे पर चल रही है। साक्षात्कार के कुछ दिन पहले ही उनकी सरकार ने जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किया था और संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को लगभग निष्प्रभावी कर दिया था। सरकार ने राज्य को दो केंद्र शासित क्षेत्रों में बांटने की घोषणा भी की। जाहिर है, एक सामान्य समाचार पत्र को साक्षात्कार देकर इस कदम पर सरकार के नजरिये को स्पष्ट करना शायद अधिक उचित समझा जाता। 

 
प्रधानमंत्री द्वारा आर्थिक अखबार का चयन करने और अर्थव्यवस्था के बारे में बातचीत करने के भी उचित कारण हैं। अर्थव्यवस्था की गिरती हालत और पहले बजट पर बाजार तथा देश के उद्योग जगत की व्यापक तौर पर नकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद शायद साक्षात्कार के जरिये इन मुद्दों पर बात करना जरूरी हो गया था। देश की आर्थिक वृद्धि दर जनवरी-मार्च 2019 में घटकर 5.8 फीसदी रह गई और आने वाली तिमाही में हालात और खराब रहने की आशंका है। निर्यात वृद्धि चिंता का विषय है और शेयर बाजार को भी काफी नुकसान हुआ है। खासतौर पर बजट में बड़े अमीरों पर कर लगाने के प्रावधान का असर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के बड़े तबके पर भी पडऩा तय है।
 
ऐसे में शायद ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कारोबारियों में यह भावना बढ़ रही थी कि मोदी सरकार राजनीतिक एजेंडे पर अधिक केंद्रित है और अर्थव्यवस्था पर कम। साक्षात्कार को यह संदेश देने का उचित माध्यम माना गया कि मोदी अर्थव्यवस्था और उसकी समस्याओं को लेकर चिंतित हैं। साक्षात्कार में जम्मू कश्मीर को लेकर बात नहीं हुई, सारा जोर आर्थिक मुद्दों पर रहा। साक्षात्कार से दो संदेश एकदम स्पष्ट रूप से सामने आए। पहला संदेश बैंकरों तथा उद्योग जगत के अन्य नेताओं के लिए था। बैंकरों को आवश्स्त किया गया कि उनके द्वारा दिए जाने वाले कर्ज को लेकर उन्हें परेशान नहीं किया जाएगा। उनसे यह भी कहा गया कि वे ऐसी दरों पर ऋण दें जो अर्थव्यवस्था की कम मुद्रास्फीति को परिलक्षित करे। इसी तरह मोदी ने उद्योग जगत से आग्रह किया कि वे निवेश बढ़ाएं। उन्होंने कारोबारियों को आश्वस्त किया कि कानून का पालन करने वालों को सरकार का पूरा समर्थन मिलेगा। उन्होंने बेईमान कर अधिकारियों के खिलाफ उठाए गए कदमों का भी जिक्र किया।
 
दोनों संदेश ऐसे समय में आए हैं जबकि उद्योगपतियों और बैंकरों के शोषण की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं जहां कर अधिकारी अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए कारोबारियों और व्यापारियों को अधिक कर संग्रह के लिए परेशान करते रहे हैं। सरकारी बैंकर इस डर से ऋण देने में आनाकानी करते रहे कि कहीं कानून प्रवर्तन एजेंसियां उनके खिलाफ मामला न दर्ज कर लें। यही कारण है कि कारोबारी नेताओं और व्यापारियों के पास संसाधनों की कमी बनी रही। मोदी ने दो विशिष्ट उल्लेख किए। उन्होंने व्यक्तिगत आंकड़ों पर व्यक्ति के अधिकार को उतना ही महत्त्वपूर्ण बताया जितना कि निजी संपत्ति पर उसका अधिकार है। यह वक्तव्य डेटा को लेकर व्यापक चिंता को हल नहीं करता है लेकिन यह बड़ी बहुराष्ट्रीय डिजिटल कंपनियों को एक संदेश तो देता है। ये कंपनियां सरकार की डेटा स्थानीयकरण की नीति से खफा हैं। सरकार जोर देती रही है कि भारतीय डेटा से काम करने वाली विदेशी कंपनियों को अपना डेटा भारत में रखना होगा और उन पर भारतीय कानून लागू होंगे। जाहिर है विदेशी कंपनियों ने मोदी का संदेश सुन लिया होगा।
 
उनका दूसरा जोर वाहन उद्योग पर था जो कारों की मांग में आई भारी कमी से हिला हुआ है। ऐसे समय में जबकि विभिन्न सरकारी विभाग पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों को चलन से बाहर करने की योजना पर काम कर रहे हैं और उनकी जगह इलेक्ट्रिक व्हीकल लाना चाह रहे हैं, मोदी ने कहा कि देश का बाजार इतना बड़ा है कि यहां पारंपरिक वाहन और इलेक्ट्रिक वाहन दोनों की खपत है। उन्होंने कहा कि दोनों तरह के वाहन साथ-साथ चल सकते हैं। प्रधानमंत्री ने कई आश्वस्त करने वाले वक्तव्य दिए, मसलन राजकोषीय सुदृढ़ीकरण, बैंक, पेंशन, बीमा और बिजली क्षेत्रों में और सुधार तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और श्रम सुधार के मानकों पर और अधिक उदारीकरण की बात। उनकी बातों से लगा कि आने वाले दिनों में सरकारी कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री बढ़ेगी। 
 
उन्होंने यह संकेत दिया कि सरकार टोल रोड और पुलों को निजी क्षेत्र को बेचकर उससे मिलने वाले संसाधन का इस्तेमाल नई बुनियादी परियोजनाओं में निवेश के रूप में करने के पुराने विचार से दूर हो रही है। जिन लोगों को आशा थी कि सरकार अपनी जेब ढीली कर ऐसी बुनियादी परियोजनाओं पर और अधिक खर्च करेगी, वे इससे निराश होंगे। नई पूंजी जुटाने के लिए परिसंपत्ति पुनर्चक्रण के बारे में सरकार गंभीरता से नए सिरे से विचार कर रही है। ये तमाम आश्वस्तिकारक संदेश उद्योग और बाजार का मिजाज बदल पाएंगे या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। सुधार की ऐसी प्रतिबद्धताओं तथा नीतिगत पहलों से होने वाले आर्थिक लाभ भी इस बात पर निर्भर करेंगे कि इन्हें कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से अंजाम दिया जाता है। परंतु प्रधानमंत्री ने इन मसलों पर बात करने के लिए एक अखबार को साक्षात्कार देना उचित समझा, यह दर्शाता है कि वह इन बातों को नकार नहीं रहे हैं। शायद उन्हें पता चल गया है कि अर्थव्यवस्था पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। 
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