बिजनेस स्टैंडर्ड - ढांचागत मंदी और घरेलू बाजार की मांग
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ढांचागत मंदी और घरेलू बाजार की मांग

रथिन रॉय /  August 14, 2019

नीति निर्माताओं के लिए चीजें स्पष्ट हैं लेकिन ढांचागत मंदी की व्याख्या कई तरह से की जा सकती है। इसमें विश्लेषण ढांचे से लेकर जमीनी हालात की समझ तक कई कारक हैं। बता रहे हैं रथिन रॉय

 
कई अर्थशास्त्री अब वह बात कह रहे हैं जो मैं पिछले काफी वक्त से कह रहा हूं- मौजूदा आर्थिक मंदी ढांचागत है। इसकी वजह कारोबारी चक्र में मंदी नहीं है। ऐसे में प्रतिचक्रीय नीतियों की मदद से इससे नहीं निपटा जा सकता है। हालांकि यह नीति निर्माताओं के लिए तत्काल समझने की बात है किंतु ढांचागत मंदी की व्याख्या भी कई तरह से की जा सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का विश्लेषणात्मक खाका और जमीनी हकीकत की उसकी समझ कैसी है। कुछ लोगों के लिए ढांचागत का अर्थ यह है कि जिन क्षेत्रों ने अतीत में वृद्घि में बेहतर योगदान किया है उन्हें क्षेत्रवार दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इन दिक्कतों को हल करने के लिए क्षेत्रवार नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए ऋण तक पहुंच की समस्या को हल करना या विपरीत नीतियों को ठीक करना। यह फिलहाल वाहन क्षेत्र को लेकर हो रही चर्चा में देखा जा सकता है। 
 
वृहद स्तर पर देखें तो ढांचागत मंदी को अक्सर आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कत के रूप में देखा जाता है। संस्थागत संकट या निवेश में रुकावट की समस्या आती है और प्राय: सुधारात्मक उपाय किए जाते हैं। ऐसे में अर्थशास्त्री प्राय: कारक बाजार (श्रम एवं भूमि बाजार), वित्तीय बाजारों (ऋण एवं पूंजी बाजार) और नियामकीय सुधारों की वकालत करते हैं। मांग में कमी के सवाल को एक चक्रीय प्रवृत्ति के रूप में देखा जाता है। हालांकि इस रुझान को प्रमुखता तब मिली जबकि आपूर्ति क्षेत्र की आर्थिकी ने जोर पकड़ा। सन 2008 के बाद से जहां विश्व स्तर पर इसका दबदबा समाप्त हुआ है वहीं हमारे यहां यह बरकरार है। ढांचागत मांग की समस्या मौजूदा दौर में भारत की दृष्टि से विशिष्ट आर्थिक स्थिति की दिक्कतों को हल करने की दृष्टि से अहम है। मैंने पहले भी दलील दी थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था सन 1991 से मोटे तौर पर देश की आबादी के 10 से 15 फीसदी हिस्से की खपत की मांग के आधार पर आगे बढ़ी है। यह बात इस तथ्य से भी परिलक्षित होती है कि देश की आर्थिक वृद्घि के प्रमुख संकेतक इस बात से संचालित होते हैं कि लोग किस चीज की खपत करते हैं- वाहन, एफएमसीजी, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तु, वित्तीय सेवाएं आदि।
 
सन 1991 के बाद इस वृद्धि को गति देने के लिए सापेक्षिक कीमतों में परिवर्तन देखने को मिला। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। सन 1988 में कॉलेज के युवा लेक्चरर के रूप में मेरा वार्षिक वेतन 36,000 रुपये था। उस वक्त सबसे सस्ती कार 1.50 लाख रुपये की थी यानी चार वर्ष के वेतन के बराबर। वातानुकूलक यानी एसी 20,000 रुपये का था जो सात माह के वेतन के बराबर था, मुंबई से दिल्ली का हवाई टिकट 3,000 रुपये का था, यानी एक माह के वेतन के बराबर। आज उसी काम का वार्षिक वेतन 7.50 लाख रुपये है। वही वस्तुएं अब क्रमश: छह महीने, 10 दिन और एक दिन के वेतन में खरीदी जा सकती हैं।
 
जाहिर है इससे घरेलू मांग बढ़ी। निजी निवेश ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। इसके कारण वृद्धि का एक ऐसा चक्र शुरू हुआ जिसमें उत्पादन ढांचा उन पूंजी प्रोत्साहन वाली वस्तुओं की ओर स्थानांतरित हो गया जिनका उपभोग शीर्ष 15 प्रतिशत लोग करते हैं। मनरेगा जैसे कल्याणकारी कदमों और मध्यम वर्ग के आवास में तेजी ने इसे झटका भी दिया। आवास बाजार ने विनिर्माण क्षेत्र के रोजगारों को बढ़ावा दिया। निर्यात और कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन ने प्राय: घरेलू मांग की पूर्ति की। उच्च वृद्धि से राजकोषीय गुंजाइश बनती है जिसका इस्तेमाल खाद्य सब्सिडी देने और गरीबी हटाने में किया जाता है।
 
मध्यम अवधि में इस मॉडल के कामयाब होने की गुंजाइश नहीं दिखती क्योंकि मौजूदा मंदी संकेत देती है कि इसकी सीमाओं ने अर्थव्यवस्था पर अपेक्षाकृत जल्दी असर डाला है। शीर्ष आय वर्ग की मांग में संतृप्ति आ रही है लेकिन कम आय वाले लोग उन चीजों को अभी भी नहीं खरीद पा रहे हैं जो शीर्ष संकेतकों में आती हैं। अब तक जो क्षेत्र वृद्धि के वाहक रहे हैं वे अब धीमे पड़ रहे हैं। परंतु निवेश में इसलिए कमी आई है क्योंकि यह अन्य क्षेत्रों में मांग की स्थिति पर प्रतिक्रिया दे रहा है। अन्य क्षेत्र भी गति नहीं पकड़ रहे हैं जबकि कृषि क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन से हालात और अधिक बिगड़ रहे हैं। निर्यात और बढ़े हुए सरकारी निवेश से मांग की ढांचागत समस्या के हल होने की बात कही जाती रही है लेकिन हमारे देश की वृद्धि निर्यात आधारित नहीं है। निर्यात घरेलू मांग के पूरक काम करता है लेकिन वह कभी वृद्धि का वाहक नहीं रहा है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो ढांचागत समस्या दूर नहीं होगी। सार्वजनिक निवेश सीमित घरेलू वित्तीय बचत के कारण बाधित है। केंद्र के राजकोषीय घाटे का 65 फीसदी खपत व्यय की पूर्ति में लग जाता है। कर प्राप्ति में भी बहुत अधिक सुधार की आशा नहीं है क्योंकि मंदी का दौर चल रहा है। ढांचागत मांग की समस्या को देखते हुए वृद्घि संबंधी नीति में सस्ती दरों के माध्यम से लाभ उठाना चाहिए। कम से कम न्यूनतम वेतन वालों के लिए कीमतों को व्यवहार्य बनाना चाहिए। 
 
ग्रामीण भारत को एक ऐसा स्थान माना जाता है जहां हमने खाद्य संकट दूर किया। इस दौरान आय और मांग के सवालों को धता बताया जा रहा। सस्ते आवास भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां निजी निवेश आर्थिक गतिविधियों और रोजगार को बढ़ावा दे सकता है। न्यूनतम आय वाले लोगों पर ध्यान केंद्रित कर ऐसा किया जा सकता है। हम देश में अमीरों के लिए कपड़े बनाते हैं जबकि न्यूनतम आय वालों के लिए सस्ते कपड़े बांग्लादेश और वियतनाम से आयात किए जाते हैं। वस्त्र क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने और शुद्घ आयात कम करने से वृद्घि और रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। 
 
स्वास्थ्य और शिक्षा दो ऐसे क्षेत्र हैं जहां 20 वर्ष से मांग व्यापक है। अमीर इस मामले में आयात पर भरोसा करते हैं और इसलिए उनकी मांग पर आधारित कारोबारी मॉडल नाकाम हो रहे हैं। सस्ती लेकिन बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं की मांग न्यूनतम वेतन वाले लोगों में ज्यादा है। इससे आर्थिक गतिविधियों और रोजगार में भी इजाफा होगा। मौजूदा कारोबारी मॉडल इस मांग को पूरा करने में असमर्थ है। अगले स्तंभ में मैं उन वृहद आर्थिक नीतियों की चर्चा करूंगा जिनके बारे में माना जा सकता है कि वे अल्पावधि में मंदी के असर से बचा सकती हैं लेकिन मध्यम अवधि में हमें मांग की ढांचागत समस्या को दूर करना होगा। आपूर्ति क्षेत्र की बाधाएं सही हैं लेकिन उनको हल करते हुए मांग क्षेत्र की बाधाओं को धन में रखना होगा। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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