बिजनेस स्टैंडर्ड - वस्तु एवं सेवा शुल्क का प्रदर्शन और इससे जुड़े कुछ प्रश्न
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वस्तु एवं सेवा शुल्क का प्रदर्शन और इससे जुड़े कुछ प्रश्न

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  August 13, 2019

आज देश की अर्थव्यवस्था जिस भारी संकट से गुजर रही है, उसके मूल में मौजूदा सरकार की जो नाकामियां हैं, उनमें से प्रमुख है वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को समुचित ढंग से तैयार करने और क्रियान्वित करने में नाकामी। जीएसटी को एकल कर दर होना था जिससे करदाताओं का बोझ काफी कम होता, कागजी कार्रवाई कम होती, अनुपालन की लागत में गिरावट आती, इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग आसान होती और अनुपालन बढ़ता। इसके साथ ही कर दायरे में इजाफा होता और पहले बाहर रहे उत्पादों पर कर लगने से सरकार का राजस्व बढ़ता। इसके कारण पूरी कर व्यवस्था में जो किफायत आती वह सकल घरेलू उत्पाद में इजाफा करने के साथ-साथ आर्थिक वृद्घि और जीवन स्तर सुधारने में सहायक होती। 

 
हम आज कहां हैं? सबसे पहली बात, जीएसटी राजस्व के मोर्चे पर अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।  गत वित्त वर्ष में कुल राजस्व सकल घरेलू उत्पाद के एक फीसदी तक कम रहा। हालांकि केंद्रीय बजट में इस तथ्य को जनता से छिपाने का प्रयास किया गया। यह कमी पूरी तरह जीएसटी के कारण रही जो गत वर्ष के बजट अनुमान से कम संग्रह कर सका। ऐसा क्यों हुआ? एक वजह तो यह हो सकती है कि शायद कर वंचना अनुमान से अधिक रही। ऐसा इसलिए क्योंकि जीएसटी काफी हद तक इनवॉइस मिलान पर निर्भर रहा। परंतु ऐसे मिलान के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सही तरीके से बनाया ही नहीं गया था। जीएसटी अपने आप में अत्यंत जटिल है और इसके चलते इनवॉइस मिलान का काम उचित तरीके से नहीं हो सका। इससे फर्जी इनवॉइस सामने आने लगे। परिणामस्वरूप भुगतान सुगम होने और चतुराईपूर्ण तकनीकी निस्तारण के जरिये अनुपालन में सुधार से इतर सरकार अब इस बात पर नजर रख रही है कि कर अधिकारियों को ज्यादा अधिकार कैसे दिए जाएं। यह जीएसटी की मूल भावना के प्रतिकूल है।
 
एक अन्य समस्या कर दरों की है जो बहुत ज्यादा हैं या बेहद कम हैं। हमें यह समझना होगा कि राजस्व निरपेक्ष कर दर आखिर क्या हो सकती है। अगर यह 18 फीसदी है और शराब और ईंधन इसमें शामिल हैं तो हमें यह दर बरकरार रखनी होगी। अगर हमें अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं को कम कर दर के दायरे में रखना है और यदि जीएसटी परिषद अपना पूरा समय दरों में बदलाव या कमी करने में लगा देती है तो स्वाभाविक है कि हम राजस्व लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाएंगे। अगर हमें कम कर दर वाला देश बने रहना है तो यह ठीक है लेकिन तब हमें यह मानना होगा कि हम जीएसटी क्रियान्वयन से राजस्व निरपेक्षता नहीं हासिल कर रहे हैं। ऐसे में हमें व्यय में कटौती करनी होगी। परंतु उस स्थिति में हमें अपना रुझान बदलना होगा और कुछ कड़े फैसले लेने होंगे। 
 
उदाहरण के लिए यह मानना होगा कि बीते दशक में व्यय में सबसे अधिक इजाफों में से एक अद्र्धसैनिक बलों में हुआ। रक्षा पर आगे होने वाले व्यय में स्थायी रूप से इजाफा हो सकता है। व्यवहार में ऐसा बदलाव सरकारी व्यय को तयशुदा सीमा में रखने के लिए आवश्यक हो सकता है। हम उतना व्यय नहीं कर सकते न ही कर लगा सकते हैं। ऐसे में हमारे पास उक्त काम करने का कोई स्थायित्व भरा तरीका नहीं है। समस्या यह है कि अगर हम अनुमान से कम जीएसटी संग्रह करते हैं और सरकार का यह कहना सही है कि दरों में कटौती आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए की गई है तो वह बढ़ोतरी कहां है? कारोबारियों में उत्साह की भावना क्यों नहीं नजर आ रही है? अगर लोगों के पास इतनी अधिक धनराशि है तो खपत में इजाफा क्यों नहीं आ रहा है और निवेश बढ़ता हुआ क्यों नहीं दिख रहा?
 
एक दिक्कत यह हो सकती है कि जीएसटी की निवेश अनुकूलता का लक्ष्य भी हासिल नहीं हुआ है। कारोबारी समूहों के जीएसटी चुकाने को लेकर कई तरह के सुधार किए गए हैं और अन्य सुधार प्रक्रियाधीन हैं। यह कहा जा सकता है कि देश में अभी भी निवेश की दृष्टि से बहुत अनुकूल माहौल नहीं है। दरों में बार-बार बदलाव हो रहा है। न केवल जीएसटी दर बल्कि सीमा शुल्क दरों पर भी यही बात लागू होती है। कर आतंक एक हकीकत है। कर निरीक्षकों को जीएसटी लागू होने के बाद बहुत अधिक अधिकार दे दिए गए हैं। इन सारी वजहों से निवेश सामान्य स्तर से भी नीचे चला गया। जीएसटी के कारण आर्थिक गतिविधियों में इजाफा होने का अनुमान इस बात पर निर्भर था कि कर व्यवस्था कम आक्रामक हो। हालांकि कर भुगतान व्यवस्था में सुधार की योजना है वहीं इसे लेकर कहीं अधिक इच्छाशक्ति से काम करने की जरूरत है। अधिकांश करदाताओं के लिए जीएसटी फॉर्म स्वत: तैयार होने चाहिए और उन्हें तीसरे पक्ष की इनवॉइस और बिल निस्तारण ऐप के माध्यम से जमा करने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिन्हें मोबाइल से संचालित किया जा सके। अगर इनवॉइस मिलान का काम नहीं हो पाता तब हमें दूसरी दिशा में प्रयास करते हुए अनुपालन को आसान बनाना होगा। इसके लिए श्रम की बचत वाले तकनीकी नवाचार करने होंगे। वित्त मंत्रालय को निजी क्षेत्र के वित्तीय प्रौद्योगिकी उद्योग के लोगों को साथ लेकर इसे अंजाम देना चाहिए। कर भुगतान सुगम बनाने को लेकर सार्वजनिक मशविरा भी किया जाना चाहिए। 
 
सरकार निरंतर यह दावा कर रही है कि वह बुनियादी वस्तुओं पर अधिक कर दर नहीं रख सकती लेकिन जीएसटी के पीछे की अवधारणा यही कहती है कि गरीबों की क्षतिपूर्ति का सबसे बेहतर और किफायती तरीका अप्रत्यक्ष करों के साथ छेड़छाड़ करना नहीं बल्कि प्रत्यक्ष सब्सिडी में बदलाव है। सरकार उसका तरीका पहले ही निकाल चुकी है और सब्सिडी देने में अपनी सक्षमता पर उसे गर्व भी है। ऐसे में सरकार को विविध दरों का बचाव त्याग देना चाहिए और किफायत और उन लाभों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो उसे देश के गरीबों की सब्सिडी जारी रखने के संसाधन देंगे। आज सरकार के पास न तो सब्सिडी के लिए पैसा है और न ही अर्थव्यवस्था में गति है। 
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