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निर्यात प्रोत्साहन पर मंत्रालयों में खींचतान

दिलाशा सेठ और शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली August 12, 2019

निर्यात क्षेत्र को वित्तीय सहायता को लेकर वित्त मंत्रालय और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के बीच खींचतान चल रही है। सूत्रों ने कहा कि राजस्व सचिव एबी पांडेय जहां वस्तुओं के भारत से निर्यात योजना (एमईआईएस) को पूरी तरह से वापस लेने पर जोर दे रहे हैं, वहीं वाणिज्य सचिव अनिल वधावन इसे चरणबद्घ तरीके से वापस लेने के पक्ष में हैं। सूत्रों के मुताबिक राजस्व विभाग निर्यातकों के लिए किसी भी तरह की प्रोत्साहन योजना को खत्म करने के लिए नियत तिथि तय करने की बात कह रहा है। दूसरी ओर वाणिज्य मंत्रालय वित्तीय आवंटन की जरूरत का सालाना आधार पर मूल्यांकन करने पर सहमत है। वाणिज्य विभाग ने पिछले हफ्ते कैबिनेट प्रस्ताव जारी कर एमईआईएस की जगह विश्व व्यापार संगठन के अनुपालन में राज्य एवं केंद्रीय करों तथा शुल्क में रियायत का विकल्प सुझाया है। वाणिज्य मंत्रालय ने पिछले महीने एमईआईएस में कुछ महीनों के लिए 2 फीसदी अतिरिक्त रियायत पर जोर दिया था ताकि निर्यातकों को थोड़ी मदद मिल सके।
 
परिधान और तौलिये-पर्दे जैसे क्षेत्रों के लिए मार्च से ही राज्य एवं केंद्रीय करों तथा शुल्क रियायत लागू है। कपड़ा मंत्रालय एमईआईएस को अभी कुछ महीने जारी रखने के पक्ष में है। सूत्रों का कहना है कि राजस्व सचिव वित्तीय दबाव को देखते हुए वैकल्पिक योजनाओं को लागू करने के बाद एमईआईएस को तत्काल खत्म करने पर जोर दे रहे हैं। उनका आकलन है कि इससे खजाने पर सालाना 5,131 करोड़ रुपये का बोझ पड़ रहा है। सरकार से जुड़े एक सूत्र ने कहा, 'राजस्व विभाग चाहता है कि नई योजना को 3 महीने के अंदर लागू किया जाए, जबकि वाणिज्य विभाग इसे चरणबद्घ तरीके से सभी निर्यात क्षेत्रों में लागू करने पर जोर दे रहा है।'
 
राज्य एवं केंद्रीय करों तथा शुल्क में रियायत के तहत विदेश व्यापार के महानिदेशालय निर्यातकों को एमईआईएस की तरह ही शुल्क में लाभ दे सकता है। लेकिन यह आईटी आधारित होगा और सभी रियायत राज्य और केंद्रीय करों के भुगतान इनपुट पर आधारित होंगे।  एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'अंतर-मंत्रालय बैठक में निर्णय किया गया था कि कर की दर का निर्णय मंत्रिमंडल की मंजूरी के 3 महीने के अंदर ड्यूटी ड्रॉबैक समिति द्वारा तय किया जाएगा।' एमईआईएस को 2015 में विदेश व्यापार नीति के तहत लागू किया गया था। इसका मकसद 5,000 से अधिक उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहित करना था। इसके तहत निर्यातकों को देश में बने उत्पादों पर 2 से 5 फीसदी तक शुल्क क्रेडिट का लाभ मिलता है।वित्त मंत्रालय से इसे हटाने या संशोधन करने का दबाव बढ़ रहा है क्योंकि इससे वित्तीय बोझ बढ़ रहा है। 
 
बजट दस्तावेजों के अनुसार एमईआईएस में 2018-19 में 36,615 करोड़ रुपये व्यय हुए हैं। इसके अलावा, सरकार ने अतिरिक्त 2 फीसदी एमईआईएस को लागू किया था। एमईआईएस और सेवा क्षेत्र के लिए इसी तरह की योजना से सालाना अतिरिक्त 8,561 करोड़ रुपये का बोझ बढऩे का अनुमान है।
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