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गांवों में निवेश अर्थव्यवस्था सुधारने का बेहतरीन तरीका

प्रणव सेन /  August 12, 2019

मंदी कई घटनाओं का परिणाम है। इसका एक हिस्सा चक्रीय है, लेकिन ढांचागत मसला भी है। आंकड़ों से जुड़े मसले भी हैं। इसकी दो अहम वजहें हैं- चक्रीय मंदी, जिसकी शुरुआत 2013-14 में हुई थी और ढांचागत वजहें जिसमें नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किया जाना शामिल है। आज हम जो स्थिति देख रहे हैं, अर्थव्यवस्था में मांग घट गई है, जो सीधे तौर पर परिवारोंं के रोजगार और आमदनी से जुड़ा हुआ है, जो औपचारिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिलती थी। 

 
नोटबंदी के बाद अनौपचारिक क्षेत्र संकट में है। जबकि हम देख रहे हैं कि वृद्धि बढ़ी है, क्योंकि जीडीपी के आंकड़ोंं में औपचारिक क्षेत्र होता है, न कि अनौपचारिक क्षेत्र। नोटबंदी के बाद साफ नजर आता है कि बीच के चरण में मांग अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र मेंं चली गई है, जिससे अस्वाभाविक तेजी नजर आती है। अब हम यह देख रहे हैं कि स्थिति सामान्य होने के संकेत मिल रहे हैं। अनौपचारिक क्षेतत्र ने रेंगना शुरू कर दिया है और नोटबंदी के बाद छोड़ी गई कुछ जगह हासिल कर रहा है। यह प्रक्रिया थोड़ी आसान होती, अगर उसके तत्काल बाद जीएसटी न लागू कर दिाय गया होता। इस तरह की स्थिति मेंं औपचारिक क्षेत्र अब असामान्य वृद्धि गंवा रहा है और अनौपचारिक क्षेत्र वह जगह ले रहा है। यह एक बार फिर आंकड़ों में नजर आने लगा है कि औपचारिक क्षेत्र नीचे जा रहा है। 
 
मंदी से निपटने के लिए दो रास्ते हैं। अगर आप औपचारिक क्षेत्र की बात कररहे हैं तो एक अलग कार्रवाई होगी। अगर आप व्यापक अर्थव्यवस्था की बात कर रहे हैं तब दूसरे तरह के कदम उठाने पड़ेंगे। इन सबमें अहम यह है कि सरकार बेरोजगारी बढऩे की वजहें समझ नहीं पा रही है। ऐसा अभी नहीं हुआ है, बल्कि यह 2016 से बढ़ रही है और यह नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी लागू होने के बाद से हुआ है। अगर बेरोजगारी बढ़ रही है तो हम जानते हैं कि वेतन भी स्थिर है। हमेंं वेतन स्थिर होने व बेरोजगारी पर ध्यान देने की जरूरत है, न कि जीडीपी के आंकड़ोंं पर क्योंकि यह सिर्फ सांख्यिकी का मसला है। 
 
मेरा कहना यह है कि कारोबार बहाल होने की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। सरकार अब इसमेंं तेजी लाने का काम कर सकती है। निवेश आधारित वृद्धि की बात आर्थिक समीक्षा में की गई है। मसला यह है कि इस समय निवेश का एकमात्र स्रोत पूरी तरह से स्वायत्त है, जो सार्वजनिक निवेश है। आर्थिक समीक्षा में निवेश आधारित तेजी की बात की गई है। केवल सार्वजनिक निवेश स्वायत्त है। इसके अलावा अन्य सभी निवेश इस अवधारणा पर आश्रित हैं कि मांग के मामले में क्या हो रहा है। 
 
घरेलू मांग बहाल करे के हिसाब से आपको कम आय वर्ग के लोगोंं की कमाई व आजीविका में सुधार करने की जरूरत है। बेरोजगारी बहुत ज्यादा है। बड़ी परियोजनाओं की घोषणा करके कॉर्पोरेट निवेश पर ध्यान केंद्रित करने से यह समस्या हल नहीं होने जा रही है। सरकार का ध्यान ऐसे निवेश पर केंद्रित होना चाहिए, जो स्थानीय हैं और स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं और जिनका इस्तेमाल छोटी कंपनियां करती हैं। उदाहरण के लिए अगर आप सड़क क्षेत्र को लें तो राजमार्गों की जगह ग्रामीण सड़कोंं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। ऊंचे भवनों के बजाय सस्ते मकानों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। बड़ी बिजली परियोजनाओं की जगह स्थानीय सौर फर्मों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिससे ग्रामीण इलाकों में काम हो सके। इस मामले में सरकार ठीक काम कर रही है। लेकिन अभी यह धारणा बनीहुई है कि यह सब चीजें गरीबों को खुश रखने के लिए की जा रही हैं। मेरा सुझाव यह है कि वृद्धि बहाल करे का यह बेहतर रास्ता है। 
 
(बातचीत: अरूप राय चौधरी)
Keyword: iindia, economy, rural,,
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