बिजनेस स्टैंडर्ड - जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्रवासन की बढ़ती समस्या
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जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्रवासन की बढ़ती समस्या

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  August 12, 2019

मैं एक ऐसी तस्वीर साझा कर रही हूं जो मेरे जेहन से निकल ही नहीं रही है। हम एक कमरे में कैद हैं और वहां मौजूद छोटी सी खिड़की से देख पा रहे हैं कि बाहर का मौसम बेहद खराब हो चुका है। जंगलों में आग लगी हुई है, गर्म हवाएं चल रही हैं, तेज बारिश हो रही है और तूफान आया हुआ है। यह सबकुछ पहले जताई आशंकाओं के अनुरूप है लेकिन हमारी चीखें नहीं सुनी जा रही हैं। ऐसा लग रहा है मानो यह सब कहीं और चल रहा है, मानो यह हकीकत न हो। मुझे पता है कि यह बहुत नाटकीय प्रतीत होता है लेकिन यह तथ्य है। तेजी से बदलते मौसमी रुझानों और पृथ्वी पर बढ़ती गर्मी का असर हमारे सामने है। लेकिन हमारा ध्यान व्यापार युद्घ, ब्रेक्सिट, आव्रजन, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रवाद, युद्घ जैसी बातों में लगा हुआ है। मानव इतिहास में जलवायु परिवर्तन शायद इससे बुरे वक्त में नहीं हो सकता था। हम इससे निपटने में असमर्थ नजर आ रहे हैं।  

 
यही वह वक्त है जब यह स्पष्ट हो चला है कि चीजें हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। हर वर्ष हमें कहा जाता है कि यह सबसे गर्म वर्ष है। अगले वर्ष यही कहानी दोहराई जाती है। इसके बाद एक नया रिकॉर्ड टूटता है। हालात निरंतर बिगड़ते जा रहे हैं। हम सबको यह पता है, हम इसे महसूस कर सकते हैं। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि अपने अस्तित्व की चुनौती से जूझ रहे लोगों के लिए इसका क्या मतलब है? बात चाहे सूखे की हो या बाढ़ की, लोगों को इनकी वजह से मजबूरन काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाना होता है। ये लोगों को घर से बाहर निकलने पर मजबूर करते हैं। कई बार यह अस्थायी होता है और कई बार उनका यह प्रवास स्थायी हो जाता है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन का खतरा मुंह बाये हमारे सामने खड़ा है। 
 
अमिताभ घोष अपने नए उपन्यास गन आइलैंड में हमें प्रवासियों की पीढिय़ों से मिलाते हैं। जहां अतीत और वर्तमान में लोगों को नई आजीविका की तलाश में अपना घर बार छोड़कर निकलना पड़ा। प्रवासी हमेशा से बदलाव का मानवीय चेहरा रहे हैं, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। यह भी सच है कि प्रवास केवल मजबूरन नहीं किया जाता बल्कि कई बार लोग दूसरी जगह बेहतर भविष्य की उम्मीद में भी अपना घरबार छोड़ते हैं। पूरी दुनिया आपस में इस कदर जुड़ी हुई है कि इसके कई तरह के असर हमारे सामने हैं। एक तो यह कि एक देश का कार्बन डाई ऑक्साइड पूरी दुनिया के वातावरण को प्रभावित करता है। दूसरा दुनिया भर के समाचार मोबाइल टेलीफोनी की गति से एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। इस संदर्भ में देखें तो लोगों का एक जगह से दूसरी जगह आना जाना भी बढ़ेगा। 
 
सवाल यह है कि इस तेज गति से हो रहे प्रवासन को लेकर हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी। प्रवासन पहले ही कई देशों की राजनीति को प्रभावित कर रहा है। भारत में हम इस बात पर चर्चा करते हैं 'बाहरी लोगों' की गणना कैसे की जाए। हमें यह भी पता नहीं कि एक बार उनकी गिनती हो जाने के बाद क्या होगा? यूरोप में जनता का मिजाज उन तस्वीरों से निर्धारित हो रहा है जिनमें नौकाओं पर सवार लोग बड़ी तादाद में अवैध तरीके से देश पहुंच रहे हैं। अमेरिका में दीवार खड़ी की जा रही है और लाखों लोग अमेरिका प्रवेश की आकांक्षा लिए खड़े हैं। सोशल मीडिया से लेकर तमाम सार्वजनिक जगहों पर यह सब चर्चा का विषय है। प्रवासियों को लेकर चल रही बहस वास्तविक है और इससे निपटने की हमारी प्रतिक्रिया काफी हद तक नाकाफी है। हमारे कदम और शब्द इसके लिए नाकाफी हैं। यही वजह है कि समाज में पहले ही इसे लेकर असुरक्षा और भय का माहौल बन गया है। इससे समुदायों के बीच कड़वाहट बढ़ रही है और ध्रुवीकरण हो रहा है। इसका फायदा राष्ट्रवादी दल उठा रहे हैं। 
 
याद कीजिए कि अमेरिका के टैक्सस शहर के अल पासो में जब एक श्वेत व्यक्ति ने लोगों पर गोलीबारी की तो उसने कहा कि वह यह काम दुनिया को जलवायु संकट से बचाने के लिए कर रहा है। उसने अपने ब्लॉग पर दलील दी थी कि अमेरिकी कभी अपनी जीवनशैली नहीं त्यागेंगे, हालांकि वह मानता है कि यह पूरी पृथ्वी को नष्ट कर रही है। उसका जवाब है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को समाप्त करने से अमेरिकी जीवन शैली को निभाना संभव होगा। वह लोगों को मारकर अमेरिका में प्रवेश करने से रोकना चाहता था। 
 
अतीत में मैंने ऐसी हरकतों को पागलपन कहकर खारिज किया था। परंतु अब हम ऐसी जगह पहुंच रहे हैं जहां संकट के दो कोण मिलेंगे और स्थितियां विस्फोटक होंगी। अभी भी हमारे पास प्रवासन को लेकर समुचित आंकड़े नहीं हैं। हम जलवायु कारणों से बने शरणार्थियों के बारे में सहजता से इसलिए बात करते हैं क्योंकि इस समस्या की प्रकृति और गंभीरता को समझना आसान नहीं। कहने का अर्थ यह नहीं है कि प्रवासन बुरा है। सच तो यह है कि तमाम शहर और देश बने ही इसलिए क्योंकि लोग एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसे। हमारे देश में आंतरिक प्रवासन की समस्या रोजगार से जुड़ी है। हर क्षेत्र में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो बाढ़ या सूखाग्रस्त क्षेत्रों से वहां आए हैं। कई लोग रोजगार की तलाश में आते हैं। 
 
हमारे देश में ऐसे लोगों से जुड़ा कोई आंकड़ा नहीं है क्योंकि पिछली जनगणना दशक भर पहले हुई थी। परंतु शहरों के आसपास अवैध बस्तियों को देखकर यह तय है कि बड़ी तादाद में लोग एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं। इसका राजनीति पर प्रत्यक्ष प्रभाव नजर आता है। हालात आगे और खराब होंगे। मैं इस लेख का समापन नहीं कर रही हूं क्योंकि मेरे पास कोई निष्कर्ष नहीं है। परंतु मैं मानती हूं कि अब वक्त आ गया है कि हम जलवायु परिवर्तन की प्रकृति पर मानवीय ढंग से चर्चा करें। 
Keyword: environment, world, india, health, population,,
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