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संरचनात्मक बदलावों की सरकार से उम्मीद बेमानी

देवाशिष बसु /  August 12, 2019

आर्थिक सुस्ती करीब आने के साथ ही सरकार के कदमों को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। देवाशिष बसु का कहना है कि संरचनात्मक सुधारों के बगैर कोई भी कदम असरदार नहीं हो पाएगा

 
पिछला माह काफी घटना-प्रधान रहा। कैफे कॉफी डे के संस्थापक वी जी सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली और अपने पीछे एक चि_ी छोड़ गए जिसमें बड़े पैमाने पर हुई गड़बडिय़ों को स्वीकार करने के साथ ही वह कर अधिकारियों के हाथों उत्पीडऩ के संकेत भी दे गए। इस सुसाइड नोट के सामने आने के बाद आई प्रतिक्रियाएं राजनीति, उद्यमशीलता, जोखिम उठाने से जुड़ी मुश्किलों और अत्यधिक कर्ज से जुड़े तमाम पहलुओं को रेखांकित करती हैं। अधिकांश प्रतिक्रियाओं में भावनाओं की अधिकता थी, लिहाजा वे असली मुद्दे से भटक भी गईं। अधिक तर्कसंगत समझ के लिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि खुदकुशी का ताल्लुक किसी व्यक्ति की भौतिक स्थिति से नहीं बल्कि उसकी मानसिक स्थिति से होता है। आखिर, कई लोग अपने करीबियों समेत सब-कुछ गंवा देने के बावजूद खुदकुशी का रास्ता नहीं अपनाते हैं।
 
सिद्धार्थ की मौत मौजूदा आर्थिक सुस्ती की फिर से परीक्षा करने का एक मौका देती है। भारत में करीब 50 फीसदी घरेलू यात्री वाहनों की निर्माता मारुति सुजूकी को जुलाई 2019 में बिक्री में 33.5 फीसदी गिरावट का सामना करना पड़ा है और उसने अपने अस्थायी कर्मचारियों में छह फीसदी की कटौती कर दी है। जनवरी-मार्च तिमाही में भारत से आने-जाने वाले हवाई यात्रियों की संख्या 3.8 फीसदी की दर से ही बढ़ी है जो गत चार वर्षों की सबसे धीमी रफ्तार है। इस तरह के निराशाजनक आंकड़ों की मीडिया में भरमार है।
 
आर्थिक सुस्ती इतनी गंभीर है कि मौजूदा सरकार के इरादों और क्रियाकलाप को लेकर आशंकित कारोबारियों ने अब खुलकर अपनी हताशा जतानी शुरू कर दी है। हाल-फिलहाल तक इस सरकार के हरेक कदम की तारीफ करते रहे टी वी मोहनदास पई ने अब उस पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। पई कहते हैं, 'कर आतंक काफी बढ़ गया है। अनुपालन का बोझ भी बहुत अधिक हो चुका है। हर तरफ डर का माहौल है। सरकारी अधिकारियों के बीच ऐसी भावना है कि सभी कारोबारी धूर्त हैं और हमें उन पर नकेल कसनी चाहिए। मैंने कभी भी मुंबई में इस तरह का माहौल एवं मनोदशा नहीं देखी है। कारोबारियों ने उम्मीद करना ही छोड़ दिया है।'
 
बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज भी ऐसी ही चिंताएं जता चुके हैं। बजाज के शब्दों में, 'न तो मांग है और न ही निजी निवेश हो रहा है। ऐसे में वृद्धि कहां से होगी? आसमान से तो टपकेगी नहीं।' लार्सन ऐंड टुब्रो के प्रमुख ए एम नायक ने भी कहा है कि अगर भारतीय अर्थव्यवस्था इस साल 6.5 फीसदी की दर से भी बढ़ती है तो हमें खुशकिस्मत समझना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों पर यकीन न रह जाने ('आंकड़ों की विश्वसनीयता पर चुनौतीपूर्ण स्थिति') की बात करते हुए कहा है कि वास्तविक वृद्धि का अंदाजा लगाने के लिए आपको अपने निजी निर्णय का इस्तेमाल करना होगा। जनवरी-मार्च तिमाही में आर्थिक वृद्धि घटकर पांच वर्षों के न्यूनतम स्तर 5.8 फीसदी पर दर्ज की गई।
 
महज कुछ महीने पहले पई उन 131 चार्टर्ड अकाउंटेंट में शामिल थे जिन्होंने भारत के आर्थिक आंकड़ों पर सवाल उठाने वाले और शीर्ष सांख्यिकी निकाय में राजनीतिक दखल का आरोप लगाने वाले 100 विद्वानों की चिंताओं को नकारा था। निराशा के स्वर इतने तेज होते जा रहे हैं कि कुछ अंग्रेजी चैनलों ने अचानक ही पलटी खा ली है। इस सरकार के एजेंडा का खुलकर प्रचार में लगे रहने वाले समाचार चैनल आम तौर पर लुप्तप्राय विपक्ष को ही लताडऩे में लगे रहते हैं लेकिन अब वे प्रभावित कारोबारियों को भी जगह देने लगे हैं।
 
कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार के 10 वर्षों के शासनकाल में दो बातों- नीतिगत पंगुता और दोस्ताना पूंजीवाद का काफी शोर था। लेकिन आज कोई भी इनका जिक्र नहीं करता है। आप इस सरकार की कई बातों के लिए आलोचना कर सकते हैं लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को दशकों से आक्रांत कर रखी इन बुराइयों की इस सरकार में कोई जगह नहीं है। किसी तरह की नीतिगत पंगुता से दूर यह सरकार काफी अधिक सक्रिय है और सैकड़ों कानूनों में बदलाव एवं नई योजनाएं लेकर आई है। फिर भला हमें इतने खराब नतीजे क्यों देखने को मिल रहे हैं?
 
इसका जवाब बड़ा सरल है। दरअसल इस सरकार की नीतियां एवं क्रियाकलाप बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित नहीं हैं। वृद्धि एवं न्याय का पहला सिद्धांत राज्य का हस्तक्षेप एवं प्रभुत्व को कम करना है। सरकार से कारोबारियों एवं नागरिकों के लिए समानुभूति रखने की उम्मीद करना काफी अधिक है, भले ही नौकरियों एवं करों में होने वाली सारी वृद्धि इन्हीं लोगों से आती है। यह सरकार कम-से-कम इतना तो कर ही सकती है कि वह हरेक कारोबारी को धूर्त बताकर एवं बेवकूफी भरे बाध्यकारी कदमों से मायूसी एवं गुस्सा बढ़ाने का काम न करे। आखिरकार हम सबको पता है कि नेताओं, बाबुओं एवं आम आदमी में से असली चालबाज कौन है? इस पहले सिद्धांत को अमल में लाए बगैर हमें चक्रीय रूप से उतार-चढ़ाव का सामना करना होगा लेकिन कोई मूलभूत एवं त्वरित बदलाव नहीं होगा। इसके लिए पूंजी एवं श्रम की उच्च उत्पादकता की जरूरत होती है।
 
मुझे इस बात पर काफी चर्चा देखने को मिलती है कि सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए? सात अंधों की कहानी की तरह हरेक विशेषज्ञ समस्या के अलग-अलग हिस्सों को देखता है और फिर यह सोचकर समाधान भी सुझाता है कि वह पूरी समस्या दूर कर देगा। किसी को लगता है कि ब्याज दरों में अधिक कटौती करने से सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी जबकि दूसरा विशेषज्ञ व्यक्तिगत आयकर को खत्म करने का सुझाव देता है। नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) अमिताभ कांत ने मौजूदा सुस्ती के लिए आर्थिक सुधारों को जिम्मेदार बताया है। लेकिन समस्या इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को प्रधान सेवक कहते हों लेकिन अमूमन सारे नेता पिछली सरकार के नेताओं की ही तरह दंभी एवं जिद्दी नजर आते हैं। हाल ही में एक मंत्री से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे एक कारोबारी ने उस मंत्री को 'लड़ाई पर उतारू, सुस्ती को लेकर असंवेदनशील और सुनने के लिए तैयार नहीं' करार दिया।
 
इसकी उम्मीद कम ही है कि जनता को प्रभावित करने वाले मुद्दों की गूंज शासकों के कानों तक पहुंच पाएगी। साफ तौर पर व्यावहारिक लोगों को सरकार से थोड़ी-बहुत मरम्मत से अधिक की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। यह चर्चा ही निरर्थक है कि सरकार क्या कुछ कर सकती है? रोडमैप का पता नहीं है, वृद्धि का पहला सिद्धांत नदारद है और नीति-निर्माताओं के आंख-कान बंद पड़े हैं। अर्थव्यवस्था की गिरावट का मौजूदा दौर अगले कुछ वर्षों में खुद ही खत्म हो जाएगा लेकिन संरचनात्मक मुद्दे फिर भी कायम रहेंगे। इन संरचनात्मक मुद्दों ने ही पिरामिड के निचले हिस्से में मौजूद लोगों के जीवन की गुणवत्ता में जल्द सुधार और तीव्र आर्थिक वृद्धि को रोका हुआ है। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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