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भारतीय सिनेमा में पाइरेसी पर रोक की बड़ी मुहिम

टी ई नरसिम्हन और गिरीश बाबू /  August 11, 2019

जब दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकांत की ब्लॉकबस्टर फिल्म रोबोट का सीक्वल 2.0 नवंबर 2018 में सिनेमा के पर्दे पर छाया तो रिलीज के पहले ही दिन फिल्म की पाइरेटेड लिंक इंटरनेट पर उपलब्ध होने को लेकर निर्माताओं को काफी भय था। इसका सबसे बड़ा कारण फिल्म का बड़ा बजट भी था और निर्माताओं ने इसमें 543 करोड़ रुपये खर्च किए थे। फिल्म निर्माताओं ने मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और न्यायालय ने फिल्म की पाइरेटेड लिंक साझा करने की संभावनाओं के लिए 37 इंटरनेट सेवा प्रदाताओं से जुड़ी कुल 12,500 वेबसाइट को ब्लॉक करने का आदेश दे दिया। हालांकि इन सभी कदम के बाद भी फिल्म के रिलीज होते ही 'तमिल रॉकर्स' के नाम से चलने वाली एक वेबसाइट पर यह फिल्म लीक हो गई। वेबसाइट का कहना था कि उसके पास विश्व में पाइरेसी वाली अनेक जगहों पर उपलब्ध फिल्म की लिंक हैं। 

 
2.0 शायद ही कोई अपवाद थी। सिनेमा में रिलीज होने के पहले ही दिन नई फिल्मों की पाइरेटेड कॉपी ऑनलाइन उपलब्ध हो जाती हैं। डिजिटल डाउनलोड और किराये पर सस्ती डीवीडी उपलब्ध होने से वर्तमान में फिल्म थियेटर कारोबारी मॉडल को काफी नुकसान हो रहा है।  फिक्की-ईवाई की मार्च 2018 में आई रिपोर्ट के अनुसार पाइरेसी के चलते भारतीय फिल्म उद्योग को सालाना 2.8 अरब डॉलर का नुकसान होता है। साल 2018 में फिल्म उद्योग का आकार लगभग 16,600 करोड़ रुपये था। पहले जब सेल्युलाइड फिल्में प्रचलित थीं, फिल्म चोरी करने वाले 2 तरीकों का इस्तेमाल करते थे। पहला, जब फिल्म की टेप तैयार की जा रही होती थी तो उसकी दूसरी प्रति बना ली जाती थी। दूसरा, फिल्म में साथ काम कर रहे कुछ लोग निर्माताओं को जानकारी दिए बिना फिल्म के अतिरिक्त शो आयोजित कराते थे, जिससे निर्माताओं के राजस्व में कमी आती थी। 
 
पाइरेसी रोधी उपाय उपलब्ध कराने वाली यूएफओ मूवीज और क्यूब सिनेमा आदि ने इन चुनौतियों से निपटने पर काम किया। इन्होंने फिल्म की वास्तविक प्रति के वितरण को रोकने के लिए फिल्म का डिजिटलीकरण कर दिया और इसकी मास्टर कॉपी को सुरक्षा के लिहाज से एनक्रिप्ट कर दिया। इस एनक्रिप्टेड प्रति को उपग्रहों के माध्यम से सिनेमाघरों को उपलब्ध कराई गईं।  यूएफओ मूवीज की वितरण तकनीक के कारण फिल्म दिखाने वाले इसे अपने सर्वर पर सहेज लेते हैं। इस फिल्म को 256 बिट एनक्रिप्टेड-की की मदद से ही चलाया जा सकता है। इसमें लाइसेंस समझौते के आधार पर दिनों की संख्या और एक दिन में शो को  भी निर्धारित कर दिया जाता है। '256-बिट की' एनक्रिप्शन का आधुनिक तकनीक है और अदिक संख्या वाला कोड इसे अधिक जटिल बना देता है। 
 
विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल डिजिटलीकरण से ही फिल्मों को लाभ होने लगा था। यूएफओ मूवीज भारतीय परिचालन के मुख्य कार्याधिकारी राजेश मिश्रा कहते हैं, 'डिजिटलीकरण का तत्काल प्रभाव यह था कि जिस प्रिंट को बनाने में करीब 60,000 रुपये का खर्च आता था, वह घटकर 6-7 हजार रुपये प्रति कॉपी हो गया। इससे पाइरेसी रोकने में भी बड़े स्तर पर कामयाबी हाथ लगी।' ये कंपनियां वाटरमार्क तकनीक का भी उपयोग करती हैं जिसके तहत सिनेमाघर में लगा सर्वर एक नंबर जनरेट करके उसे फिल्म की स्क्रीन पर दिखाता है। वैसे तो सामान्य आंखों से इस वाटरमार्क को नहीं देखा जा सकता लेकिन किसी कैमरा रिकॉर्डर या दूसरी डिवाइस से फिल्म को रिकॉर्ड किए जाने पर यह वाटरमार्क दिखाई देता है। यूएफओ मूवीज या क्यूब सिनेमा द्वारा एनक्रिप्ट की गई फिल्म की पाइरेटेड प्रति से कंपनियां संबंधित सर्वर के साथ साथ शो के समय तक की जानकारी जुटा लेती हैं। 
 
डिज्नी, पैरामाउंट ऐंड सोनी एंटरटेनमेंट और दूसरी कंपनियों के संयुक्त उपक्रम 'डिजिटल सिनेमा इनिशिएटिव्स' (डीसीआई) ने भी यूएफओ मूवीज और क्यूब जैसी तकनीक विकसित की है जिसमें अपने स्तर पर ही एनक्रिप्शन तकनीक का उपयोग होता है। वर्तमान में देश में मौजूद 9,500 में से लगभग 9,000 सिनेमाघर एनक्रिप्शन तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। मिश्रा बताते हैं कि हाल के वर्ष में पाइरेसी की जांच के लिए उनके पास आने वाली डीवीडी की संख्या घर रही है। वह कहते हैं, 'तकनीक ने पाइरेसी को रोकने में काफी मदद की। इससे फिल्मों के राजस्व में भी बढ़ोतरी हुई। हमें ध्यान देना चाहिए कि वर्ष 2005 से पहले हिंदी सिनेमा में 100 करोड़ रुपये की कमाई वाली एक भी फिल्म नहीं थी। हालांकि आज बॉलीवुड 300-400 करोड़ रुपये कमाई वाली फिल्में बना रहा है और निर्माता फिल्म रिलीज होने के 3 दिन के भीतर 100 करोड़ रुपये के राजस्व के लक्ष्य को छू रहे हैं।'
 
फिल्म और इंटरनेट पर दूसरी सामग्री के लिए सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने वाली कंपनी मार्कस्कैन के मुताबिक तकनीक की मदद से पाइरेसी की पहचान करना बहुत आसान हो गया है। इससे सत्यापन की सटीकता और ब्लैकलिस्ट डेटा संग्रह दर लगभग 100 प्रतिशत बढ़ गई है। नोएडा स्थित कंपनी मार्कस्कैन मीडिया स्कैन नाम से एक सॉफ्टवेयर ेउपलब्ध कराती है जिससे किसी भी सामग्री को एंड-2-एंड एनक्रिप्शन उपाय उपलब्ध कराए जा सकें। इसके तहत विभिन्न मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया और यूट्यूब आदि विभिन्न प्लेटफॉर्म पर ये सुविधाएं दी जा रही हैं।
 
मार्कस्कैन का सॉफ्टवेयर किसी संबंधित शब्द के लिए गूगल के पहले 100 पेज से जरूरी खोज रिजल्ट जुटाने, नियमों का उल्लंघन कर रही 10,000 से अधिक लिंक का सत्यापन करने और इनसे सोर्स लिंक का पता लगाने के लिए 'क्रॉलिंग' तकनीक का उपयोग करता है। कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी अभिषेक धोरेलिया कहते हैं, 'किसी सामग्री के लिए हमारे सुरक्षा उपाय विभिन्न प्लेटफॉर्म पर पाइरेटेड सामग्री को 90 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। साथ ही, हम सर्च इंजनों से 99 प्रतिशत पाइरेटेड सामग्री को हटा देते हैं।'
 
मार्क स्कैन गूगल की टीसीआरपी, यूट्यूब की सीएमएस और फेसबुक की राइट्स मैनेजर तकनीकों का भी उपयोग करती है। इनके अतिरिक्त इमेज मैचिंग, मेटाडेटा सर्च जैसी दूसरी तकनीकें भी मौजूद हैं। मार्क स्कैन का अनुमान है कि ओटीटी प्लैटफॉर्म पर सबस्क्रिप्शन आधारित सामग्री के लिए कुछ लाख रुपये खर्च करने पर निर्माताओं को 5 महीनों में प्रत्येक फिल्म पर 15.03 करोड़ रुपये से लेकर 30.06 करोड़ रुपये तक का आतिरिक्त राजस्व मिलता है।  किसी फिल्म को बनाने पर औसतन 100 करोड़ रुपये का खर्च आता है। वहीं, पाइरेसी रोकने के उपायों का खर्च 1-3 लाख रुपये के बीच होता है, जो फिल्म के लिहाज से बहुत मामूली है। 
Keyword: film, movie, piracy,,
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