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जम्मू कश्मीर में निवेशक सम्मेलन कहीं जल्दबाजी में उत्साह तो नहीं!

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  August 11, 2019

भारतीय कंपनी जगत जम्मू कश्मीर से संबंधित मामले में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जबरदस्त तत्परता से तालमेल बिठाने की कोशिश में लगा हुआ है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) इस साल अक्टूबर में जम्मू कश्मीर के लिए केंद्रित पहला निवेशक सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है। क्या यह असंगत उत्साह है या गलत आशावाद है? शायद अपरिपक्व उत्साह इस सम्मेलन को कहीं बेहतर तरीके से व्याख्यायित कर सकता है। जम्मू कश्मीर में कारोबारी संभावनाओं को लेकर सीआईआई ने एक बड़ी तस्वीर पेश की है। यह देखने में काफी मोहक लग रहा है। अनुच्छेद 370 लागू रहने के दौरान राज्य में जमीन एवं कामगारों की उपलब्धता जैसे मुद्दे कारोबारी गतिविधियों के बड़े अवरोधक थे। लेकिन बदले हुए हालात में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, छोटे एवं मझोले स्तर की विनिर्माण इकाइयां और पर्यटन को बढ़ावा मिलने से यहां बेरोजगारी की अधिकता एवं निम्न विकास से मुकाबला करने में मदद मिलेगी। एक राज्य के तौर पर जम्मू कश्मीर में कारोबारी सुगमता की अंदरूनी स्थिति तमाम वजहों से ठीक नहीं है। लेकिन इसने आश्चर्यजनक तौर पर मानव विकास सूचकांक में पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे नौ अन्य राज्यों को पीछे छोड़ा था। इससे पता चलता है कि यहां पर एक हद तक शिक्षित एवं स्वस्थ लोग मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है। 

 
फिर भी उद्योग जगत के लिए 'देखने एवं इंतजार करने' की रणनीति पर चलने के कई बाध्यकारी कारक हैं। ऐसे में अचरज की बात नहीं है कि जम्मू कश्मीर में कारोबारी योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर अधिकतर उद्यमी इसी के पक्षधर नजर आए। जम्मू कश्मीर में निवेशक सम्मेलन का आयोजन राजनीतिक नजरिये से एक बेहतर तस्वीर पेश करने का माध्यम बन सकता है लेकिन इस तरह के सम्मेलनों की अहमियत व्यावहारिक स्तर पर संदिग्ध ही रही है। एक दशक से अधिक समय से ऐसे सम्मेलन शोहरत दिलाने का जरिया साबित होते रहे हैं। मोदी ने ही गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय यह सिलसिला शुरू किया था। यह अलग बात है कि कोई भी राज्य उन निवेशक सम्मेलन में होने वाले तमाशे की बराबरी नहीं कर पाया है।
 
गुजरात सरकार के निवेशक सम्मेलनों ने एक परिपाटी तय कर दी। बड़े पैमाने पर निवेश की मंशा रखने वाले संभावित निवेशकों को इस सम्मेलन में बुलाया जाता है और पूरे तामझाम से होने वाले सम्मेलन में आए मेहमानों को उस राज्य के मुख्यमंत्री एवं आला अफसर वहां निवेश से जुड़े लाभों (अक्सर आभासी) के बारे में बताते हैं। इसमें निवेश पर मिलने वाले कर अवकाश और जमीन अधिग्रहण एवं श्रम संबंधी मसलों के त्वरित समाधान जैसे आश्वासन शामिल होते हैं। भारत में ये समस्याएं अमूमन हरेक राज्य में विनिर्माण को बाधित करती हैं। 
 
उसके बाद कुछ दिग्गज उद्योगपति उस राज्य से जुड़ी खासियत (यह भी अक्सर आभासी ही होती हैं) के बारे में भाषण देने आते हैं। गुजरात और पश्चिम बंगाल के निवेशक सम्मेलनों में मुकेश अंबानी भी जाते हैं। इस दौरान कारोबारी जमात एवं नौकरशाही के बीच अनौपचारिक बातचीत भी होती है। अंत में, उस राज्य का जनसंपर्क विभाग हरकत में आता है और निवेश की प्रतिबद्धता से जुड़े वादों  ( कथित तौर पर सहमति पत्र) का आंकड़ा जारी कर देता है जो अक्सर हजारों करोड़ रुपये का होता है। लेकिन उनमें से बहुत कम वादे ही जमीन पर साकार रूप ले पाते हैं।
 
मुमकिव है कि जम्मू कश्मीर निवेशक सम्मेलनों से जुड़ी इस प्रवृत्ति को बदल दे और वहां पर निवेश की योजना को लेकर वाकई गंभीर कारोबारियों की लंबी कतार लग जाए। अगर वे अपनी घोषणाओं के साथ जम्मू कश्मीर में पैसा लगाने को भी तैयार हो जाते हैं तो देश के इस सबसे नए केंद्रशासित प्रदेश को विकास का स्वर्ग बनाया जा सकता है। अगर वाकई में ऐसा होता है तो कश्मीर घाटी में फिलहाल कफ्र्यू जैसे हालात में रहने के लिए मजबूर लोगों समेत हरेक भारतीय इस पर खुश होगा। समस्या यह है कि एक संवैधानिक प्रावधान को हटाकर हो सकता है कि एक ऐतिहासिक भूल सुधार ली गई हो, लेकिन इससे जमीनी स्तर पर भी हालात में बदलाव आना दूसरी बात है। जम्मू कश्मीर का विकास के मामले में पीछे रह जाने का वहां पर भूमि स्वामित्व एवं रोजगार जैसी बंदिशों से खास लेना-देना नहीं है। इसका अधिक संबंध इस बात से है कि केंद्र एवं राज्य के नेतृत्व ने पाकिस्तान के साथ रिश्तों को इतने खराब ढंग से संभाला कि जम्मू कश्मीर स्थायी अशांति की स्थिति में रहने के लिए अभिशप्त हो गया। निकट भविष्य में तो इन बाह्य कारकों में किसी भी तरह के बदलाव की संभावना कम ही है।
 
निवेश के लिए राजनीतिक एवं सामाजिक स्थायित्व जरूरी होने से केंद्र को जम्मू कश्मीर में निवेश करने जा रहे लोगों को सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी से इतर चीजों का भी ऐलान करना होगा। कारोबारी सुगमता के लिए भारी पुलिसबल इकलौती गारंटी नहीं होता है। लगातार घेराबंदी की स्थिति में रहते हुए भी आर्थिक चमत्कार करने में सफल इजरायल को अक्सर एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन भारत अगर अपने अल्पसंख्यकों का भी एकीकरण करने को लेकर गंभीर है तो वह इजरायल मॉडल को शायद ही अपनाना चाहेगा। पाकिस्तान एवं चीन की क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सामना करने के लिए एक तरह की सुविचारित योजना भी इस कवायद का एक अहम हिस्सा है। अभी यह नजर नहीं आ रही है। 
 
इस बात की संभावना कम ही है कि अक्टूबर के खुशनुमा वक्त में होने वाले इस निवेशक सम्मेलन में शिरकत करने जा रहे उद्योगपतियों को इस बाधा के बारे में पता ही नहीं होगा। कोई बात नहीं, कम-से-कम दो दिनों के लिए तो कश्मीर घाटी में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। 
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