बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी की यॉर्कर से विचलित पाकिस्तान
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मोदी की यॉर्कर से विचलित पाकिस्तान

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  August 11, 2019

मुझ पर यह आरोप लग सकता है कि मैं दूसरों के कष्ट में सुख ले रहा हूं लेकिन फिर भी मैं इस बात पर खुश होना चाहता हूं कि पाकिस्तानी नैशनल असेंबली ने गत सप्ताह भारतीय संविधान पर चर्चा करने में अच्छा खासा समय खर्च किया और इसे बखूबी तवज्जो दी। भारत द्वारा अनुच्छेद 370 और 35 ए को लेकर जो निर्णय लिए गए वे कई वजहों से पाकिस्तान में हलचल की वजह बने। एकतरफा रोमांच इसका कारण नहीं है। सबसे बड़ी वजह तो यही है कि एक ऐसा देश, जिसके शासक अपने संविधान को खारिज करने के लिए जाने जाते रहे हैं, वह भारत के संविधान के लिए इस कदर चिंतित है।

 
मेरे लिए अहम बात थी इमरान खान का भारत पर शिमला समझौते का उल्लंघन करने का इल्जाम लगाना। मैं पाकिस्तान की राजनीति पर इस कदर नजर रखता हूं मानो वह भारत का आंतरिक मामला हो। मुझे वहां का कोई ऐसा शासक याद नहीं आता जिसने उस दस्तावेज के प्रति निष्ठा जताते हुए शपथ ली जो जिसे वे अक्सर कागज का पुराना और अप्रासंगिक टुकड़ा करार देते हैं। अपने जमाने के सबसे काबिल तेज गेंदबाजों में शामिल रहे इमरान खान ने कुछ ही रोज पहले व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से कहा था कि भारत और पाकिस्तान 70 वर्ष तक कश्मीर मसले को द्विपक्षीय तरीके से हल करने में नाकाम रहे और अब दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति होने के नाते उन्हें मध्यस्थता करनी चाहिए। 
 
बीते 31 वर्षों में दोनों देशों के बीच तीन द्विपक्षीय समझौते हुए। सन 1972 में शिमला समझौता, सन 1999 में लाहौर समझौता और 2004 में इस्लामाबाद समझौता। ये सारे महज खानापूरी बनकर रह गए। तमाम अन्य बातों के अलावा तीनों समझौतों की एक केंद्रीय बात है, कश्मीर समेत सभी मुद्दों को द्विपक्षीय तरीके से हल करना। अन्य पाकिस्तानी नेताओं ने भी इस प्रतिबद्धता को आराम से तोड़ा। परंतु जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा शिमला समझौते पर हस्ताक्षर के बाद पाकिस्तान में जो भी शासनाध्यक्ष हुए, वे चाहे चुनाव जीते हों, दोबारा चुने गए हों या सेना की मदद से गद्दीनशीं हुए हों, किसी ने भी खुलकर समझौते को खारिज नहीं किया। इसे मानने का ढोंग जारी रखा गया।
 
लाहौर और इस्लामाबाद घोषणापत्र शिमला समझौते की प्रतिबद्धता दोहराते हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से कश्मीर मसले पर मध्यस्थता का आग्रह कर इमरान खान पहले ऐसे पाकिस्तानी नेता बन गए हैं जिसने पहले के तीनों समझौतों को औपचारिक रूप से नकार दिया है। अब वह भारत पर इसके उल्लंघन का इल्जाम लगा रहे हैं। यह नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली का सटीक उदाहरण है। यहां अहम बात यह है कि कश्मीर को लेकर मूलभूत सामरिक और राजनीतिक समीकरण उलट चुके हैं। सन 1947 से अब तक पाकिस्तान पहल करता था। सन 1947 में लूट और बलात्कार करने वाले कबाइली लुटेरों को भेजने से लेकर ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत फौजियों को मुफ्ती बनाकर भेजने और अगस्त-सितंबर 1965 में ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम में कश्मीर में टैंक भेजने तक वह ऐसा करता रहा। सन 1972 में शिमला समझौता होने तक कश्मीर में पहला कदम पाकिस्तान उठाता रहा। 
 
इसके बाद 17 वर्ष शांति रही लेकिन पाकिस्तान आगे की तैयारी में लगा रहा। वह परमाणु प्रतिरोध तैयार करता रहा, उसने अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन की तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई में सहायता की। सन 1989 तक उसने परमाणु हथियार तैयार कर लिए। पश्चिम में एक जिहाद जीता गया और पाकिस्तान ने पूर्व में दूसरे की तैयारी शुरू कर दी। उसके बाद करगिल, आईसी-814 के अपहरण, भारतीय संसद पर हमला, मुंबई पर हमला, पठानकोट, पुलवामा जैसी घटनाएं हुईं। पाकिस्तान ने हर बार पहला वार किया और भारत प्रतिक्रिया तलाशता रह गया। भारत के हालिया कदम को लेकर हम एक अलग पहलू पर चर्चा करेंगे। परंतु हमें यह भी मानना होगा कि 70 वर्ष तक भारत ने यथास्थिति कायम रखी जबकि ताकत और आकार में वह काफी बड़ा है। जबकि पाकिस्तान लगातार इसे बदलने में लगा रहा। पिछले दिनों भारत ने इसे बदल दिया। अब पाकिस्तान प्रतिक्रिया के लिए छटपटा रहा है क्योंकि उसके रणनीतिकार ऐसी प्रतिक्रिया के लिए तैयार ही नहीं किए गए। इमरान खान द्वारा वॉशिंगटन में शिमला, लाहौर और इस्लामाबाद समझौतों को नकारने के एक सप्ताह बाद नरेंद्र मोदी ने इसका विरोध न कर एक नई इबारत लिखी। उन्होंने नाटकीय रूप से इससे सहमति जता दी। अगर उन समझौतों से पाकिस्तान तथा विश्व बिरादरी को लग रहा था कि कश्मीर की अंतिम स्थिति पर अभी बहस और मोलतोल संभव है तो वह भ्रम अब समाप्त हो चुका है। इमरान सही थे, वे समझौते भी अब समाप्त हैं। अब पाकिस्तान को उकसाने, इनकार करने, मदद की पेशकश, बातचीत, आदि के अपने मानक व्यवहार से अलग तरीका तलाशना होगा। अतीत में भारत बड़ी शक्तियों से आग्रह करता था कि वे पाकिस्तान पर दबाव बनाएं। अब वह काम पाकिस्तान कर रहा है। 
 
अब उसे अपनी सीमा और घटते कद का अहसास हो चुका है और वह 6 अरब डॉलर की राशि के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समक्ष गिड़गिड़ा रहा है। इसे ऐसे समझें कि इससे अधिक राशि तो आर्सेलरमित्तल दिवालिया एस्सार स्टील को खरीदने के लिए चुका रही है। पाकिस्तान की राजनीति, संस्थान और समाज सभी भंगुर अवस्था में हैं। यह बलूचिस्तान को संभाल सकता है लेकिन पख्तूनों का शांतिपूर्ण आंदोलन जोर पकड़ चुका है। उसके पास एक लाभ है, वह अफगानिस्तान का स्थानीय संरक्षक बनकर ट्रंप की वहां बने रहने का दिखावा करते हुए वहां से निकलने मे मदद कर सकता है। परंतु इसकी उसे बड़ी कीमत चुकानी होगी। अगर पाकिस्तान को कश्मीर में अच्छा प्रदर्शन करना है तो वह कश्मीर में नहीं उलझ सकता। अभी तो कतई नहीं क्योंकि आतंक के खिलाफ उसकी प्रतिबद्धता को लेकर वित्तीय कार्यबल की तय मियाद कुछ सप्ताह में समाप्त हो रही है। इमरान खान मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं थे, यह उनकी क्षमता से भी परे था। हमें यह भी मानना होगा कि सारे फैसले वह नहीं लेते, इसमें सैन्य मुख्यालय  की भूमिका रहती है। वे दोनों मोर्चों पर पहल चाहते हैं। 
 
पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक हुसैन हक्कानी ने द प्रिंट के लिए लिखे एक आलेख में एक पंक्ति लिखी थी जिसे मैं भी लिखना चाहता। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान की नीति हमेशा कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की रही जबकि भारत उसे द्विपक्षीय रखना चाहता था। मोदी सरकार ने अब कश्मीर को भारत और पाकिस्तान का आंतरिक मसला बना दिया।भारत में इस विषय को लेकर मोदी समर्थकों और राजनीतिक एवं बौद्धिक अल्पमत वालों के बीच बहस चल रही है जो इसे अलोकतांत्रिक मानते हैं। पाकिस्तान में चर्चा है कि ऐसा कैसे हो गया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को इसकी भनक कैसे नहीं लगी। कोई बिक तो नहीं गया? अब क्या किया जाए? नैशनल असेंबली में इमरान के गुस्से में यह बात नजर आई। उन्होंने वहां कहा कि उनसे क्या अपेक्षा की जा रही है? कि वह भारत पर हमला कर दें? मेरा यह तात्पर्य नहीं है कि भारत में सब ठीक है या कश्मीर में ताजा पहल एकदम सही है। बात यह है कि आज पाकिस्तान जहां है वहां यह प्रासंगिक नहीं है। वह अनुच्छेद 370 पर दुख जताने का जितना ढोंग कर रहा है, प्रमुख कश्मीरी नेताओं को जिन्हें वह दलाल कहता है, उनको बंदी बनाए जाने की जितनी तारीफ करे और भारतीय कश्मीर में नागरिक अधिकारों को लेकर वह चाहे जितना चीखे, वह उतना ही अधिक मूर्खतापूर्ण नजर आता है। 
 
वह अलगाववादियों को पकड़े जाने का विरोध करता है जबकि उसने दो प्रधानमंत्रियों नवाज शरीफ और शाहिद खकान अब्बासी और एक पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को जेल में डाला और एक अन्य परवेज मुशर्रफ को निर्वासित किया है। अब नवाज शरीफ की बेटी और विपक्षी नेता मरयम नवाज भी जेल में हैं। इसी तरह पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री राणा सनाउल्ला, नवाज की पार्टी के तीन सांसद, दो पख्तून सांसद आदि भी बंदी बनाए गए। नवाज को छोड़कर इनमें से किसी को सजा नहीं हुई है। इनमें से ज्यादातर बिना किसी जांच के महीनों से जेल में बंद हैं। यह पाकिस्तान के लिए ठीक नहीं है। यथास्थिति बदल चुकी है। या तो पाकिस्तान इसे स्वीकार करे या कुछ मनमानी करे। या वह प्रार्थना करे कि घाटी में हालात एक बार फिर बेकाबू हो जाएं और हालात इतने बिगड़ जाएं कि भारतीय फौज आपा खो दे। अब यही उसकी आखिरी उम्मीद है।
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