बिजनेस स्टैंडर्ड - मौद्रिक जोखिम से बचाव
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मौद्रिक जोखिम से बचाव

संपादकीय /  August 11, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशों में रुपये के बाजार के सवाल की जांच परख के लिए जो कार्य बल गठित किया था उसने अपनी रिपोर्ट दे दी है। रुपये के नॉन डिलिवरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाजार में भारी पैमाने पर हो रहा कारोबार रिपोर्ट की दृष्टि से उल्लेखनीय रहा। समिति के मुताबिक उस कारोबार का आकार देश में हो रहे कारोबार से भी कहीं अधिक है। आश्चर्य नहीं कि आरबीआई इस मुद्दे को लेकर ङ्क्षचतित है। भले ही वह रुपये के लिए कोई खास दायरा या लक्ष्य लेकर नहीं चल रहा हो लेकिन मुद्रा की स्थिरता को बरकरार रखना उसक दायित्वों में से एक है। अगर रुपये का मूल्य काफी हद तक विदेशों में परिचालित एनडीएफ से तय होता है और वह केंद्रीय बैंक के नियमन और उसकी निगरानी से परे है तो इसमें किसी बड़े बदलाव का अनुमान लगाना या प्रबंधन करना दोनों मुश्किल हो जाते हैं। फिलहाल मुद्रा को लेकर कोई बड़ा मसला नहीं है लेकिन वर्ष 2013 में अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा की गई टैपरिंग का उदाहरण बताता है कि कैसे आरबीआई के लिए मुद्रा बाजार की अस्थिरता का प्रबंधन कर पाना मुश्किल हो सकता है।

 
रिपोर्ट का यह कहना सही है कि एनडीएफ बाजारों को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करने का कोई तरीका नहीं है। सरकार और केंद्रीय बैंक केवल यह कर सकते हैं कि वे घरेलू नियमन में बदलाव लाएं। आरबीआई की पूर्व डिप्टी गवर्नर उषा थोराट की अध्यक्षता वाली समिति का यह कहना सही है कि ऐसा करते हुए यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कारोबारियों को एनडीएफ के बाहरी कारोबार के बजाय देश में कारोबार करने के लिए प्रोत्साहन मिले। समिति कहती है कि विदेशी बाजार के आकार और उसकी प्रमुखता तथा सीमापार लेनदेन तथा विदेशी विनिमय बाजार या प्रतिभागियों पर लगने वाले प्रतिबंधों की सीमा के बीच एक किस्म की दुविधा व्याप्त है। इसका सीधा अर्थ यह है कि फिलहाल लेनदेन और प्रतिभागियों पर नियामकीय बोझ बहुत अधिक है और यह अतार्किक तरीके से गठित है जिसे ठीक करने की आवश्यकता है। एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था जिसकी विश्व अर्थव्यवस्था के साथ संबद्धता बढ़ रही हो, उसे मौद्रिक जोखिम की हेजिंग के लिए आधुनिक उपायों की आवश्यकता है। यह समझने की आवश्यकता है कि ग्राहक को जानने और राउंड ट्रिपिंग (ऐसे लेनदेन जिनसे राजस्व बढ़ता दिखता है लेकिन हकीकत में आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता) को लेकर नैतिक सवाल उठाने के बजाय इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि वृहद आर्थिक स्थिरता के लिए देश में कारोबार को किस प्रकार बढ़ावा देने की आवश्यकता है। समिति का सुझाव है कि कम से कम विनिमय वाले एनडीएफ को अल्पावधि में इजाजत दी जाए, हालांकि ओवर द काउंटर अनुबंध फिर भी आदर्श होंगे। निश्चित रूप से हेजिंग का आकार और देश में कारोबार की सुगमता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि हेजिंग की वैध आवश्यकताओं को विदेशी बाजारों में ले जाया जा सके। 
 
रुपये का अधिक बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने को लेकर समिति की अनुशंसाएं बेहतर हैं लेकिन बुनियादी जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि वृहद आर्थिक माहौल अपने आप में इतना स्थिर हो कि इन चिंताओं को दूर किया जा सके। अक्सर देश के आंतरिक असंतुलन मसलन उच्च राजकोषीय घाटा और मुद्रास्फीति आदि बाह्य क्षेत्र की समस्या पैदा करते हैं। ऐसे में यह अहम है कि नीति निर्माता वृहद आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाने पर काम करें। मजबूत और स्थिर बुनियाद मुद्रा बाजार में सटोरिया गतिविधि पर रोक लगाएगी। इस संदर्भ में कम राजकोषीय घाटा और सार्वजनिक क्षेत्र की उधारी की आवश्यकता यह सुनिश्चित करेगी कि ऋण के स्थायित्व को लेकर कोई चिंता न हो। निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए वास्तविक सुधार अपनाने से उच्च राजकोषीय घाटे की समस्या हल करने में मदद मिलेगी।
Keyword: RBI, SBI, repo rate, loan, interest,,
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