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सुस्त मांग का असर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 09, 2019

अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ समय से मांग में आई अनदेखी सुस्ती के बीच कई विशेषज्ञ इसके कारण एवं समाधान बता रहे होंगे। इस चर्चा में यह भी छोटा सा योगदान है।  भारतीय उपभोक्ता कर्ज में आकंठ डूबे हुए हैं। कटौतियों के बाद हाथ में आने वाले वेतन का एक बड़ा हिस्सा कर्ज भुगतान की मासिक किस्त (ईएमआई) में चला जाता है क्योंकि उपभोग का एक बड़ा हिस्सा उधार की रकम से ही जोर पकड़ता है। इससे भी बुरी बात है कि कई लोग उन घरों या फ्लैटों के लिए उठाए कर्ज की भी किस्त भर रहे हैं जिनका निर्माण अभी तक पूरा नहीं हुआ  है।

 
दूसरा, निम्न मुद्रास्फीति के प्रभावों पर सोचें। वेतन वृद्धि कम होती जा रही है लिहाजा समय के साथ किस्त के बोझ में मिलने वाली राहत नदारद हो चुकी है। ब्याज दरों के भी नीचे आ जाने से लोग अपनी वृद्धावस्था के लिए अधिक बचत करने और फिलहाल कम खर्च करने को मजबूर हैं। तीसरा कारण नकारात्मक धन प्रभाव है। रियल एस्टेट की कीमतें 25 फीसदी से भी अधिक गिर चुकी हैं। शेयर बाजार सूचकांक भी एक साल पहले की तुलना में निचले स्तर पर हैं और कई म्युचुअल फंडों ने नकारात्मक नहीं तो खराब प्रतिफल दिया है। जब लोग खुद को गरीब महसूस करने लगते हैं तो वे कम खर्च करते हैं। 
 
चौथा, श्रमशक्ति में पहले से कम महिलाएं होने से रोजगार ढांचा भी बदला है। महिलाओं के अधिक समय तक पढऩे, कुलीनता का भाव आने, आते-जाते समय सुरक्षा की कमी और उपलब्ध कार्य न होने जैसे कारणों से एक औसत परिवार में कामकाजी वयस्कों की संख्या कम हो गई है। निश्चित रूप से इसका असर परिवार की आय पर होगा। पांचवां कारण लोगों के अधिक समय तक जीवित रहने से जुड़े प्रभाव हैं। साठ साल से अधिक उम्र वाली आबादी जनसंख्या की समग्र वृद्धि दर से करीब दोगुनी दर से बढ़ रही है। बुजुर्गों की देखभाल करने से परिवारों पर स्वास्थ्य संबंधी खर्चों का बोझ बढ़ता है। आवास, वाहन, टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों एवं शिक्षा को छोड़कर अन्य कारणों से लिए जाने वाले घरेलू कर्ज में तीव्र वृद्धि हुई है। इनमें से कुछ हिस्सा निश्चित रूप से इलाज पर हुए खर्चों की भरपाई के लिए होगा। 
 
छठे कारण का उल्लेख रथिन रॉय अपने लेख में कर चुके हैं। उत्पादों एवं सेवाओं की मांग का बड़ा हिस्सा एक पतली ऊपरी परत से ढका हुआ है। हालांकि यह आवरण उतना पतला भी नहीं है क्योंकि कुल आबादी का 30-35 हिस्सा उपभोग करने वाले दस्ते में शामिल है। मसलन, 2011 की जनगणना बताती है कि 24.6 करोड़ में से 21 फीसदी परिवारों के पास दोपहिया वाहन थे। आज के समय में यह अनुपात अधिक ही होगा क्योंकि करीब छह फीसदी परिवार हर साल दोपहिया वाहन खरीद रहे हैं। फिर भी रॉय इस मामले में सही हैं कि खर्च करने वाला तबका उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा है। एक कारण यह होगा कि श्रम-आधिक्य वाले विनिर्माण की वृद्धि निम्न-मध्य वर्ग के स्तर पर बड़ी व्यय श्रेणी बनाने में सफल नहीं हो पाई है। निम्न उत्पादकता और उसकी वजह से आय भी कम होने से 'गिग इकॉनमी' भी विकल्प नहीं रह गई है।
 
आखिर में, कृषि क्षेत्र में बदलाव का दौर है। किसान अब घरेलू बाजार की खपत से अधिक पैदावार करते हैं। लेकिन अधिक उपज का निर्यात नहीं हो पाने से घरेलू मांग एवं आपूर्ति के बदलते संतुलन ने कीमत संबंधी दबाव पैदा किए हैं जो कृषि आय को सीमित कर देता है। अगर श्रम अधिकता वाली विनिर्माण गतिविधियां सफल हुई रहतीं और लोग खेतों से निकलकर कारखानों में पहुंचे रहते तो खेती में लगे कम लोगों का ही पेट भरना पड़ता। मजदूरी की सघनता वाले विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए श्रम सुधार, प्रतिस्पद्र्धी कीमत वाले रुपये, सक्षम ढांचागत आधार और आपूर्ति शृंखला विकास जैसे बदलावों की जरूरत है। कुछ मुद्दे सरकार के एजेंडे में हैं लेकिन कई श्रम कानूनों को मिलाकर चार श्रम संहिता बनाना ही काफी नहीं है। केवल कानूनों की संख्या घटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के दबाव में आकर सरकार तात्कालिक समाधानों का रुख कर सकती है। इसे  समझा जा सकता है लेकिन किसी को भी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। संरचनात्मक बदलावों के बगैर टिकाऊ आर्थिक वृद्धि का रुझान नीचे की तरफ ही बना रहेगा।
Keyword: india, economy, GDP, agriculture,,
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