बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रधानमंत्री मोदी को भी करनी होगी महालनोबिस की तलाश
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, August 24, 2019 11:35 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

प्रधानमंत्री मोदी को भी करनी होगी महालनोबिस की तलाश

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  August 08, 2019

कुछ दिनों पहले आर्थिक पत्रकार पूजा मेहरा ने सवाल उठाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आर्थिक मोर्चे पर मदद करने वाला अफसरशाह कौन होगा? पुराने प्रधानमंत्रियों के समय ए एन वर्मा, मोंटेक सिंह आहलूवालिया, विमल जालान, वाई वी रेड्डी और विजय केलकर जैसे अफसरशाह आर्थिक मुद्दों पर मददगार भूमिका निभाते रहे हैं। मोदी की ही तरह बुद्धिजीवियों से असहज महसूस करने वालीं इंदिरा गांधी ने भी पी एन हक्सर की सेवाएं ली थीं जिन्होंने उनकी राजनीतिक जरूरतों को आर्थिक कलेवर देने का काम किया था।

 
पूजा के सवाल का मतलब यह जानना था कि मोदी को आर्थिक सलाह कौन देता है? पिछले पांच साल से भारतीय अर्थव्यवस्था के तमाम प्रेक्षकों को यह सवाल परेशान किया हुआ है लेकिन अभी तक इसका संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। लेकिन यह सवाल जरूरी होते हुए भी पर्याप्त नहीं है। मेरी नजर में अधिक मौजूं सवाल यह होता कि मोदी का महालनोबिस कौन बनेगा? पी सी महालनोबिस एक अर्थशास्त्री एवं सांख्यिकीविद थे जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू की आर्थिक सोच को जमीनी रूप देने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने दूसरी पंचवर्षीय योजना का आर्थिक मॉडल विकसित किया था जो आर्थिक वृद्धि के लिहाज से काफी सफल रहा था। 
 
इससे जुड़ी एक कहानी है। यह वाकया भारत की मौजूदा आर्थिक संताप से काफी मेल खाता है। पहले आम चुनाव में नेहरू की जीत के बाद के चार वर्षों में आर्थिक प्रगति की दिशा में बहुत कुछ नहीं हो पाया था। पर्याप्त रोजगार नहीं पैदा हो पा रहे थे और मुद्रास्फीति भी बढ़ रही थी। विदेशी मुद्रा का भंडार कम हो रहा था। बचत दर महज पांच फीसदी रह गई थी। राजस्व के स्थिर होने के कारण बजट में भी खास गुंजाइश नहीं रह गई थी। निजी क्षेत्र ने यह कहते हुए अपने हाथ खड़े कर दिए थे कि निवेश के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। बैंक भी छिटपुट लोगों को छोड़कर कर्ज देने से मना कर रहे थे। राजनीतिक तौर पर वह समय नेहरू के लिए निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित होने का था। लेकिन बदले हुए हालात में पार्टी नेता दबे जुबान में शिकायत करने लगे। काफी कुछ मोदी की ही तरह नेहरू के समय भी हर कोई अपना सब्र खो रहा था। ऐसी स्थिति में ही कांग्रेस ने 1955 में हुए अवाडी अधिवेशन में एक बेहद अहम प्रस्ताव पारित किया। उस प्रस्ताव में सरकार से अर्थव्यवस्था की राह प्रशस्त करने को कहा गया था।
 
लेकिन उसके बाद यह समस्या खड़ी थी कि आगे क्या किया जाए और जो भी किया जाना है उसके लिए पैसे कहां से आएंगे? ऐसी स्थिति में नेहरू ने पहले सवाल का जवाब पाने के लिए महालनोबिस से संपर्क साधा और दूसरे जवाब के तौर पर उद्योगपति टी टी कृष्णमचारी को अपना वित्त मंत्री बनाया। जहां महालनोबिस ने आर्थिक वृद्धि का खाका तैयार किया वहीं कृष्णमचारी ने उसके लिए जरूरी पैसे जुटाए। इस तरह दूसरी पंचवर्षीय योजना अस्तित्व में आई और उसने देश को अच्छी वृद्धि दी। सवाल खड़ा होता है कि प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई वाली राजग-2 सरकार के लिए यह काम कौन करेगा? कृष्णमचारी की तरह राजस्व जुटाने के काम के लिए जहां निर्मला सीतारमण एकदम माकूल हैं, वहीं आप उनसे महालनोबिस का दायित्व निभाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। वह पूरी तरह ईमानदार हैं और अपने दायित्व के निर्वहन में समर्पित रहती हैं। वह असरदार होने के साथ अलोकप्रिय भी होंगी लेकिन एक बढिय़ा वित्त मंत्री से इसी की अपेक्षा भी होती है।
 
लेकिन निवेश जुटा पाने में नाकाम रहने पर सीतारमण या किसी भी वित्त मंत्री को दोषी ठहराना मूर्खतापूर्ण होगा क्योंकि निवेश कई ऐसे पहलुओं पर निर्भर होता है जो अकेले वित्त मंत्री नहीं संभालता है। वास्तव में, यह काम मूल रूप से प्रधानमंत्री पर निर्भर करता है। निवेश का माहौल बनाने के लिए हमेशा ही एक नए आर्थिक नजरिये और एक पूरी तरह तरोताजा परिप्रेक्ष्य की जरूरत होती है। वर्ष 1958-65 और 1992-96 का दौर इसकी तसदीक करता है। मूलत: इस तरह का नजरिया वितरण को पीछे रखता है और वृद्धि को आगे जगह देता है। 
 
मोदी को यहीं पर अपनी भूमिका निभानी है। उन्हें अपने पहले कार्यकाल में अपनाई गई उस नीति को तिलांजलि देने की जरूरत है जो सुदृढ़ीकरण से जुड़ी थी। अब उनके लिए नेहरू का अनुसरण करने और वृद्धि की राह पर चलने का वक्त आ गया है। उसके लिए उन्हें अपने परिचित दायरे से बाहर की समझदारी की जरूरत है। उन्हें ऐसे नए विचारों की जरूरत है जो तार्किक रूप से सोचने की क्षमता रखने वाले लोगों के दिमाग से निकला हो। उन्हें चिंतकों को लेकर अपना संदेह परे रखते हुए किसी ऐसे व्यक्ति को तलाशना चाहिए जो संप्रग के दस वर्षों के शासन के दौरान बने गड्ढे से देश को बाहर निकालने में मदद करे। इस गड्ढे में आर्थिक शासन संबंधी नियमों को काफी शिथिल कर दिया गया था और सीतारमण उन्हें दुरुस्त कर सकती हैं। लेकिन खुद मोदी को भी राजग-2 सरकार के लिए समुचित उत्कृष्टता कायम करने के लिए आसपास देखना चाहिए।
 
जब नेहरू ने महालनोबिस को आर्थिक योजना बनाने का काम सौंपा तो वह उन दिनों के चलन के खिलाफ था। उस समय आर्थिक गतिविधियों में राज्य की भूमिका महज नियामकीय एवं सीमांत ही होती थी लेकिन आज इसके विपरीत हालात हैं। मोदी को भी आज के समय में अवाडी जैसे ही एक प्रस्ताव की जरूरत है लेकिन उसकी विषयवस्तु एकदम उलट होनी चाहिए। उस प्रस्ताव में यह कहा जाए कि राज्य आर्थिक गतिविधियों से खुद को पूरी तरह अलग कर लेगा क्योंकि अब वह खरा नहीं उतर सकता है। जिस तरह नेहरू ने राज्य को अग्रणी शक्ति बनाया, उसी तरह मोदी को भी वृद्धि के लिए निजी क्षेत्र को अग्रणी भूमिका देनी होगी। यह नेहरू की विरासत को पूरी तरह पलटने जैसा होगा और मोदी को तो यह काम खासा पसंद है। 
Keyword: india, economy, GDP, narendra modi,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या वित्त मंत्री की घोषणा से आर्थिक विकास को मिलेगी गति?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.