बिजनेस स्टैंडर्ड - वाहन उद्योग में गिरावट और औद्योगिक नीति
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वाहन उद्योग में गिरावट और औद्योगिक नीति

श्याम पोनप्पा /  August 08, 2019

जरूरत इस बात की है कि इस क्षेत्र को वृद्घि का वाहक बनाया जाए और इसे किसी भी तरह के पतन की आशंकाओं से बचाकर रखा जाए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
औद्योगिक नीति की बात करते ही तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगती हैं। मुक्त बाजार के हिमायती जहां इसकी आलोचना करते हैं, वहीं सरकारी हस्तक्षेप में यकीन करने वाले इसके समर्थन में उतर आते हैं। परंतु जैसा कि अर्थशास्त्री दानी रोड्रिक ने एक दशक पहले कहा था, हकीकत इन दोनों से अलग है। विकासशील देशों मे आगे की राह न तो तगड़े सरकारी हस्तक्षेप से निकलती है और न ही सरकार को अर्थव्यवस्था से पूरी तरह दूर रखने से। हालांकि कई बार आयात में रियायत, नियोजन और सरकारी स्वामित्व के कारणों से सफलता मिली है। भारत में अंतरिक्ष शोध संगठन इसरो इसका उदाहरण है। परंतु अक्सर ऐसी सफलताएं अतिरंजना के चलते या लचीलेपन की कमी के चलते नाकामी और संकट में तब्दील हो गई हैं। इसी प्रकार, उदारीकरण के कारण भी निर्यातकों, वित्तीय बिचौलियों तथा कुछ कुशल कर्मियों को लाभ मिला लेकिन अक्सर यह व्यापक आर्थिक वृद्घि सुनिश्चित कर पाने में नाकाम रही। 
 
इस मुद्दे पर भी मतभेद नजर आते हैं कि विकास की प्रक्रिया में तुलनात्मक बढ़त पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए या फिर समर्थन और उद्योग संरक्षण को विस्तार के साथ ढांचागत बदलावों की दिशा में प्रयास करना चाहिए। उदाहरण के लिए देश में इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार उपकरण बनाने का मामला। सन 2009 में लंदन स्थित ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और पेइचिंग विश्वविद्यालय के आर्थिक शोध केंद्र के पूर्व निदेशक जस्टिन यीफू लिन और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के हा-चुन चांग के बीच एक बहस आयोजित की। लिन तुलनात्मक बढ़त के पक्ष में तो चांग उद्योग जगत को संरक्षण के पक्ष में अपनी बात रख रहे थे। दिलचस्प बात है कि दोनों ने मजबूत सरकारी हस्तक्षेप की हिमायत की, हालांकि उनके तरीके अलग थे। लिन जहां तुलनात्मक बढ़त की सुविधा देने की बात कर रहे थे, वहीं चांग का कहना था कि इसे देश के उद्योग जगत को उन्नत बनाने के क्षेत्र में आधार की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। 
 
औद्योगिक नीति की कई व्याख्याएं हैं। बुनियादी ढांचे की एक ऊध्र्वाधर शैली है, जो अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं के लिए एक ऊंची उठती लहर की तरह होती है। लंबवत स्थिति के लिए राज्य नियोजन और नियंत्रण इसके विपरीत होता है। सरकारी नियमन और सहयोग का मिश्रण इसके बीच की स्थिति है जहां कर प्रोत्साहन, श्रम नियमन, वित्तीय कारण, भूमि आवंटन एवं अधिग्रहण के अलावा निजी क्षेत्र के साथ तालमेल शामिल होता है। इन्हें उद्योग या विनिर्माण तक सीमित किया जा सकता है या फिर अधिक व्यापक करके देखा जाए तो इसे तमाम आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर देखा जा सकता है जिसमें कृषि, डेरी और सेवाएं शामिल हैं। ऐतिहासिक तौर पर देखें तो औद्योगिक नीति का आंशिक पालन हर जगह हुआ है। अमेरिका में रीगन के कार्यकाल में डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (डीएआरपीए) ने सरकारी और निजी प्रतिभागियों का संगठन स्थापित किया ताकि सरकार और निजी क्षेत्र के भागीदारों का समूह बनाकर समन्वित प्रयास किए जा सकें। 
 
इसी प्रकार सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रौद्योगिकी समूह (सेमाटेक) में इंटेल और टैक्सस इंस्ट्रूमेंट्स जैसी कंपनियों के साथ मिलकर अमेरिकी सेमीकंडक्टर उद्योग में नई जान फूंकने के लिए विनिर्माण लागत और उत्पाद की कमियां दूर करने का प्रयास किया गया। इसी प्रकार विकसित मशीनी उपकरणों और स्वचालन उद्योग के लिए द नैशनल सेंटर फॉर मैन्युफैक्चरिंग साइंसेज (एनसीएमएस) का गठन किया गया। एक अन्य परियोजना का संबंध अमेरिका की घटती प्रतिस्पर्धी क्षमता के कारणों का पता लगाने से था। साथ ही इसके अमेरिकी दबदबा दोबारा कायम करने के तरीके तलाशने की बात भी शामिल थी। 
 
इनका निष्कर्ष यह था कि अमेरिका अपनी तकनीक आधारित प्रतिस्पर्धी क्षमता गंवा रहा है क्योंकि दूसरे विश्वयुद्घ के बाद निर्णय लेने की क्षमता तकनीक आधारित योजना से वित्त आधारित नियोजन की ओर स्थानांतरित हो गई। बाद वाली स्थिति में सफलता का आकलन वित्तीय प्रतिफल से किया जाता जबकि तकनीक आधारित नियोजन में लक्ष्य होता तकनीक की सहायता से प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल करना और ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करना। अमेरिका में बुश प्रशासन ने सन 1990 में इस परियोजना को रद्द कर दिया क्योंकि इसे मुक्त बाजार के समय में औद्योगिक नीति में हस्तक्षेप करने वाला माना जा रहा था। 
 
औद्योगिक नीति और भारत का वाहन क्षेत्र
 
वर्ष 2006 में भारी उद्योग मंत्रालय ने वाहन क्षेत्र के मशविरे से 2002 की एक पहल पर काम करना शुरू किया। स्वचालन मिशन योजना 2006-2016 एक ऐसा कार्यक्रम था जो सरकारी एजेंसियों, उद्योग जगत के प्रतिभागियों और अकादमिक जगत तक विस्तारित था। इसका लक्ष्य था देश को वाहन उद्योग में वैश्विक गढ़ बनाना। 2008 और 2013-14 की गिरावट के बावजूद यह सफल रहा और 2016 तक इस क्षेत्र के रोजगार एक करोड़ से बढ़कर 3.2 करोड़ हो गये। इसका अगला चरण 2016 से 2026 तक प्रभावी है। इस अवधि में कुल उत्पादन में निर्यात की भागीदारी बढ़ाकर 35 से 40 फीसदी करने की बात शामिल है। इस दौरान इस क्षेत्र के रोजगार बढ़ाकर 6.5 करोड़ करने का लक्ष्य है। गत वर्ष इसकी गति में थोड़ी गिरावट आई है लेकिन इसके लिए कुछ विपरीत कारक उत्तरदायी हैं। इसमें डीजल और इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर नीतियों में भ्रम और अनिश्चितता बड़ी वजह रहे। साथ ही कारोबारी तनाव, जीडीपी वृद्घि में गिरावट, उत्सर्जन नीतियों और करों के कारण लागत में बढ़ोतरी तथा वित्तीय क्षेत्र में संकट के चलते ऐसा हुआ है। 
 
वाहन क्षेत्र में धीमेपन और बड़ी तादाद में नौकरियां जाने की आशंका के बीच क्या तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। कुछ पर्यवेक्षकों को ऐसा लगता है जबकि अन्य मंदी को चक्रीय बताकर खारिज करते हैं। वे मंदी और निराशा की खबरों को भी अतिरंजित करार देते हैं। हमें यह मानना होगा कि भारत की तुलना ओईसीडी के बाजारों से नहीं की जा सकती है। उदाहरण के लिए देश में सन 2017 में प्रति 1,000 में से 27 लोगों के पास कार थी। ओईसीडी देशों में यह आंकड़ा सैकड़ों में है। जाहिर है अगर उद्योग जगत मुनाफे में रहा और नया निवेश आया तो रोजगार में अपार वृद्घि हो सकती है। हालांकि इस बीच पर्यावरण प्रभाव, ईंधन आयात और अधिक सड़कें बनाने का काम भी करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि भारत को विकास के इंजन के रूप में वाहन उद्योग की आवश्यकता है। चूंकि यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था के कई अन्य क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न करता है इसलिए इसमें नाकामी का असर तमाम क्षेत्रों पर पड़ सकता है। दूरसंचार, विनिर्माण और वित्त क्षेत्र की तरह इसे पतन से बचाना होगा। 
 
कॉर्पोरेट मुनाफा 2008 में जीडीपी के 7.8 फीसदी से घटकर 2018 में जीडीपी के 3 फीसदी पर आ गया। ऐसे में सरकार को जमीनी हकीकतों को समझना होगा। हमारी प्राथमिक आवश्यकता स्थिर और सहयोगी नियामकीय माहौल की है। इलेक्ट्रिक वाहन या डीजल वाहनों आदि की नीतियों जैसे नीतिगत बदलाव समावेशी मशविरे के जरिये लिए जाने चाहिए। 
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