बिजनेस स्टैंडर्ड - राजकोषीय संघवाद के समक्ष खतरा
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 16, 2019 08:03 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

राजकोषीय संघवाद के समक्ष खतरा

वाई वी रेड्डी /  August 07, 2019

जोखिम कम करने के लिए राष्ट्रपति 15वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं पर राज्यों और केंद्र की प्रतिक्रिया मांग सकते हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं वाई वी रेड्डी

 
सरकार ने राष्ट्रपति के समक्ष यह प्रस्ताव रखा है कि 15वें वित्त आयोग का कार्यकाल एक माह बढ़ाया जाए और उससे रक्षा और आंतरिक सुरक्षा फंड के लिए ऐसा आवंटन करने का सुझाव देने को कहा जाए जो रद्द न हो। आयोग के विचारार्थ विषय के अंतर्गत रक्षा और आंतरिक सुरक्षा के लिए संसाधनों का सुनिश्चित आवंटन करने का प्रस्ताव रखा गया है। आधिकारिक वक्तव्य में कहा गया है, 'संशोधनों के मुताबिक 15वें वित्त आयोग को यह भी परीक्षण करना चाहिए कि क्या आंतरिक सुरक्षा और रक्षा के लिए धन की व्यवस्था करनी होगी और अगर ऐसा किया जाएगा तो ऐसी व्यवस्था का क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाएगा।'
 
आयोग के प्रस्तावित अतिरिक्त विचारार्थ विषय कई सवाल खड़े करते हैं। पहला, यह संविधान के अनुरूप राजकोषीय संघवाद, बजट एवं वित्तीय प्रबंधन की समग्र योजना में किस प्रकार उपयुक्त बैठती है? केंद्र सरकार द्वारा संग्रहीत कर को राज्यों के साझा करना होता है। इसे केंद्र और राज्यों के बीच बांटने के पहले राज्यों के संग्रह शुल्क की कटौती की जाती है। इन हिस्सों को केंद्र सरकार के समावेशी फंड तथा राज्यों के फंड में शामिल किया जाता है। वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुसार सहायता अनुदान को केंद्र सरकार के संसाधनों से इतर आवंटित किया जाता है इसमें केंद्र सरकार की कर हिस्सेदारी शामिल होती है। 
 
दूसरा, रक्षा क्षेत्र के लिए आवंटन पूरी तरह केंद्र की जवाबदेही है। दरअसल 14वें वित्त आयोग ने अतीत में अपर्याप्त आवंटन को रेखांकित करते हुए कहा भी है, 'इसी प्रकार इसके अनुमानों ने रक्षा राजस्व व्यय (वेतन समेत) में 2016-17 में 30 फीसदी बढ़ोतरी की बात कही। इसमें वेतन आयोग का प्रभाव शामिल है। इसके साथ ही शेष बचे वर्षों के दौरान 20 फीसदी की स्थिर वृद्घि की बात कही गई। (पैरा 6.35)' 'रक्षा मंत्रालय ने संसाधनों की जो मांग की है उसका काफी हिस्सा पूंजीगत व्यय की प्रकृति का है। यह हमारे आकलन के दायरे से बाहर है। उस राजस्व व्यय का पुनर्गठन आवश्यक है ताकि रक्षा तैयारी और रखरखाव समुचित ढंग से चल सकें। हमने रक्षा राजस्व व्यय-जीडीपी अनुपात को अनुमान की अवधि में स्थिर रखा, बजाय कि वृद्घि को धीमा होने देने के। यद्यपि अतीत में ऐसा हो चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो रक्षा राजस्व व्यय की दर को जीडीपी की दर के अनुरूप ही बढऩे दिया गया, यह रक्षा राजस्व व्यय की अतीत की वृद्घि से काफी ऊंची है। (पैरा 6.36)।'
 
संविधान ने केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया है कि वह रक्षा क्षेत्र को वास्तविक आवंटन करे। क्या वित्त आयोग जैसे संस्थान को ऐसे अहम क्षेत्र के लिए विशिष्ट आवंटन पर सुझाव देना उचित है? जबकि इसका असर व्यय आवंटन पर संसदीय नियंत्रण की भावना और सुरक्षा निहितार्थ की बदलती मांग पर भी होगा।  तीसरा, एक हद तक आंतरिक सुरक्षा राज्य सरकारों की भी जवाबदेही है क्योंकि कानून व्यवस्था उसका दायित्व है। हकीकत में जब केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल अथवा सीमा सुरक्षा बल जैसी सेवाएं राज्य सरकारों द्वारा मांगी जाती हैं तो उनका भुगतान भी वे अपने बजट से करती हैं। इसके अलावा जब उनकी सेवाओं का इस्तेमाल राज्य सरकारें चुनाव आदि के लिए करती हैं तो भी उनका भुगतान उन्हें करना होता है। जब केंद्र और राज्य के चुनाव साथ-साथ हो रहे हों तो खर्च को केंद्र और राज्य मिलकर साझा करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो केंद्र और राज्य दोनों को रक्षा और आंतरिक सुरक्षा की अपनी-अपनी तरह से आवश्यकता होती है। उम्मीद है कि 15वां वित्त आयोग परिचालन समस्याओं के अलावा इन बुनियादी मुद्दों पर भी विचार करेगा। चाहे जो भी हो वह हर विषय पर अनुशंसा देने के लिए बाध्य भी नहीं है। वित्त आयोग के विचारार्थ विषय को अंतिम रूप देने के लिए राज्यों के साथ चर्चा की प्रक्रिया में सरकारिया आयोग ने कहा,'किसी भी मशविरे के सार्थक होने के लिए आवश्यक है कि वह पर्याप्त हो।' इस खास विचारार्थ विषय का केंद्र-राज्य संबंधों पर गहरा असर होगा। क्या अतिरिक्त विचारार्थ विषयों से पहले राज्यों से मशविरा किया गया या किया जाएगा?
 
संविधान सभा ने अपनी चर्चा में कहा कि अनुशंसाओं को स्वीकार करने का काम संसदीय मंजूरी पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि अनुशंसाएं केंद्र और राज्य दोनों को प्रभावित करती हैं। चूंकि संविधान में हर अनुशंसा पर उठाए गए कदम के बारे में राष्ट्रपति की व्याख्या सदन में पेश करने का प्रावधान है इसलिए अनुमान है कि राष्ट्रपति अपने विशेषाधिकार का प्रयोग भारतीय गणराज्य के मुखिया के तौर पर करेंगे जिसमें केंद्र और राज्य दोनों शामिल हैं।  हालिया घटनाओं के अनुसार देखें तो वित्त आयोग की अनुशंसाओं को निर्णय लेने तक गोपनीय रखने और उठाए गए कदमों को संसद के समक्ष रखने के  देश के राजकोषीय संघवाद के लिए अपने निहतार्थ हैं। जोखिम को कम करने के लिए राष्ट्रपति 15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने पर विचार कर सकते हैं और राज्य सरकारों तथा केंद्र की प्रतिक्रिया ले कर अंतिम नजरिया पेश कर सकते हैं। 
 
इस संदर्भ में एक मुख्यमंत्री के सन 2012 के गणतंत्र दिवस के भाषण का उल्लेख करना उपयोगी होगा:  'राजकोषीय क्षेत्रों में व्यापक रूप से संघीय ढांचे को नष्ट किया जा रहा है। लोकहित या जन अधिकार के नाम पर अधिक से अधिक फंड दिल्ली के हवाले किए जा रहे हैं। वित्त आयोग ने राज्यों की हिस्सेदारी कम की है और अधिसंख्या हिस्सा केंद्र के पास रखा है। केंद्र सरकार ने लोकलुभावन योजनाओं को पास किया है लेकिन उनके क्रियान्वयन के लिए राज्यों को धन नहीं दिया जा रहा। विकास के लिए पर्याप्त धन हासिल करना हर राज्य का अधिकार है। केंद्र कोई उपकार नहीं कर रहा।'
 
'मैं आज जो चिंताएं प्रकट कर रहा हूं, वे केवल बतौर मुख्यमंत्री नहीं बल्कि देश के आम नागरिक के रूप में भी हैं। ऐसा क्यों है कि तमाम राजनीतिक दलों के मुख्यमंत्री देश के संघीय ढांचे पर बार-बार हो रहे हमलों के प्रति अपनी चिंता एकजुट होकर प्रकट कर रहे? अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार यह समझे कि राज्यों को समुचित फंड देने से केंद्र कमजोर नहीं होगा। राज्यों को भी केंद्र सरकार के साथ तालमेल करना चाहिए बजाय कि उसके अधीन बने रहने के। सहकारी संघवाद ही देश में मानक होना चाहिए।'
 
(लेखक आरबीआई के पूर्व गवर्नर हैं)
Keyword: fiscal deficit, revenue, economy,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बिजली वितरण में फ्रेंचाइजी मॉडल होगा कारगर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.