बिजनेस स्टैंडर्ड - जम्मू एवं कश्मीर में जोखिम भरा कदम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, August 22, 2019 04:23 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

जम्मू एवं कश्मीर में जोखिम भरा कदम

श्याम सरन /  August 06, 2019

केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर को लेकर अपना दांव चल चुकी है। अब इन कदमों के संभावित असर और जोखिम को कम करने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन

 
केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर को लेकर कोई बड़ा कदम उठाने वाली है, यह बात संसद में 5 अगस्त को हुई घोषणाओं से करीब एक सप्ताह पहले से लगभग सबको पता थी। घाटी में बड़ी तादाद में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, मुख्य धारा के राजनीतिक दलों के कई नेताओं को नजरबंद करना, अमरनाथ यात्रा रद्द करना और गैर कश्मीरी पर्यटकों, छात्रों और अन्य यात्रियों को बड़े पैमाने पर वहां से बाहर करना आदि ऐसे अप्रत्याशित कदम थे, जो बताते थे कुछ बड़ा घटनाक्रम होने वाला है।  देश के गृहमंत्री ने संसद में जो घोषणाएं कीं, वे जम्मू कश्मीर को लेकर सरकारी नीति में आमूलचूल बदलाव लाने वाली हैं। राष्ट्रपति के एक आदेश से जम्मू कश्मीर का वह विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया जो उसे संविधान के अनुच्छेद 370 से मिला था। इसके साथ ही उसका वह स्वायत्त दर्जा भी समाप्त हो गया जो कश्मीर के निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व और भारत के केंद्रीय नेतृत्व के बीच समझौते से उत्पन्न हुआ था। एक्सेशन यानी विलय और स्वायत्तता में अंतर है। महाराजा हरि सिंह ने जिस विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे वह राज्य को भारतीय गणराज्य का अभिन्न अंग बनाता है। स्वायत्तता कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में प्रदान की गई जिसके तहत उसे अन्य राज्यों से इतर कुछ अधिकार प्राप्त हुए। ये अधिकार अनुच्छेद 370 से निकले। राष्ट्रपति के आदेश के बाद स्वायत्तता का अतिरिक्त तत्त्व अवैध हो गया। यह बदलाव वास्तविक से अधिक प्रतीकात्मक है क्योंकि बीते वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने व्यवस्थित तरीके से राज्य की स्वायत्तता समाप्त की है। यह भी कहा जा सकता है कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में जम्मू कश्मीर में केंद्र का हस्तक्षेप अधिक रहता है। परंतु जो वास्तविक राजनीतिक समझौता राज्य की विशिष्ट पहचान से जुड़ा हुआ था, उसे केंद्र सरकार ने एकपक्षीय ढंग से समाप्त कर दिया। 
 
संसद ने भी जम्मू कश्मीर के दर्जे में बदलाव को मंजूरी दे दी। इस तरह उसकी स्वायत्तता और कम हो गई। राज्य को दो हिस्सों में बांटा जाएगा-जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख। अब इसे पूर्ण राज्य के बजाय केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा होगा और इस पर केंद्र उप राज्यपाल के माध्यम से शासन करेगा। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला अवसर है जब एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया और इसे सुरक्षा कारणों से उचित बताया गया। भले ही यह व्यवस्था अस्थायी हो लेकिन घाटी की आबादी इसे अपना अपमान और तुच्छ बताया जाना मानेगी। इतना ही नहीं यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक अपशकुन भरी नजीर है। 
 
यह स्पष्ट नहीं है कि नई व्यवस्था पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से कैसे निपटेगी। कथित आजाद कश्मीर, गिलगित और बाल्टिस्तान उसका हिस्सा है। उदाहरण के लिए क्या गिलगित और और बाल्टिस्तान को लद्दाख की तरह केंद्रशासित प्रदेश घोषित किया जाएगा? क्या नए कदमों का यह अर्थ है कि हम अब पाकिस्तान के साथ संवाद प्रक्रिया में जम्मू कश्मीर को बतौर एजेंडा शामिल नहीं करेंगे? या फिर क्या जम्मू कश्मीर एजेंडे पर बने रहेंगे क्योंकि हम पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत को लौटाने पर चर्चा जारी रखना चाहते हैं?
 
घोषणा के पहले सुरक्षा को लेकर जो अप्रत्याशित उपाय अपनाए गए और जो अब भी बरकरार हैं। इससे यह लगता है कि सरकार को इस बात का अंदाजा था कि यह कदम जनता के गले नहीं उतरेगा और इसका हिंसात्मक विरोध देखने को मिल सकता है। कहा जा रहा है कि आम कश्मीरियों ने इस घोषणा का स्वागत किया है। यह बात गले नहीं उतरती क्योंकि वे पहले ही एक के बाद एक सरकारों की नीतियों से खुद को अलग थलग महसूस कर रहे हैं। बहरहाल, समूचे उत्तर भारत में इन घोषणाओं का जबरदस्त स्वागत देखने को मिल रहा है। व्यापक रुझान यह भी है कि कश्मीरियों को बहुत तवज्जो दी जाती है, वे राष्ट्र विरोधी और देशद्रोही हैं तथा उनसे सख्ती से निपटने की आवश्यकता है। ठीक वैसे ही जैसे बागी तबियत के बच्चे से निपटा जाता है। ताजा निर्णय लोकप्रिय हैं और देश के हिंदी प्रदेश में सत्ताधारी दल के राजनीतिक रसूख को और मजबूत करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता इससे और बढ़ेगी। इतना ही नहीं यह घटनाक्रम कमजोर आर्थिक स्थिति की खबरों पर से ध्यान हटाएगा, भले ही यह वास्तविक इरादा न हो। 
 
केंद्र सरकार को भरोसा है कि वह हथियारों के दम पर घाटी में शांति बहाल कर सकती है, भले ही इसका नतीजा जबरदस्ती शांति स्थापित करने के रूप में सामने आए। एक दलील यह है कि अनुच्छेद 370 के तहत अतिरिक्त स्वायत्तता तो मिलती रही लेकिन इसने कश्मीरी लोगों को देश की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनने दिया। इसके अंत के साथ ही राज्य का पूरी तरह एकीकरण हो गया है। बहरहाल असली नतीजा बढ़ी हुई हिंसा और चरमपंथ के रूप में देखने को मिल सकता है।  पाकिस्तान हालात का फायदा उठाएगा। सीमापार आतंकवाद बढ़ेगा और नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी भी बढ़ेगी। वह मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाएगा। यह सुखद है कि अब तक किसी बड़े बाहरी मुल्क ने नागरिकों को कश्मीर न जाने की सलाह देने के अलावा इस विषय पर कोई वक्तव्य नहीं दिया है। मामला शांतिपूर्ण रहने पर वह सलाह भी वापस ली जा सकती है।
 
भारत-पाकिस्तान तनाव बढऩे पर अमेरिका और चीन का कूदना लाजिमी है। अमेरिका अफगानिस्तान से अपने सैनिक हटाने में लगा हुआ है और वह पाकिस्तान को अफगान शांति समझौते में अहम मानता है। पाकिस्तान पहले ही कह चुका है कि अगर भारत को जम्मू कश्मीर के दर्जे में राजनीतिक बदलाव करने दिए गए तो वह शायद उक्त भूमिका नहीं निभा सकेगा। अमेरिकी प्रशासन के प्रभावी धड़ों का मानना है कि अफगान शांति की राह कश्मीर से होकर जाती है। हमें इस मसले पर अमेरिकी और पश्चिमी सक्रियता के दोबार उत्पन्न होने को लेकर सावधान रहना होगा। पाकिस्तान इस्लामिक देशों के बीच भी भारत के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास करेगा। अपने बढ़ते कद के कारण भारत को इनका जवाब देने में सक्षम होना चाहिए। बहरहाल, देश का अंतरराष्ट्रीय कद काफी हद तक उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति और निरंतर विस्तारित होते बाजार से संबद्घ है। अगर देश की अर्थव्यवस्था में धीमापन आता रहा और संरक्षणवादी कदम बढ़ते रहे तो इसका असर हमारे अंतरराष्ट्रीय कद पर भी पड़ेगा। घाटी की संभावित स्थिति के अंतरराष्ट्रीय असर से निपटना और मुश्किल होगा। अब तीर कमान से निकल चुका है और संभव है कि चीजें सरकार के हिसाब से न घटें। बेहतर होगा कि अब संभावित जोखिमों का आकलन कर उन्हें कम करने पर काम किया जाए। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं और अभी सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)
Keyword: parliament, bill, 370, narendra modi, amit shah, BJP, jammu kashmir,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या नरमी के बीच कर संग्रह का लक्ष्य हासिल कर पाएगी सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.