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समझदारी व संवेदनशीलता जरूरी

संपादकीय /  August 06, 2019

गृहमंत्री अमित शाह द्वारा जम्मू कश्मीर के ढांचे में दूरगामी प्रभाव वाले बदलावों की घोषणा के बाद सरकार को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि इस प्रक्रिया को समझदारी और संवेदनशीलता के साथ अंजाम दिया जाए। राज्यसभा में दिए अपने भाषण में शाह ने कहा कि राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने से राज्य का आर्थिक विकास सुनिश्चित हो सकेगा। उनका यह कहना सही था कि जम्मू कश्मीर का आर्थिक विकास राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। परंतु इसके अतिरिक्त अपने विस्तृत भाषण में उन्होंने यह नहीं बताया कि राज्य की विशेष स्वायत्तता समाप्त करने और दो केंद्रशासित क्षेत्र बनाने से बेहतर विकास कैसे सुनिश्चित होगा। ये संदेह इसलिए भी उत्पन्न हुए हैं क्योंकि राज्य के राजस्व में केंद्र की हिस्सेदारी पहले भी 71 फीसदी रही है। अब केंद्रशासित क्षेत्र का दर्जा मिलने का अर्थ यह है कि दोनों नए क्षेत्रों को धन अब केंद्र से मिलेगा जबकि पहले यह राज्यों के संसाधनों के पूल से होने वाले बंटवारे से आता था। चूंकि केंद्र के राजकोष पर पहले ही काफी दबाव है, ऐसे में यह सवाल भी है कि वह यह अतिरिक्त बोझ वहन कर सकने की स्थिति में है भी या नहीं? एक ऐसा राज्य जो बहुत बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की घेरेबंदी में रहा हो, यह आवश्यक है कि सरकार दोनों नए केंद्रशासित क्षेत्र के तेज आर्थिक विकास को लेकर किए गए वादे के कार्यान्वयन के बारे में स्पष्ट घोषणा कर दे ताकि किसी भी प्रकार की गड़बडिय़ों की आशंका दूर हो सके।

 
सरकार ने हिंदुत्व एजेंडे का एक अहम लक्ष्य हासिल कर लिया है और उसके लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इस घटना का कोई भी गलत प्रभाव सीमित किया जा सके। अनुच्छेद 370 को लेकर हो रही सार्वजनिक बहस में ज्यादातर ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि कैसे अनुच्छेद 35ए समाप्त होने से राज्य के बाहर के भारतीय नागरिक भी वहां जमीन और संपत्ति खरीद सकेंगे। सामान्य तौर पर इस बदलाव पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी लेकिन देश के अन्य हिस्सों के हिंदुओं के जमावड़े और उनकी बहुलता की आशंका, अशांति की बड़ी वजह बन सकती है। गाजा और पश्चिमी तट के रूप में इसके उदाहरण मौजूद हैं। ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जम्मू कश्मीर के जनांकीय ढांचे में बदलाव का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा या फिर वहां नए बसने वाले लोगों के लिए इजरायली नियंत्रण वाले फिलिस्तीन क्षेत्र के तर्ज पर गेट वाला आवासीय परिसर तैयार किया जाएगा।
 
जिस तरह एक राज्य को दो केंद्रशासित क्षेत्रों में बदला गया है और जिस तरह केंद्र ने वहां की पुलिस और भूमि पर नियंत्रण किया है, उसका असर देश के सभी राज्यों पर होगा। तकनीकी तौर पर यह संभव है कि अन्य राज्यों में इसी प्रकार संवैधानिक आघात पहुंचाया जाए। जहां राज्य विधानसभा को भंग करने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है और राज्यपाल राज्य के तौर पर और संसद राज्य विधानसभा के रूप में निर्णय ले सकती है। सर्वोच्च न्यायालय को देखना चाहिए कि यह व्यवस्था उचित है या नहीं और इसका दोहराव रोकने के लिए उचित संवैधानिक उपाय भी करने होंगे। आखिर में, सोमवार को उठाए गए कदमों में राज्य और उसके राजनीतिक तंत्र को साथ नहीं लिया गया। यह ऐसी चूक है जिसकी भरपाई विश्वास बहाली के लिए व्यापक चर्चा के माध्यम से ही हो सकती है। बदले में राज्य के नेताओं को भी यह समझदारी दिखानी चाहिए कि इतिहास का एक पन्ना पलटा जा चुका है और उन्हें यह देखना होगा कि नई व्यवस्था में राज्य के लोगों की बेहतरी किस बात में है।
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