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चीन, मुस्लिम देशों ने चुप्पी साध ली, पाकिस्तान में मची खलबली

अजय शुक्ला /  August 05, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने और और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने की अधिसूचना सोमवार को जारी की तो अंतरराष्टï्रीय स्तर पर कोई शोर-शराबा नहीं हुआ और हल्की-फुल्की प्रतिक्रिया ही आई। हां, हरेक अंतरराष्टï्रीय मंच पर कश्मीर का राग अलापने वाला पाकिस्तान चुप नहीं रहा और उसकी सरकार ने इस कदम की निंदा की। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, 'भारत के कब्जे वाला जम्मू-कश्मीर विवादित क्षेत्र और यह बात पूरा विश्व जानता है। पाकिस्तान इस अंतरराष्ट्रीय विवाद का एक पक्ष होने के नाते इन अवैध कदमों को रोकने के लिए हर संभव कोशिश करेगा।' 

 
पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अब उसे अपने भीतर झांककर सोचना पड़ेगा कि कहीं मेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को कश्मीर मुद्दे में मध्यस्थता करने का न्योता देने के प्रधानमंत्री इमरान खान के सफल हथकंडे के कारण ही तो भारत ने कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म नहीं किया है। पाकिस्तान के विश्लेषक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या खान और ट्रंप ने 22 जुलाई को वाशिंगटन में अपनी बैठक के दौरान भारत की जम्मू-कश्मीर को लेकर योजनाओं के बारे में भी चर्चा की थी। क्या पाकिस्तानी सेना इस घोषणा की भनक थी। 
 
पाकिस्तानी सेना के कारोबारी सौदों पर एक पुस्तक पाकिस्तान आईएनसी की जानी-मानी लेखक आयशा सिद्दीकी ने पूछा, 'सवाल यह है कि क्या डीजीआईएसआई (पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिंजेंस के महानिदेशक) क्या कर रहे थे कि वह भारत की कश्मीर योजना के बारे में खुफिया जानकारी नहीं जुटा पाए? यह खबर एक अचंभे के रूप में क्यों आई है?' पाकिस्तान की आलोचना में कोई दम नहीं है क्योंकि खुद पाकिस्तान ने 1970 में अपने कब्जे वाले कश्मीर का पुनर्गठन किया था। पीओके में से संघ शासित क्षेत्र को अलग किया गया है और उसे 'उत्तरी क्षेत्र' नाम दिया गया है। भारत भी पाकिस्तान के जैसा ही कदम उठा रहा है। भारत ने लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया है और उसे एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया है, जिस पर सीधा केंद्र का नियंत्रण होगा।
 
वर्ष 2009 में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने उत्तरी क्षेत्र को गिलगिट-बाल्टीस्तान नाम दिया था और इस क्षेत्र को कुछ स्वायत्तता दी थी। हालांकि स्थानीय कार्यकर्ता मुखर होकर विरोध करते हैं। उनका कहना है कि अब भी ताकत चुनी हुई विधानसभा के पास नहीं बल्कि केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल के पास है।  भारत के इस फैसले पर इस्लामिक देेशों के संगठन (ओआईसी) में भी चुप्पी है। इस संगठन को पाकिस्तान का समर्थक माना जाता है। ओआईसी ने 4 अगस्त को बयान दिया था कि वह भारत के हिस्से वाले जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त अद्र्धसैनिक बलों के जमावड़े की खबरों समेत बिगड़ते हालात को लेकर चिंतित हैं। हालांकि ओआईसी ने अनुच्छेद को खत्म करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। चीन ने भी चुप्पी साधी है, जबकि भारत ने लद्दाख के दर्जे को बदल दिया है। चीन लद्दाख के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है। 
 
वर्ष 1963 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का 6,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र चीन को दे दिया था, जिसे शक्सगाम घाटी कहा जाता है। चीन इस पर अपना दावा जताता है और कहता है कि शक्सगाम पर उसका नियंत्रण जम्मू-कश्मीर के अंतिम समाधान पर निर्भर करता है। लेकिन अब यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर में नहीं आएगा बल्कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का हिस्सा होगा। जम्मू-कश्मीर पर मोदी सरकार की इस अधिसूचना को देखकर अंतरराष्टï्रीय शक्तियां तो चुप ही रहीं, लेकिन विश्व मीडिया इस पर खासा मुखर रहा। बीबीसी, सीएनएन और अल जजीरा समेत दुनिया के सभी प्रमुख चैनलों और वेबसाइटों पर भारत तथा जम्मू-कश्मीर ही सुर्खियों में रहा।
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