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निजी क्षेत्र को आर्थिक वृद्धि में साझेदार बनाएं, दुश्मन नहीं

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  August 05, 2019

कैफे कॉफी डे का साम्राज्य खड़ा करने वाले संस्थापक वी जी सिद्धार्थ की दुखद मौत ने तीखी बहस छेड़ दी है कि क्या भारत और भारतीय राज्य का उद्यमियों, उद्योगपतियों और कारोबार जगत के प्रति दोस्ताना रवैया कम होता जा रहा है? अपने पीछे छोड़कर गए पत्र में सिद्धार्थ ने कहा है कि वह आयकर अधिकारियों के उत्पीडऩ का सामना कर रहे थे। हालांकि आयकर विभाग ने इस आरोप को पूरी तरह नकार दिया है लेकिन लोग इस दावे पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं। कई लोगों की नजर में आयकर विभाग ने माइंडट्री कंपनी में सिद्धार्थ के शेयरों को बेचने से रोककर उनका उत्पीडऩ ही किया क्योंकि अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी था। 

 
लेकिन आज जताई जा रही चिंता इस मामले के गुण-दोषों से आगे तक जाती है। काले धन के खिलाफ सरकार के जुबानी अभियान के दौर में पैदा हुई आम शंका से इसे बल मिलता है जो आगे चलकर एक डरावने कानून में तब्दील हो गया। पिछले आम बजट में वित्त मंत्री ने अति-संपन्न लोगों पर अधिक कर लगाने की घोषणा की है। हालांकि अधिकतर लोगों के लिए यह कोई खास समस्या नहीं है। लेकिन कर में बढ़ोतरी से निकला संदेश परेशान करता है। यह इंदिरा गांधी के दौर में केंद्र के नकली समाजवादियों द्वारा पैदा किए गए शोर की वापसी जैसा है। बजट में किए गए अन्य प्रावधानों के साथ इसे जोड़कर देखने की जरूरत है। मसलन, अब अगर कंपनियां अपने मुनाफे का दो फीसदी हिस्सा कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) पर खर्च करने में नाकाम रहती हैं तो उन पर आपराधिक मामला चलाया जा सकता है। लाभ के एक हिस्से का भुगतान अनिवार्य किया जाना किसी कर से कम किस तरह है? और सरकार गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के फायदे के लिए कंपनियों पर कर भला क्यों लगा रही है? यह तो सत्तारूढ़ दल के वैचारिक सहयोगियों को अधिक नकदी मुहैया कराने का एक तरीका भर है जिसका इस्तेमाल राज्य के समानांतर एक हिंदुत्ववादी प्रतिष्ठान खड़ा करने में किया जाना है।
 
बजट में कुछ कर अधिकारियों को अधिक ताकत दिए जाने का भी प्रावधान किया गया है। मसलन, सीमा-शुल्क विभाग के अधिकारियों को अब यह ताकत दे दी गई है कि 'राजस्व के लिहाज से खतरा' नजर आने वाले लोगों को वे हिरासत में ले सकते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कुछ चीजें निश्चित रूप से बेहतर हुई हैं। उदाहरण के लिए, कर प्रक्रिया में शुरुआती मानव संपर्क कम करने की लगातार कोशिश हुई है। यह भी सच है कि लोगों के बीच धारणा बन गई है कि सरकार कारोबार जगत से एक-एक पैसा निचोड़ लेना चाहती है। ऐसी धारणा बनाने में सरकार के उच्च अधिकारियों और सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेताओं का मिला-जुला हाथ रहा है।
 
सीधी सी बात है कि भारत इस समय इस तरह का माहौल बनने का बोझ नहीं उठा सकता है। हम वर्षों से जारी निवेश संकट के दौर से गुजर रहे हैं और इसकी हालत में सुधार आना अभी बाकी है। निजी निवेश नहीं बढऩे तक भारत उच्च वृद्धि के रास्ते पर नहीं लौट पाएगा जबकि रोजगार पैदा करने और समृद्धि लाने के लिए यह जरूरी है। लेकिन निवेशकों को डराने से निजी निवेश नहीं लौटेगा। क्या हम चीन जैसी व्यवस्था बनाना चाहते हैं जहां सरकार को बड़े पैमाने पर पूंजी पलायन की आशंका सताती रहती है? पहले ही सरकार काले धन संबंधी कानून के आपराधिक प्रावधानों का दायरा अनिवासी भारतीयों तक बढ़ा चुकी है। सरकार को यही लगता है कि बहुत सारे लोग देश छोड़कर जा रहे हैं और अभियोजन से बचने के लिए ही वे ऐसा कर रहे हैं। लेकिन यह मौजूदा हालात की गलत वजह तलाशने का मामला है। अगर लोग खुद देश छोड़कर नहीं भी जा रहे हैं तो वे अपने हितों और आय के स्रोतों को भौगोलिक रूप से विस्तारित करना चाह रहे हैं। कुछ साल पहले एक चर्चित कारोबारी घराने के वारिस से जब मैंने उनकी भावी कारोबारी रणनीति के बारे में पूछा था तो उन्होंने कहा था कि वह अब अपने समूह की आय का बड़ा हिस्सा विदेशी कारोबार से लाना चाहते हैं। उस उद्योगपति का कहना था कि वह राजनीतिक जोखिम को नगण्य करने के लिए ऐसा करना चाहते हैं। अगर भारत के उद्यमी खुद ही उत्पीडऩ के डर से भारत में निवेश करने से संकोच कर रहे हैं तो फिर कोई विदेशी निवेशक ऐसा क्यों करेगा?
 
सरकार के पास पैसे की बहुत किल्लत है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को ठीक से लागू कर पाने में नाकामी के चलते सरकार के पास पैसे नहीं हैं। इसके चलते सरकार न केवल राजकोषीय स्थिति की सही तस्वीर छिपा रही है बल्कि अधिक पैसे जुटाने के लिए वह आसपास के कमजोर ठिकानों की भी तलाश में है। भारत में कारोबार करना हमेशा ही एक कमजोर निशाना रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ चले आंदोलन और नोटबंदी के बाद से ही यह धारणा मजबूत होती गई है कि लंबे समय तक अमीरों को संरक्षण दिया जाता रहा है और नरेंद्र मोदी सरकार उन्हें ठोक-बजाकर सही कर देगी। 
 
इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सकता है कि भारत में असमानता एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन राज्य का मनमानापन और संपत्ति एवं व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में समझ का अभाव होना भी इसकी एक समस्या रही है। हम असमानता एवं वृद्धि संबंधी समस्याओं का समाधान केवल तभी कर सकते हैं जब हम निजी क्षेत्र के भीतर निवेश में तेजी लाने वाला सुरक्षा अहसास पैदा कर पाएंगे। ऐसा न होने तक भारत मोदी सरकार के दौरान फिसलन की राह पर ही रहेगा और 1970 के दशक के अंधेरे दिनों की तरफ लौटना जारी रखेगा। 'राजस्व के हित' के बारे में काफी कुछ कहा जा रहा है लेकिन राजस्व का वास्तविक हित अर्थव्यवस्था की प्रगति में है। और ऐसा होने के लिए निजी क्षेत्र को राजस्व का साझेदार होना चाहिए, न कि कोई दुश्मन।
Keyword: CCD, share, sidharth, income tax, suicide,,
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