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विदेशी निवेशक क्यों कर रहे बिकवाली?

आकाश प्रकाश /  August 05, 2019

वैश्विक और घरेलू निवेशक बने रहें, इसके लिए हमें भारत को कारोबारी दृष्टिï से सहज-सुगम देश बनाने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश

 
हाल के दिनों में हमने देखा कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय प्रतिभूतियों में काफी बिकवाली की। जुलाई में यह बिकवाली 250 करोड़ डॉलर के करीब रही और अब इसमें इजाफा हो रहा है। दुनिया भर के बाजार जहां नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहे हैं, वहीं हम सकारात्मक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देश के मिड कैप और स्मॉल कैप शेयरों में गिरावट का सिलसिला जारी है। शीर्ष 50 बाजारों की सूची में प्रदर्शन के आधार पर हमारी रैंकिंग 43वीं है। आश्चर्य की बात यह है कि अनुकूल माहौल के बावजूद हमारा प्रदर्शन खराब रहा। 
 
निवेशक जो सरकार चाहते थे वह और प्रभावशाली बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आई है। तेल कीमतें स्थिर हैं और एक तय दायरे में नजर आ रही हैं। रुपया स्थिर है बल्कि लोकसभा चुनाव के बाद उसमें कुछ मजबूती आई है। वैश्विक स्तर पर नकदी सहज उपलब्ध है और दरों में गिरावट आ रही है। केंद्रीय बैंक एक बार फिर मौद्रिक शिथिलता अपना सकते हैं। इनमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व और यूरोपीय केंद्रीय बैंक दोनों शामिल हैं। दिलचस्प है कि विश्व स्तर पर निवेश श्रेणी के प्रपत्रों में से करीब 25 फीसदी का प्रतिफल नकारात्मक है। प्रतिफल इतना कमजोर होने और उसमें लगातार गिरावट आने के कारण वृद्घि को तरजीह दी जानी चाहिए। भारत को हमेशा एक ऐसी अर्थव्यवस्था के रूप में देखा गया है जो लंबी अवधि तक स्थायित्व भरी वृद्घि देने में सक्षम है। इसमें दो राय नहीं कि आने वाले दशक में भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश होगा और वह चीन से तेज वृद्घि हासिल करेगा। इस परिदृश्य के बावजूद भारतीय बाजार संघर्ष क्यों कर रहे हैं? 
 
इसके कई कारण हैं लेकिन मेरी नजर में सबसे अहम कारण इस प्रकार हैं:
 
कारोबारी आय में वृद्घि न होने से हताशा का माहौल है। बीते आठ साल में यह देश के शेयर बाजारों के लिए सबसे बड़ी निराशा की वजह रहा है। कुछ ही लोगों को अंदाजा होगा कि सन 2008 में जीडीपी और कॉर्पोरेट आय के मामले में भारत और अमेरिका दोनों 7 फीसदी के समान स्तर पर थे। आज यह अनुपात अमेरिका में 10 फीसदी और भारत में केवल 2 फीसदी है। देश में कारोबारी मुनाफा पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। हमारी कॉर्पोरेट आय बीते आठ वर्षों में 5 फीसदी से भी कम रही है। आय में इस गिरावट की तमाम वजह हैं। वाणिज्यिक बैंकों के एनपीए में सुधार, उच्च कर दर, तकनीकी विसंगति, आर्थिक झटके, निजी निवेश में कमी, रुपये का अधिमूल्यन आदि ऐसे ही कारक हैं। इन तमाम बातों के बावजूद सचाई यही है कि कोई भी कॉर्पोरेट मुनाफे में सुधार का अनुमान लगाने में सफल नहीं रहा। कोई नहीं कह सकता कि इसमें कब और कितना सुधार आ सकता है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि कॉर्पोरेट मुनाफा जीडीपी के हिस्से के रूप में हमेशा गिरता नहीं रह सकता। 
 
हम पहले ही निम्रतम स्तर पर हैं। यहां से केवल सुधार संभव है। अर्थव्यवस्था की मौजूदा कमजोरी को देखें तो एक और वर्ष हमें निराशा का सामना करना पड़ सकता है। बाजार के विस्तार का दौर समाप्त हो चुका है। ऐसे में बॉन्ड प्रतिफल में 100 आधार अंकों की गिरावट के बावजूद बाजार कमजोर पड़ रहा है। मजबूत आय वृद्घि के अभाव में बाजार में सुधार होता नहीं दिखता। अधिकांश निवेशक इंतजार करके थक चुके हैं और वे अब देश में आवंटन तभी बढ़ाएंगे जब आय में सुधार नजर आएगा। मौजूदा दर पर बाजार काफी महंगे हैं। 
 
दूसरा, अर्थव्यवस्था वाकई कमजोर है। कॉर्पोरेट आय बीते कई वर्ष के निचले स्तर पर है। निवेशकों को कंपनियों से प्राय: बुरी खबरें ही सुनने को मिल रही हैं। कारोबारी उत्साह नदारद है। हर कोई केवल नकदी जुटाने की बात कर रहा है।  नई क्षमता तैयार करने में किसी की रुचि नहीं नजर आ रही। मांग भी प्रभावित हुई है। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। कई कारोबारों को ऋण नहीं मिल रहा है। कारोबारी जगत का आत्मविश्वास हिला हुआ है। सरकार ने दरें कम करने तथा खपत और निवेश बढ़ाने का प्रयास किया है। इससे मदद मिलेगी लेकिन निवेशकों को भूमि, श्रम और न्यायिक सुधारों की भी जरूरत है। वे चाहते हैं कि देश कारोबारी दृष्टिï से सुगम बने। सरकार के पास आर्थिक योजना है लेकिन उसे बेहतर तरीके से प्रस्तुत करना होगा।
 
तीसरा, यह भावना घर कर चुकी है कि भारत आर्थिक नीति में वाम रझान अपना रहा है। यह सही है कि हमें औसत भारतीयों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में अधिक से अधिक व्यय करने की आवश्यकता है। मौजूदा सरकार की जीत में ग्रामीण भारत की बुनियादी सुविधाओं में  सुधार की अहम भूमिका रही है। इसमें सड़क, आवास, बिजली और घरेलू गैस जैसी सुविधाएं शामिल हैं। परंतु अभी काफी कुछ किया जाना है, जिसके लिए धन की आवश्यकता है।  मौजूदा रुख में तो संसाधन जुटाने के लिए सीमित कर आधार पर जी जोर दिया जा रहा है। इससे कारोबारियों में उत्साह नहीं पनप पा रहा। यही मूल आशंका है। इसमें दो राय नहीं कि देश के उद्योगपतियो ने भी तंत्र का खूब दुरुपयोग किया है। एनपीए संकट पर नजर डालिए। कई लोगों को दंडित किए जाने की आवश्यकता है। 
 
परंतु हर बड़ा भारतीय उद्योगपति ठग या धोखेबाज नहीं है। यह भी सच है कि रोजगार तैयार करने काम निजी क्षेत्र ही करेगा। हमें कर दायरा बढ़ाने का तरीका तलाशना होगा। साथ ही सरकारी परिसंपत्ति की बिक्री तेज करनी होगी ताकि जरूरी राशि जुटाई जा सके। ग्रामीण भारत में संसाधनों की आवश्यकता को देखते हुए हम सरकारी उपक्रमों को लाखों करोड़ रुपये की राशि नहीं देते रह सकते। फिर चाहे वे बैंक हों, एयर इंडिया या बीएसएनएल अथवा एमटीएनएल जैसी कंपनियां।  इसके अतिरिक्त देश में निवेश के प्रतिफल में भी इजाफा हो रहा है। एनसीएलएटी ने हाल में एस्सार स्टील पर जो निर्णय दिया है वैसे मामलों से जोखिम का प्रीमियम बढ़ेगा। अगर जोखिम प्रीमियम बढ़ता है तो बाजार को सस्ता होना होगा ताकि उच्च कर पूर्व प्रतिफल दिया जा सके। सरकारी इक्विटी बाजार अभी सस्ते नहीं हैं। 
 
फिलहाल देश में रुझान बहुत कमजोर हैं। यह बात घरेलू निवेशकों और उद्योगपतियों दोनों पर लागू होती है। यह नकारात्मकता वैश्विक निवेशकों को प्रभावित कर रही है। ऐसा लगता नहीं कि वैश्विक निवेशक, घरेलू निवेशकों से पहले निकासी करेंगे। हमें घरेलू रुझानों पर नजर रखनी होगी। उसके लिए हमें देश को कारोबारी दृष्टिï से सुगम बनाने पर ध्यान देना होगा। फिर चाहे मामला करों का हो, नियमन का या सुधार का। 
Keyword: FPI, invest, equity,,
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