बिजनेस स्टैंडर्ड - अतीत की गलतियों में सुधार
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अतीत की गलतियों में सुधार

संपादकीय /  August 05, 2019

जम्मू कश्मीर के लोगों को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने की प्रक्रिया शुरू करके और राज्य को केंद्र शासित क्षेत्र में विभाजित करने संबंधी विधेयक पेश करके भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र के एक अहम वादे को पूरा करने की ओर साहसिक और निर्णायक कदम उठाया है। बहरहाल, सोमवार की घटनाओं से कई बातें निकलती हैं। इनमें सबसे अहम यह है कि जिस तरह सरकार ने जम्मू कश्मीर का दर्जा बदलने की कोशिश की है, उससे उस तरह के एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा, जो उसकी राजनीतिक परियोजना में परिकल्पित है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 72 वर्ष पुराने विशेष स्वायत्त दर्जे को समाप्त करके कुछ ऐतिहासिक गलतियों में सुधार किया गया है। जब भारतीय गणराज्य में अपनी रियासत का विलय करने वाले अन्य राजाओं की तरह कश्मीर के महाराजा ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर लिए थे तो यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर क्यों जम्मू कश्मीर के नागरिकों को अलहदा कानून के तहत रहने दिया गया। इन कानूनों के अधीन देश के अन्य राज्यों के लोगों के जम्मू कश्मीर में संपत्ति खरीदने तक पर रोक थी। 

 
व्यापक तौर पर देखें तो अनुच्छेद 370 के खात्मे के पीछे एक दलील है। सरकार का कहना है कि अनुच्छेद 370 की धारा 3 राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह जम्मू कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को किसी भी समय समाप्त कर सके। अनुच्छेद 370 (3) में कहा गया है, 'इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती प्रावधानों के बावजूद, राष्ट्रपति सार्वजनिक अधिसूचना के जरिये यह घोषित कर सकते हैं कि इस अनुच्छेद को समाप्त किया जा सकता है या कुछ अपवादों और संशोधनों के साथ यह लागू रह सकता है। वह ऐसा किसी भी तय तिथि से कर सकते हैं।' इसी प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति का आदेश जारी किया गया और भाजपा के चुनावी घोषणापत्र के एक अहम वादे को क्रियान्वित किया गया। इन दलीलों के बावजूद मौजूद कानूनी उलझाव और संवैधानिक सवाल यह गारंटी देते हैं कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा। वही तय करेगा कि राज्य संविधान सभा की सहमति का अर्थ क्या विधायी सभा से है या नहीं। कुछ मायनों में यह एक संवैधानिक आघात है क्योंकि अब न तो राज्य विधानसभा है, न राज्य सरकार। ऐसे में राज्यपाल और संसद के लिए गुंजाइश बनी कि वे अपने बूते कदम उठा सकें। अगर राज्य विधानसभा और सरकार होतीं तो यह संभव न होता। विधानसभा चुनावों में देरी इसी तैयारी का सोचा समझा हिस्सा थी।
 
सरकार ने इस बड़े बदलाव के लिए जिस तरीके का इस्तेमाल किया वह बड़ी चिंता का विषय है। राज्य के दर्जें में व्यापक बदलाव का निर्णय स्थानीय नेताओं या राज्य के लोगों के साथ मशविरे से भी किया जा सकता था। अनुच्छेद 370 ऐसी ही अपेक्षा करता है। इसके बजाय सरकार ने राज्य में सैनिकों की तादाद बढ़ाई, कफ्र्यू लगाया, इंटरनेट सेवा बंद की और राज्य के प्रमुख नेताओं को नजरबंद किया। दूसरा सवाल यह है कि इससे राजनीतिक रूप से क्या हासिल हुआ? गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि अनुच्छेद 370 के कारण राज्य का विकास रुका हुआ था और रोजगारपरक निवेश नहीं आ पा रहा था। यह दलील गलत है। विकास की कमी का कारण निरंतर चली आ रही अशांति है। विशेष दर्जे से इतर इसका कारण यह है कि यह पाकिस्तान से लगा विवादित क्षेत्र है। पाकिस्तान ने अलगाववादियों और आतंकवादियों को भड़काने को ही लक्ष्य बना रखा है। जरूरत थी विश्वास बहाल करने वाले उपायों की लेकिन हमारी सरकारें इसमें लगातार नाकाम रहीं।
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