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कम बारिश से मक्के का रुख कर रहे किसान

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली August 04, 2019

दक्षिण पश्चिम मॉनसून की शुरुआत में देरी के कारण इस साल खरीफ की बुआई पर छाए निराशा के बादलों के बीच मक्के के रूप में उम्मीद की किरण दिखी है। मक्के के अंतर्गत रकबे में हाल ही में उछाल आई है जो देश में उगाई जाने वाली अनाज की तीसरी सबसे बड़ी फसल है। खतरनाक कीट 'फॉल आर्मीवर्म' द्वारा विनाश के डर के बीच ऐसा हुआ है जिसने पिछले साल कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में मक्का फसल के बड़े इलाके को नुकसान पहुंचाया था। अधिकारियों ने कहा कि हालांकि फॉल आर्मीवर्म को लेकर खतरे की संभावना अब भी है, लेकिन ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में निवेश पर रिटर्न और मॉनसून में देरी ऐसे कारक रहे जिनकी वजह से लोगों को इस फसल का विकल्प चुनना पड़ा।
 
मक्के को एक अवधि में लगभग 4-5 सिंचाई की जरूरत होती है, जबकि धान के लिए इससे कहीं ज्यादा जरूरत पड़ती है। इसके अलावा खुले बाजार में मक्के के दाम लगभग 15-16 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर इस साल करीब 25 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए हैं। उत्पादन में आंशिक रूप से गिरावट और वैश्विक दामों में मजबूती के कारण भी दामों में यह तेजी आई है। उत्पादन में गिरावट की वजह से देश पर लगभग पांच लाख टन आयात का दबाव बना है। प्रमुख उत्पादक राज्य कर्नाटक में इस खरीफ सीजन के दौरान रकबा अब भी पिछले साल की तुलना में कम है। खास तौर पर कीट के हमले की आशंका के कारण ऐसा हुआ है। कृषि विभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 25 जुलाई तक लगभग 63.8 लाख हेक्टेयर में मक्के की बुआई की गई है जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में लगभग 1,36,000 हेक्टेयर ज्यादा है। पिछले सप्ताह तक यह रकबा गत वर्ष की तुलना में कम था। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सेापा) के चेयरमैन देविश जैन ने कहा कि बेहतर आमदनी की वजह से मध्य प्रदेश में बैतूल-छिंदवाड़ा पट्टïी में इस वर्ष सोयाबीन किसान मक्के का रुख कर रहे हैं। दरअसल, आंकड़ों से पता चलता है कि मध्य प्रदेश में 25 जुलाई तक लगभग 14.1 लाख हेक्टेयर में मक्का बुआई की जा चुकी है जो 2013-14 के बाद की औसत बुआई का 124.38 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में करीब 6.4 लाख हेक्टेयर में यह फसल उगाई गई है जो सामान्य रकबे का 97 प्रतिशत है। बिहार में करीब 3.2 लाख हेक्टेयर में इसकी बुआई की गई है जो 2012-13 के बाद के औसत रकबे का 125.19 प्रतिशत है।
 
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व निदेशक और मेज डाइवर्सिफिकेशन ग्रुप ऑफ हरियाणा के चेयरमैन सायन दास ने कहा कि इन इलाकों में फॉल आर्मीवर्म का खतरा कम हो गया है क्योंकि हाल में हुई बारिश ने कीटों के अंडे हटा दिए हैं। हरियाणा में इस वर्ष 25 जुलाई तक फसल का रकबा पिछले साल की तुलना में लगभग 76 प्रतिशत अधिक है। दास ने कहा कि धान को परिपक्व होने में करीब 140-150 दिन लगते हैं, जबकि मक्का 100-110 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाता है जिससे किसानों को डेढ़ महीने की अतिरिक्त अवधि मिल जाती है। इस बीच दक्षिण भारत में खतरनाक फॉल आर्मीवर्म कीट का खतरा अब भी काफी अधिक है। इसने पिछले साल वहां मक्के की फसलों पर कहर बरपाया था और जल्द ही देश के लगभग 10 राज्यों में फैल गया था। हालांकि विशेषज्ञों को लगता है कि इसकी तीव्रता कुछ ही क्षेत्रों तक रह गई है। दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (एसएबीसी) के संस्थापक निदेशक भागीरथ चौधरी ने कहा कि यह कीट अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दक्षिण राजस्थान और महाराष्ट्र के नए क्षेत्रों में जाने की आशंका है, हालांकि इसकी गंभीरता पिछले साल के कुछ इलाकों की तुलना में कम है। ऐसा मुख्य रूप से विभिन्न लोगों द्वारा चलाए जा रहे कई जागरूकता कार्यक्रमों और पौधों के संरक्षण समाधान की आसान उपलब्धता के कारण हुआ है।
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon, IMD, maze,,
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