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जीन में उत्परिवर्तन को नाकाम करने वाली एएसओ तकनीक

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  August 04, 2019

सैन फ्रांसिस्को स्थित कंप्यूटर वैज्ञानिक रोहन सेठ की एक पोस्ट इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है। सेठ और उनकी साथी जेन को करीब छह महीने पहले एक बच्ची हुई थी जिसका नाम उन्होंने लीडिया रखा। जन्म के कुछ समय बाद ही उस बच्ची को दौरे आने शुरू हो गए। इस दंपती को कई सघन परीक्षणों के बाद पता चला कि 'एक अहम जीन में हुआ छोटा-सा उत्परिवर्तन बच्ची के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रहा है जिससे वह गहरी अक्षमता और पीड़ा की चपेट में है।'

 
जेन और रोहन ने अपने स्तर पर गहन छानबीन की और अपनी बच्ची जैसे लाखों बच्चों को बचाने की उम्मीद में इस पड़ताल को 'ओपन सोर्स' करने का मन बना लिया। उन्होंने एक गैर-लाभकारी संस्था (एनजीओ) का गठन किया और इस बीमारी पर शोध के लिए 15 लाख डॉलर का फंड जुटाया। एक नई प्रक्रिया पर उम्मीद टिकी है और माता-पिता को उम्मीद है कि कुछ महीनों में ही कारगर इलाज खोज लिया जाएगा। सेठ दंपती को पता चला कि जीन में एकदम ऐसी उत्परिवर्तन स्थिति वाले महज दो लोग ही हैं। डीएनए के न्यूक्लियोटाइड क्षार एडीनिन, थायमिन, साइटोसिन और गुएनिन (एटीसीजी) होते हैं। लेकिन लीडिया के डीएनए के केसीएनक्यू2 नामक जीन में एडीनिन की जगह गुएनिन मौजूद है। किसी भी इंसान के डीएनए में करीब छह अरब संरचनाएं होती हैं और लीडिया जैसा जीन उत्परिवर्तन उस शृंखला में कहीं भी घटित हो सकता है। इस वजह से परंपरागत परीक्षणों में यह खामी पकड़ में नहीं आती है। भले ही नकारात्मक उत्परिवर्तन दुनिया भर में करोड़ों लोगों पर असर डालते हैं लेकिन जीन उत्परिवर्तन इतना असामान्य है कि कोई भी दवा कंपनी इसका इलाज तलाशने के लिए शोध करने में शायद ही फिक्रमंद होंगी। 
 
सेठ दंपती ने पाया कि एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड्स (एएसओ) तकनीक के जरिये इन उत्परिवर्तनों को निष्प्रभावी किया जा सकता है। पहली स्वीकृत एएसओ दवा वर्ष 2016 में ही वाणिज्यिक रूप से उपलब्ध हो पाई थी। एक खास उत्परिवर्तन को निशाना बनाने वाली एएसओ दवा बनाना संभव है। सेठ दंपती के एनजीओ 'लीडियन एक्सलरेटर' का मकसद एएसओ अनुसंधान का एक मुक्त डेटाबेस तैयार करना है। आनुवांशिक अभिव्यक्ति एक ऐसी प्रक्रिया के जरिये होती है जिसमें डीएनए मेसेंजर आरएनए (एमआरएनए) के माध्यम से राइबोसोम को सूचना भेजता है। राइबोसोम एक विशाल आणविक कारखाने जैसा होता है और यह सभी जीवित कोशिकाओं में पाया जाता है। यह प्रोटीन बनाने के लिए एमआरएनए से मिली सूचना का इस्तेमाल करता है। एंटीसेंस पद्धति इस एमआरएनए को ही निशाना बनाती है ताकि एक उत्परिवर्तित जीन से आने वाली सूचना को रोका जा सके।
 
ओलिगोन्यूक्लियोटाइड्स न्यूक्लिक एसिड के छोटे अवयव हैं। एंटीसेंस पद्धति में गलत बरताव करने वाले जीन की पहले पहचान की जाती है और फिर एक ओलिगोन्यूक्लियोटाइड को रासायनिक तौर पर संश्लेषित किया जाता है कि उस उत्परिवर्तित जीन के जरिये एमआरएनए को सूचना प्रेषित किए जाने पर रोक लगाई जा सके। यह अत्यंत विशिष्ट एवं सटीक निशाना होता है जिससे केवल एक व्यक्ति के लिए एक डिजाइनर दवा बनाई जा सके। डीएनए के मामले में एमआरएनए की आनुवांशिक सूचना न्यूक्लियोटाइड्स के क्रम में छिपी होती है। न्यू्क्लियोटाइड्स तीन क्षार युग्मों के कूट में समायोजित होते हैं। ओलिगोन्यूक्लियोटाइड्स भौतिक रूप से एमआरएनए को जोड़ते हैं और एक खास प्रोटीन बनाने के लिए मिलने वाले निर्देशों को रोक सकते हैं। इस तरीके से थैलेसीमिया, रेटिनिट्स, मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी, कैंसर, एचआईवी और एड्स जैसी कई बीमारियों का इलाज किया जा चुका है।
 
प्रोटीन प्रसंस्करण में आरएनए को प्रभावित करने में एएसओ की भूमिका का पता दो दशक पहले चला था। एक कृत्रिम ओलिगोन्यूक्लियोटाइड संरचना के एंटीसेंस प्रभाव का पहली बार प्रदर्शन जैमेनिक एवं स्टीफेंसन ने सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में किया था।  लेकिन इन तकनीकों के इस्तेमाल में प्रगति की दर धीमी रही है। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने पहली एएसओ दवा विट्रावीन के वाणिज्यिक इस्तेमाल की इजाजत वर्ष 2016 में दी थी। पिछले साल जाकर बोस्टन चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के डॉ टिमोथी यू ने एक खास मरीज की आनुवांशिक समस्या के निदान के लिए पहली डिजाइनर एंटीसेंस दवा विकसित की थी। लेकिन रीढ़ की मांसपेशी में कमजोरी और डकेन मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए बनी एएसओ दवाओं को अभी मंजूरी मिलनी बाकी है। 
 
यह तकनीक स्नायु एवं गैर-स्नायु संबंधी कई परिस्थितियों के इलाज में भविष्य में बदलाव लाने की क्षमता रखती है। लेकिन इसके महंगे एवं संभावित नकारात्मक प्रभावों का भी अध्ययन किया जाना चाहिए।  कंप्यूटर वैज्ञानिक कहते हैं कि वे गंभीर बीमारियों के इलाज संबंधी शोध में खुले मंचों का हिस्सा बनने में यकीन करते हैं। उनका कहना है, 'शोध प्रक्रिया में खुलापन लाकर हम किसी भी संस्थान को एएसओ दवा के विकास में सक्षम बना सकते हैं। उसके आधार पर  हम प्रभावोत्पादकता और सुरक्षा आंकड़ों का एक साझा डेटाबेस बना सकते हैं। किसी खास मरीज के लिए डिजाइनर दवा विकसित करने वाले वैज्ञानिक भी अपने डेटा को इस कोष का हिस्सा बनाकर अपना अंशदान कर सकते हैं। अधिक सूचनाएं इक_ïा कर हम एक गणना-पद्धति तैयार कर सकते हैं जिससे प्रयोगशाला के स्तर पर होने वाली काफी मेहनत में कमी लाई जा सकती है।' वैज्ञानिकों का मानना है कि हरेक इलाज के साथ हम अगले इलाज की लागत एवं समय दोनों में ही कटौती कर सकेंगे। नवीनतम तकनीक को एक सूत्र में पिरोने का यह असामान्य तरीका होगा। 
Keyword: health, FDA, ASO,,
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