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तीन दलबदलू, छह हत्याएं तीन बलात्कार, एक दल

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  August 04, 2019

लगातार दलबदल करने वाले कम से कम ढाई राजनीतिक व्यक्ति बीते दिनों सुर्खियों में रहे। इनमें पहला और सबसे सुना हुआ नाम है कुलदीप सिंह सेंगर का जो उन्नाव बलात्कार-हत्याकांड में कुख्यात हुए। दूसरा नाम है अमेठी के भूतपूर्व 'राजा', पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री संजय सिंह का जो हाल ही में कांग्रेस की डूबती नौका से कूदे हैं। तीसरा नाम है साक्षी महाराज, जो उन्नाव से भाजपा के सांसद हैं। हमने उन्हें आधा गिना है क्योंकि हाल में उनका कोई राजनीतिक या आपराधिक कृत्य सुर्खियों में नहीं आया है। उन्होंने जिक्र करने लायक काम यही किया है कि वह जेल में सेंगर से मिलने गए। यह मुलाकात लोकसभा चुनाव में सहायता के बदले धन्यवाद ज्ञापन था। ये तीनों बार-बार दल बदलते रहे हैं। इनका नाम हत्याओं के छह मामलों से जोड़ा जाता रहा है, हत्याओं के कई मामले अनसुलझे भी हैंं। इसी तरह बलात्कार के कम से कम तीन अनसुलझे मामलों से इनका नाम जुड़ा है।

 
तीनों की मांग निरंतर बनी रहती है। उन्हें अपनी जाति और क्षेत्र के वोट मिलते हैं। उन्हें कानून से निपटना आता है और इनके पास ऐसी खूबी है जिसके कारण तमाम राजनीतिक दल इन्हें क्षमता, ईमानदारी और नैतिकता से परे मानते हैं, वह है चुनाव जीतने की क्षमता। संयोगवश ये तीनों भाजपा में हैं। कम से कम कुछ रोज पहले तक तो ऐसा ही था जब तक कि सेंगर को निकाल नहीं दिया गया। एक कथित अपराधी, या डॉन या कहें बाहुबली के आपराधिक जीवन पर ही इतना केंद्रित हो जाते हैं कि हम उसे रंगीन सार्वजनिक जीवन की अनदेखी कर बैठते हैं। सन 2002 में स्थानीय 'दद्दू' बसपा के टिकट पर उन्नाव से चुनाव जीतकर पहली बार माननीय विधायक बन गए।
 
इसके बाद वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और 2007 और 2012 के चुनाव पास की बांगेरमऊ और भगवंत नगर सीटों से जीते। यही वह वक्त था जब यह माना जाने लगा था कि समाजवादी पार्टी आपराधिक माफियाओं को संरक्षण दे रही है, खासकर यादवों और राजपूतों को। सन 2017 में हवा का रुख भांपते हुए वह भाजपा में चले गए और पुन: विधायक बने। उनके भाजपा विधायक बनने के तीन महीने बाद ही वह किशोरी उनके पास नौकरी में सहायता मांगने आई और उसने शिकायत की कि इसके बजाय विधायक ने उसके साथ 'बलात्कार' किया और 'मेरे आंसू पोंछते हुए कहा कि वह मुझे रोजगार दिलाने में मदद करेंगे।'
 
संजय सिंह इतनी बार दल बदल कर चुके हैं कि मैं आशंका में आपको सूची नहीं दे पा रहा कि कहीं गलती न कर बैठूं। वह हत्या के एक चर्चित मामले से जुड़े रहे, हालांकि बाद में बाइज्जत बरी हो गए। यह मामला 1988 का है जब लखनऊ में बैडमिंटन के राष्ट्रीय चैंपियन सैयद मोदी की सुपारी देकर हत्या करा दी गई थी। संजय सिंह इस हत्या के प्रमुख संदिग्ध थे लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस और सीबीआई उनके खिलाफ कुछ नहीं तलाश पाईं और वह सबूतों के अभाव में छूट गए। व्यक्ति जब तक दोषी न सिद्ध हो वह निर्दोष होता है, हम सभी को यह मानना चाहिए। यह भी हत्या का वैसा ही मामला सिद्ध हुआ जहां भाड़े के हत्यारों को दंड मिला लेकिन प्रमुख अभियुक्त तक कोई नहीं पहुंचा। भाड़े के दो हत्यारों में से एक भगवती सिंह को सजा हुई और दूसरे अमर बहादुर की सुनवाई के दौरान हत्या हो गई। हत्या के बाद संजय सिंह ने सैयद मोदी की विधवा अमिता मोदी (पूर्व में कुलकर्णी) से विवाह कर लिया। जिस समय सीबीआई इस मामले की जांच कर रही थी लगभग उसी समय विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस से बगावत कर प्रधानमंत्री बन चुके थे। वह सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह के रिश्ते में आते थे। संजय सिंह भी कांग्रेस छोड़कर उनके साथ हो लिए। एक दशक बाद वह भाजपा में शामिल हो गए और सन 1998 में कैप्टन सतीश शर्मा को हराकर अमेठी लोकसभा चुनाव जीत गए। लेकिन संसद में उनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा क्योंकि वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिर गई। 
 
सन 1999 के चुनाव में वह अपने पुराने मित्र और मार्गदर्शक राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी के खिलाफ भाजपा के टिकट पर अमेठी से चुनाव मैदान में उतरे। सोनिया ने सुरक्षित रहने की दृष्टि से बेल्लारी से भी चुनाव लड़ा था। उस वक्त मैंने अमेठी में समय बिताया था और सिंह के अभियान को कवर किया था। उनका एक नारा आज भी मेरे कानों में गूंजता है: संजय सिंह के डर की मारी, सोनिया भाग गई बेल्लारी। सोनिया अमेठी और बेल्लारी दोनों जगह से जीतने में कामयाब रहीं।  हवा बदली और 2003 में वह दोबारा कांग्रेस में लौट आए। 2009 में उन्हें अमेठी और रायबरेली के करीब स्थित सुल्तानपुर से कांग्रेस टिकट पर जीत मिली। कार्यकाल समाप्त होने तक उन्हें अंदाजा हो चुका था कि उत्तर प्रदेश में हालात प्रतिकूल हैं। उन्होंने असम से राज्य सभा सदस्यता ले ली। वह कार्यकाल अब समाप्त हो रहा है, गांधी परिवार का प्रभाव भी पहले जैसा नहीं रहा, ऐसे में उन्होंने एक बार फिर भाजपा की शरण ली।
 
साक्षी महाराज का जन्म सच्चिदानंद हरि साक्षी के रूप में हुआ। वह पिछड़े लोध समुदाय के चमकते सितारे थे। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और साक्षी महाराज के संरक्षक कल्याण सिंह भी इसी समुदाय से थे। सन 1991 और 1996 में वह भाजपा के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपित के नाते वह वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध नजर आते। बहरहाल टिकट न मिलने पर उनकी यह प्रतिबद्धता भी समाप्त हो गई और वह समाजवादी पार्टी में चले गए। मुलायम सिंह यादव ने प्रसन्नतापूर्वक पार्टी में उनका स्वागत किया। साक्षी महाराज ने कहा कि अब भाजपा की नीतियां गरीब विरोधी हो चुकी हैं। परंतु क्या आप जानते हैं कि जीत की संभावना के बावजूद उनका टिकट क्यों कटा था? उन पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी सहयोगी ब्रह्म दत्त द्विवेदी की हत्या का आरोप था।
 
सन 2000 में मुलायम सिंह ने उन्हें राज्य सभा भेज दिया। इस बीच हत्या का मामला हल्का पड़ चुका था। जल्दी ही उन पर और दो भतीजों पर एक कॉलेज प्रधानाचार्य के सामूहिक बलात्कार का मामला चला। उन्हें एक महीना तिहाड़ जेल में बिताना पड़ा लेकिन द्विवेदी हत्याकांड की तरह इस मामले में भी वह सबूतों के अभाव में बरी हो गए। आप देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में हत्या और बलात्कार के मामलों में सबूत का न मिलना आम है। वैसे ही जैसे आपको हमेशा यह सुनिश्चित करना होता है कि आप जीतने वाले दल में रहें। सन 2002 तक उन्हें पता चल चुका था कि समाजवादी पार्टी में का कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने मुलायम पर जातिवाद, तानाशाही से लेकर पूंजीवादी होने तक के आरोप लगाए और पार्टी छोड़ दी। वह अनौपचारिक रूप से भाजपा के बागी कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के साथ आ गए जो लोधियों का दल था।
 
सन 2009 में सरकार ने उन पर फर्जी स्वयंसेवी संगठन बनाने और अवैध रूप से 25 लाख रुपये जुटाने का आरोप लगाया। उनकी अनुयायी और उनके एक कॉलेज की पूर्व प्रधानाचार्य सुजाता वर्मा पर उनका साथ देने का आरोप लगा। वह 2012 में दोबारा भाजपा में आ गए। सुजाता वर्मा की एक दिन आश्रम से लौटते वक्त हत्या हो गई। साक्षी और उनके सहयोगियों पर हत्या का आरोप लगा। वह भूमिगत हो गए और बाद में उन्होंने आत्मसमर्पण करके जमानत ले ली। 2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से प्राथमिकी खारिज कराने की उनकी कोशिश नाकाम रही। अगले वर्ष उन्हें भाजपा ने लोकसभा का प्रत्याशी बनाया। उनकी प्रतिष्ठा बहाल हुई और ऐसे विस्तारित करियर वाले नेता के बारे में हम शिकायत कर रहे हैं कि वह सीतापुर जेल में सेंगर का धन्यवाद करने क्यों गए? तीनों नेताओं की कहानी बताती है कि राजनीतिक दलों के लिए जीत की संभावना ही एकमात्र मानक है। अपराधी होना, बलात्कार के आरोप और हत्या मायने नहीं रखते। हिंदी प्रदेशों में एक ही फॉर्मूला है स्थानीय वोट बैंक। यह जाति, माफिया शक्ति या दोनों के मिश्रण से बन सकता है। तब या तो आप विजेता होते हैं या दूसरों को जिताने की क्षमता रखते हैं। आप आसानी से जीतने वाले पक्ष को चुन सकते हैं और हत्या, बलात्कार, लूट, दंगे, धोखाधड़ी और घोटालों के बावजूद बने रह सकते हैं। लेकिन तब तक जब तक कि वेंटिलेटर पर संघर्ष करती कोई किशोरी, उसका पिता और हत्याओं में कई लोगों को गंवा चुका परिवार सब कुछ नहीं गंवा देता। 
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