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सिनेमा स्क्रीन का समेकन देगा मल्टीप्लेक्स को जान

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 02, 2019

अब हमारे सामने एक ऐसा उद्योग है जहां समेकन अच्छे हालात लाने का सबब बना है। मार्च 2019 में समाप्त वित्त वर्ष में भारत की तीन प्रमुख मल्टीप्लेक्स शृंखला- पीवीआर सिनेमाज, आइनॉक्स लीजर और सिनेपोलिस में बिकने वाले टिकटों की कुल संख्या एक साल पहले की तुलना में 23 फीसदी बढ़कर 20 करोड़ से भी अधिक रही। पिछले कई वर्षों से लोगों में सिनेमाघर जाकर फिल्म देखने की आदत में गिरावट देखी जाती रही है। ऐसे में बॉक्स ऑफिस पर होने वाली कमाई में बढ़ोतरी के जो आंकड़े हम देखते हैं, वे असल में टिकटों की कीमतें बढऩे के कारण हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय फिल्मों के करीब एक अरब टिकट बिकते हैं। लेकिन किसी सटीक आंकड़े के अभाव में इन तीनों मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं द्वारा बेचे गए टिकट एक अच्छा नमूना साबित होते हैं। 

 
इसके साथ कुछ पुराने साक्ष्य भी हैं। देश भर में इकलौते स्क्रीन वाले सिनेमाघरों और छोटे मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं की टिकट बिक्री 2018-19 में 20-40 फीसदी तक बढ़ी। यह बढ़ोतरी इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि सिनेमाघरों की संख्या एवं कारोबार का ग्राफ तेजी से बदल रहा है। सिनेमा स्क्रीन की संख्या में गिरावट के बाद अब सिनेमाघर जाने वाले दर्शकों की संख्या में बढ़ोतरी का दौर हो चुका है। पिछला साल फिल्मों के कारोबार के लिहाज से शानदार रहा था। राजी, संजू, भारत, एने नेनू और रंगस्थलम जैसी सुपरहिट फिल्मों ने काफी कमाई की थी। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि अच्छी फिल्मों का आना एक चक्रीय अवधारणा है। तीन बुनियादी कारणों से टिकट बिक्री बढ़ी है और आगे भी ऐसा होता रहेगा। पहला, सभी सिनेमाघरों के जीएसटी के दायरे में आ जाने के बाद अब हर जगह कंप्यूटरीकृत टिकट ही मिलते हैं। इसका मतलब अधिक पारदर्शिता से है जिसमें अघोषित राजस्व एवं टिकटों की गिनती हो जाती है। 
 
दूसरा, मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में हर साल करीब 150 स्क्रीन लग रहे हैं। वर्षों से कुल स्क्रीन में नए जुड़े स्क्रीन की दर बंद होने वाले सिनेमाघरों की दर से काफी कम होती थी। इसके अलावा नए स्क्रीन की संख्या बढऩे के बावजूद राजस्व या टिकट बिक्री नहीं बढ़ रही थी। लेकिन अब ऐसा हो रहा है। चीन में वर्ष 2011 में स्क्रीन की संख्या 9,000 थी लेकिन आज इनकी संख्या छलांग लगाते हुए 60,000 हो चुकी है। इसके चलते आज के समय में चीन अमेरिका-कनाडा के बाद दूसरा बड़ा सिनेमा बाजार हो चुका है। भारत में नए स्क्रीन आने का असर टिकट बिक्री पर भी पड़ रहा है। 
 
तीसरा, नेटफ्लिक्स या वूट जैसे स्ट्रीमिंग वीडियो ऐप आ जाने से दर्शकों को अलग-अलग तरह का सिनेमा अपने मोबाइल फोन पर ही देखने को मिलने लगा है जिससे उनके भीतर कुछ और देखने की चाहत पैदा हो रही है और उससे खिंचकर वे सिनेमाघरों तक पहुंच रहे हैं। इन तीनों कारणों के चक्रीय क्रम में नहीं होने से मुझे लगता है कि यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। सिनेमाघर पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या बढऩे का असर समेकन के लाभ के रूप में देखने को मिला है। यह भारत के 1.67 लाख करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार के कई वर्गों में एक बेहद जरूरी ताकत है। फिल्म प्रदर्शन एक बढिय़ा उदाहरण है। 
 
नई सदी की शुरुआत के समय भारत में करीब 12,000 सिनेमा स्क्रीन थे और उनमें से हरेक का मालिक अलग था। इस वजह से किसी फिल्म को रिलीज एवं मार्केटिंग करना किसी दु:स्वप्न से कम नहीं था। डिजिटल प्रिंट से पहले के उस दौर में किसी फिल्म निर्माता को देश भर में अपनी फिल्म रिलीज करने के लिए 60,000 रुपये प्रति कॉपी वाले 12,000 प्रिंट की जरूरत पड़ती थी। लेकिन कोई भी इसका खर्च नहीं उठा सकता था। बड़ी फिल्में भी 400-700 प्रिंट के ही साथ रिलीज होती थीं। टिकट बिक्री काफी बिखरा हुआ काम था जिससे पता ही नहीं चल पाता था कि असल में कितने लोगों ने फिल्म देखी? निजी स्तर पर फिल्में बनाने वाले अधिकतर निर्माता एक न्यूनतम गारंटी पर अपनी फिल्में बेच देते थे। फिल्म अगर काफी सफल हो जाती थी तो उन्हें इस गारंटी राशि से कुछ अधिक रकम मिल जाती थी लेकिन औसत कारोबार वाली फिल्मों के  निर्माताओं को गारंटी राशि से अधिक की उम्मीद नहीं रहती थी। दुनिया में फिल्में बनाने वाले अव्वल देश के 80 फीसदी फिल्म कारोबार इस बंटे हुए एवं धुंधले पहलू से ही आता था।
 
लेकिन मल्टीप्लेक्स का उदय होने के बाद फिल्मों का प्रदर्शन कारोबार अधिक साफ एवं व्यवस्थित हो गया। इसने एकल स्क्रीन वाले सिनेमाघरों को या तो नई साज-सज्जा के साथ बने रहने या फिर किसी मल्टीप्लेक्स शृंखला का हिस्सा बनने के लिए मजबूर कर दिया। इसने फिल्म कारोबार में दोबारा पैसा डालने का इंतजाम कर इसे पारदर्शी बनाने का भी काम किया। भारत में पहला मल्टीप्लेक्स शुरू होने के 18 साल बाद फिल्म उद्योग का आकार करीब सात गुना बढ़ चुका है, निवेश पर मिलने वाला प्रतिफल बेहतर हुआ है और सबसे बड़ी बात, फिल्मों में जबरदस्त विविधता देखने को मिल रही है। 
 
करीब 3,119 करोड़ रुपये वाले पीवीआर, निजी स्वामित्व वाले सिनेपोलिस और 1,692 करोड़ रुपये वाले आइनॉक्स की सम्मिलित हिस्सेदारी भारत के कुल 2500 मल्टीप्लेक्स स्क्रीन में से तीन-चौथाई है। देश में मौजूद कुल 9,000 स्क्रीन में से मल्टीप्लेक्स के 2,500 स्क्रीन ही बॉक्स ऑफिस पर 5,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटा रहे हैं। वर्ष 2018 में भारतीय फिल्म उद्योग के 17,500 करोड़ रुपये के कारोबार में बॉक्स ऑफिस का हिस्सा लगभग दो-तिहाई था। इसे देखकर यह लग सकता है कि बॉक्स ऑफिस की कमाई में मल्टीप्लेक्स का इतना बड़ा हिस्सा गैर-आनुपातिक है। लेकिन एक विभाजित, टूटे हुए कारोबारी मॉडल से अलग होते हुए प्रक्रिया, संख्या एवं पारदर्शिता को ले आना इस समेकन के बगैर नहीं संभव हुआ रहता। अगर ऐसा था तो बाकी 6,500 स्क्रीन को भी अधिक राजस्व अर्जन के दायरे में लाना चाहिए। 
Keyword: cinema, multiplex, PVR,,
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