बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या चीन के नुकसान में छिपा है भारत का लाभ?
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क्या चीन के नुकसान में छिपा है भारत का लाभ?

अजय शाह /  August 02, 2019

व्यापारिक युद्घ के साथ जुड़ी घटनाओं के आकलन के क्रम में अमेरिका से भारत और चीन में आयातित होने वाली वस्तुओं के आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने देश अमेरिका को चीन के साथ कारोबारी जंग में उलझा दिया है। शुरुआती प्रमाण तो यही सुझा रहे हैं कि भारत को इसका फायदा मिल सकता है। बहरहाल, समय बीतने के साथ वैश्विक कंपनियों के एफडीआई संबंधी फैसलों से कहीं अधिक बड़े लाभ हमारे सामने होंगे। भारत की बात करें तो हालात का फायदा उठाने के लिए हमें और अधिक परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था बनना होगा तथा वैश्वीकरण के नियमों के मुताबिक चलना होगा। भारत और चीन की तुलना करें तो चीन की अर्थव्यवस्था काफी बड़ी हैं और चीन का नीतिगत प्रतिष्ठान अधिक सक्षम है। चीन कंप्यूटर उपकरणों जैसे गुणवत्तापूर्ण सामान बनाने लगा है जो भारत नहीं बनाता। हमारा देश अब तक केवल ऐसी वस्तुओं का निर्यात करता है जो विकासशील देशों से मेल खाती हैं। यही कारण है कि हम मान सकते हैं कि शायद अमेरिका और चीन की कारोबारी जंग भारत के लिए उतने फायदे न लाए। 
 
व्यापार युद्घ से जुड़ी घटनाओं का आकलन करने के क्रम में हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि ये दोनों देश अमेरिका से किन वस्तुओं का आयात करते हैं। भारत अमेरिका को सेवा निर्यात करता है लेकिन हम उसे विश्लेषण से बाहर रखें क्योंकि चीन और अमेरिका की कारोबारी जंग प्रमुख रूप से वस्तुओं से संबंधित है। ताजा आंकड़े मई 2019 के हैं। ये बताते हैं कि भारत ने अमेरिका को 560 करोड़ डॉलर मूल्य का निर्यात किया। वहीं चीन ने 3,930 करोड़ डॉलर का निर्यात किया। इस प्रकार अमेरिका ने कुल 22,080 करोड़ डॉलर का आयात किया। जाहिर है इसमें भारत की हिस्सेदारी चीन से काफी कम रही। 
 
सवाल यह है कि इन दोनों देशों का निर्यात आखिर अमेरिका और चीन के व्यापार युद्घ से किस प्रकार बदल रहा है? अमेरिकी आयात में चीन की सबसे अधिक हिस्सेदारी सितंबर 2015 में 23.87 फीसदी थी। परंतु मई 2019 के ताजा आंकड़ों में यह घटकर 17.78 फीसदी रह गई। इससे एक वर्ष पहले मई 2018 में यह 21.5 फीसदी के स्तर पर था। सितंबर 2015 के उच्चतम स्तर से मई 2019 तक अमेरिकी आयात में चीन की हिस्सेदारी 6.09 फीसदी कम हुई है। यह बड़ा बदलाव है। इस अवधि में अमेरिकी आयात में भारत की हिस्सेदारी 1.92 फीसदी से बढ़कर 2.54 फीसदी हो गई। यह बढ़ोतरी 0.62 फीसदी की है। यानी चीन ने जो हिस्सा गंवाया, उसका दसवां हिस्सा भारत ने बढ़ाया।
 
सवाल यह है कि ये हालिया कारोबारी जंग से इस बदलाव का कितना ताल्लुक है और लंबी अवधि में इसका क्या असर होने वाला है? आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका को चीन का वस्तु निर्यात सन 1980 के दशक में भारत से अमेरिका को होने वाले वस्तु निर्यात का दो से चार गुना था लेकिन 2007 तक यह 16 गुना हो गया। बीते दशक के दौरान भारत की दृष्टि से यह अनुपात सुधरा है। इस लंबी अवधि की प्रक्रिया से इतर हालिया आंकड़ों से भी ऐसा लगता है कि अमेरिका और चीन के व्यापारिक युद्ध का लाभ भारत को मिला है।
 
भारत दोनों देशों के इस विवाद से कैसे लाभान्वित हो सकता है? पहली बात तो यह कि अधिकांश कारोबारी वार्ताएं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीच ही होती हैं। जब वॉलमार्ट भारत में गहराई तक जड़ें जमा रही है तो वह भारत से अधिक निर्यात भी करेगी। निर्यात में भारत का प्रदर्शन बेहतर रहे, इसके लिए यह आवश्यक है कि वैश्विक कंपनियां भारत आएं और बड़े पैमाने पर काम करें। इसके अलावा भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विकास की भी आवश्यकता है। निश्चित रूप से इन बातों का प्रभाव धीमी गति से नजर आएगा। जब अमेरिका और चीन का व्यापारिक युद्ध उभरा तो वैश्विक कंपनियों ने अल्प काल में अपनी रणनीति में कोई बदलाव नहीं किया लेकिन मध्यम अवधि में वे ऐसे देशों की तलाश कर रही हैं जहां वे कारोबार कर सकें और जहां कारोबारी दृष्टि से बेहतर आर्थिक माहौल हो।
 
हमें इन कंपनियों के बोर्ड के मन में स्थान बनाना होगा, जो चीन के प्रति अत्यधिक खुलेपन के कारण दिक्कतों का सामना कर रही हैं। हम उनके लिए अधिक आकर्षक बनने के क्रम में क्या कर सकते हैं? एफडीआई के केंद्र के रूप में भारत को आकर्षक बनाने के लिए हमें श्रम कानूनों, बुनियादी ढांचे और कराधान में संशोधन करने होंगे। इनमें कराधान ही सबसे बड़ी समस्या रहा है। कर नीति और कर प्रशासन वैश्विक कारोबार में बड़ी चिंता का विषय है। भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखला के साथ बेहतर ढंग से जोडऩे के लिए देश में वस्तुओं की अबाध आवाजाही और उनका पुनर्निर्यात सुनिश्चित करना होगा। इसके लिए तमाम सीमा शुल्क समाप्त करने होंगे, आयात पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करना होगा और निर्यात की दर शून्य करनी होगी। इसके लिए हमें व्यवस्थित प्रक्रियाओं और सुविचारित कर प्रशासन की भी आवश्यकता होगी। छापों और जेल का डर निजी कारोबारियों को भारत में कारोबार करने से रोकता है। 
 
कंपनियों पर आय कर के मामले में भारत दुनिया में सर्वाधिक दर वाला देश है। यहां स्रोत आधारित कर प्रणाली है। इसके बजाय हमें रेजिडेंस आधारित कर प्रणाली अपनानी होगी और सभी कंपनियों पर लगने वाली कर दर को 20 फीसदी करना होगा। नीतिगत जोखिम के चलते भारत को कारोबार करने की दृष्टि से कठिन जगह माना जाता है। सीमा शुल्क में अचानक बदलाव का भी खतरा रहता है। इसके लिए नीतिगत प्रक्रियाओं में गहन सुधार की आवश्यकता है। कानून और नियमन बनाने की प्रक्रिया में गहन सलाह-मशविरे, लागत-लाभ विश्लेषण और भविष्य की तिथियों से नियम बदलाव की व्यवस्था होनी चाहिए।
 
हमें इस सोच पर लगाम लगानी होगी कि चीन का नुकसान, भारत का फायदा है। नियमों से चलने वाली वैश्वीकरण की दुनिया में भारत भी काफी कुछ गंवा सकता है। हमें सेवा निर्यात से हर तिमाही 4 लाख करोड़ रुपये और वस्तु निर्यात से हर तिमाही 6 लाख करोड़ रुपये की आय मिलती है। वैश्वीकृत दुनिया में हमारा काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। भविष्य पर नजर डालें तो संभव है कि देश में होने वाले नीतिगत सुधार के कारण निर्यात में सुधार देखने को मिले। जाहिर है भविष्य में भी काफी कुछ दांव पर लगा होगा। अगर ट्रंप जो कर रहे हैं वह नव सामान्य बन गया तो भविष्य में हमें भी इसकी कीमत चुकानी ही होगी। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत के रुख में खुली सीमाओं वाली नियम आधारित दुनिया पर जोर होना चाहिए। ऐसी दुनिया जहां नई बाधाओं का जोखिम कम हो। 
Keyword: india, china, economy, trade,,
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